Book Title: Agam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Raipaseniyam Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 345
________________ दारग-दित्ततेय १०० ५४७,५५०,५५२ से ५५४,५५७,५६३,५६६, दाहिणपच्चस्थिम | दक्षिणाश्चात्य रा० ४३, ५६८ से ५७०,५६४,६४७,६७३.६७४,७०७ ६६२. जी० ३।२२४,३४३,५६०,७५२ से ७११,७१३,७१४,७६६ से ८०२,८१३ से दाहिणपच्चथिमिल्ल [दक्षिणपाश्चात्य जी० ८१५,८२४ से ८२७,६५१,८५२,८८५ से ३।२२०,६६४,६९५,६१८,६२१ ८८८,६३६,६४०,६४४,६५५ दाहिणपुरथिम [दक्षिणपौरस्त्य | रा० ४३,६६०, दारग [दारक] ओ० १४२,१४४ से १४७, रा० जी० ३६४१,५६०,७५१ ८००,८०२,८०४ से २१० दाहिणपुरस्थिमिल्ल | दक्षिणपौरस्त्य | रा०५६ दारचेडा [द्वारचेटा] र१० १३०,२६४,२६६.२६८ जी० ३१२१६,२२३,६६२,६६३,६१८,९२० २६६ जी० ३३०० दाहिणवाय | दक्षिणवात ] जी० १८१ दारचेडी ! द्वारचेटी] जी० ३४५६,४६१ दाहिणहत्य दक्षिणहस्त ओ०६६ दारय दारक] ओ० १४३,१४४,१४८, से १५० दाहिणिल्ल दाक्षिणात्य ०४८,५७,२६४ से रा० १२,८०१,८०२,८०६,८११ ३०५,३०६ से ३१२,३२०,३२१,३२५,३३४, जी० ३।११८,११६ ३३६,३१,३५७,४१६,४७७,५३७,५६७. दारुइज्जपव्यय [दाहकीयपर्वत | रा० १८१ जी० ६१३३,३८,२१७,२१६ से २२३,२२५, दारुइज्जपव्ययय [दारुकीयपर्वतक] रा० १८० २३४,२४४,२५०,२५३,४५६ से ४७०,४७४ दारुपब्वयग | दारुपर्वतक] जी० ३१२६२ से ४७७,४६५,४६०,४६५,४६६,४,५०६, दारुपाय [दारुपात्र] ओ० १०५,१२८ ५२२,५२,५३६,५४३,५५०,६३२,६३६, दारुय दारुक] आ०६४ ६६६,६-३,६६३,६६४,६१४ । दारुयाग [ दारुकक] जी० ३।२.५ दिलैंतिय दान्तिक १० ११७,२८१. दारुयाय [दारुकक) रा०१७३,६०१ जी० ३३८४७ दालिम | दाडिम ओ०१६ दिदुलाभियाटलाभिक | ओ० ३४ दास दास] ओ० १४,१४१. स० ६७१,७७४, दिट्टि दृष्टि रा० ७४८ से ७५०,७७३. ___७६६. जी० ३।६१०,६३ ११२ जी० ११४,६६,१०१,११६,१२८,१३३,१३६ दासी । दासी | ओ० १४,१४१. रा०६७१,७७४, ३११२,१६० दिहिय दृष्टिक रा० ७६५ दिद्विवायष्टिादरा० ७४२ दाह [दाह ] रा० ७६५. जी० २।१४०,३१११८, दिणयर दिनक ओ० २२. रा० ७२३,७७७, ११६,६२८ ११७८,७८. जी० ३१६३८१२,१३,२६ दाहिण | दक्षिण ओ० २१,५४. रा०८,१६,४०, दिण्ण दत्त | ओ० २,१७,५५,१११ से ११३, ४३,४४,६६,१२४,१३२,१७०,१७३,२१०, १३७,१३८. रा० १५,३२,२८१,७८७,७८८. २१२, २३५,२३६,२६२,६६१,६६४. जी० जी० ३४८७ ३।२१७,२१६ से २२१,२६५,२८५.३४२, दित्त | दृप्त, शप्न ! ओ० १४,१४१. रा० ६७१, ३४५,३५८,३७३,३६७,३६८,८५७,१.६९५६६, ६७५,७६६ ५६७,५६६,५७७,६४७,६६८,६५२,५८६ दित्त ] दीप्त ओ०६३,६५ जी० ३।६३८१२६ ६६२,६६५,६६६,७११,८५२,८८५,६०२, दित्ततव दीप्तनपम् । ओ० ८२ १०१५,१०३६ दित्ततेय दीप्ततेजस् ] ओ०२७. रा० ८१३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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