Book Title: Agam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Raipaseniyam Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 431
________________ विसह-वाह विसह | विषह । ओ० २७. रा० ८१३ विहग विग] ओ०१३,१६,२७. रा० १७,१८, विसाण विवाण | ओ० २७. रा. ८१३ २०,३२,३७,१२६,८१३. जी० ३१२८८,३००, विसाय विवाद ओ०४६ ३११,३७२,५९६ विसारय | विशारद ] ओ० ६७,१४८,१४६. विहत्थि [विहस्ति ] जी० ३१७८८ रा०६७५,८०६,८१० विहर | वि--ह। -विहरइ. ओ० १४. रा० विसाल [विशाल] ओ० ६४. रा० २२८. जी. ६. जी० ३१२३६.----विहरति.ओ० २३. रा० ३।३८७,५९७,६७२ १८५. जी. ३.१०६.-विहरति. रा० ७. विसाला | विशाला] जी० ३१६६६,९१५ जी० ३१२३४.--विहामि. २०७५२. - विसिट्ठ | विशिष्ट ] ओ० १६,६३. रा० ३२,५२ विहराहि. ओ०६८. रा०२८२. जी. ३.४४६ ५६,१५,२३१.२४७. जी० ३।२६७,३७२, -.-विहरिस्सइ. रा० ८१५-...विहारस्सति. ३६३,५६२,५६६,५६७,६०४,८५७ रा० ८०२.- -विहरिस्पामि. रा. ७८७. विसुज्झमाण [ विशुध्यमान] ओ० ११६,१५६ --विहरज्जा. ओ० २१ विसुद्ध विशुद्ध] ओ० ८,१०,१४,४६,१८३,१८४. विहरंत | विहरत् रा० ७७४ रा० २६२,६७१. जी० ३१३८६,४५७,५८१ विहरमाण [विहत् ] ओ०१६,३०,७६,७७,६२, से ५८३,५८६ से ५६५ ६५,११४,१५३,१५८,१५६,१६५. रा०६८६, विसुद्धलेस्स [विशुद्धलेश्य] जी० ३।१६६,२०१, ७११,७७४,८१६ २०३ से २०६ विहरित्तए |निहर्तुम् ] ओ० ११७. रा० ७६१. विसेस । विशेष ओ० १९५१७, रा. ५४,१८८. ___ जी० ३११०२४ जी० ३११२६५,२१७,२२६।५,३५८,५७६, विहरिता [विहृत्य ] ओ० १५५ ८३८१३ विहव | विभव] रा० ५४ विसेसहीण विशेषहीन जी० ३१७३ विहस्सति [ वृहस्पति ओ० ५० विसेसाधिय विशेषाधिक | जी० ३१८२ विहार वि.+ घटय ]--विहाडेइ. रा०२८८. विसेसाहिब विशेषाधिक ओ० १७०,१६२. जी० जी० ३१५१६..-विहाडेति. ओ० ७४१५. १९१४३,२०६८ से ७२,९५,६६,१३४ से १३८, -विहाडेति. जी० ३१४५४ १४१ से १४६; ३१७३,७५,८६,१६७,२२२, विहाडित्ता विघट्य] रा०२८९ २६०,३५१,३६१,६३२,६६१,६६८,७३६, विहाडेत्ता [विघटय ] स० ३५१. जी० ३।४५४ ८१२,८३२,८३५,८३६,८८२,१०३७,११३८; विहाण | विधान ] रा० ७१,७५. जी० ११५८,७३, ४.१६ से २२,२५,५१८ से २०,२५ से २७ ७८,८१ ३१ से ३६,५२,५६,६०,७१२०,२२,२३, विहाणमग्गण विधानमार्गण] जी० १३४,३६, ८.५है।५,७,१४,५५,१५५,१६६,१६६,१८४, ३६ १६६,२०८,२३१,२५० से २५३,२५५,२६६, विहार विहार] ओ०३०,१२,१५,११४.११५. २८६ से २६३ १५३,१५८,१५६,१६५. रा० ८१४,८१६ विस्संत [वियान्त] जी० ३।८७२ विहि [विधि} ओ०६३. रा० २८१. विस्सुयकित्तिय विश्रुतकीतिक ओ० २ जी० ३१४७५. ४७६,५८६,५८८,५६० से विहंगिया विहङ्गिका रा० ७६१ ५६५,८३८११३; ५।३० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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