Book Title: Jain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः । ID | जैनाहितैषी। चौदहवाँ भाग। अंक १०-११ जैनहितैषी। श्रावण, भाद्र २४४६ जुलाई,अगस्त १९२० न हो पक्षपाती बतावे सुमार्ग, डरे ना किसीसे कहे सत्यवाणी। बने है विनोदी भले आशयोंसे, सभी जैनियोंका हितैषी ‘हितैषी' ॥ . जैनसमाजकी दशा और उसके भीतर बहुत समयसे दिगम्बर और श्वेताम्बर संप्रदाय नक्षपातसे चले आ रहे हैं । बादमें सुधारके उपाय । दिगम्बर और श्वेताम्बर संप्रदायके गृहत्यागी आचार्यों के अलग अलग संघ, गण, गच्छ, पट्ट, आदि निर्माण हुए । प्रत्येक संघको (ले०-सरस्वती सहोदर ।) माननेवाले श्रावकोंने पक्षभेदसे अपनेको भिन्न आम्नाय-आग्रह पंथ-हठ औ रूढ़िमें सब सन रहे। भिन्न आम्नायके माननेवालोंका स्वरूप दिया। स्याद्वादके झंडे तले यों पक्षपाती बन रहे ॥ इसी तरह जरा जरासी विचारविभिन्नता पर सं-ज्ञान-श्रद्धा, मानते हैं धर्मके बहिरंगमें । जैनजनता एक दूसरेसे अलग होती गई । आचरण हैं बस रूढ़ियों पर, ढोंगियोंके ढंगर्म ॥१॥ वर्तमानमें जैनसमाजमें दिगम्बर, श्वेताम्बर यह जैनसमाजकी वर्तमान अवस्था बड़ी शोच- दो संप्रदाय मुख्य गिने जाते हैं। श्वेताम्बरोंमें नाय हो रही है। गतानुगतिक आदतोंसे समाजको स्थानकवासी और मन्दिरमार्गी दो भेद हैं। घुनसा लग गया है । जिधर देखो उधर पक्ष. इनके अतिरिक्त तेरहपंथी बाईसटोला आदि और पातका साम्राज्य नजर आ रहा है । विचार- भी कई उपभेद हैं । दिगम्बरोंमें भी बीसपंथी, स्वातंत्र्यकी ओटमें भी पक्षपातकी बुरी गंध फैल तेरापंथी और तारनपंथी इत्यादि भेद हैं । रही है । इसी पक्षपात और अनेकतासे वास्त- बीसपंथी भट्टारकोंकी आम्नायके कहलाते हैं। विक जैनधर्म और जैनसमाजकी जड़ दृढ़ इनमें भी बलात्कार, सेनगण आदि कई भेदहोमेकी अपेक्षा निर्बल होती जा रही है। भाव हैं. जिनके माननेवालोंमें परस्पर इतना वर्तमानमें “ आठ कनोजिया नौ चूल्हेकी" वैमनस्य है कि वे लोग दूसरे गणके भट्टारकोंके कहावत बराबर घटित होती है । जैनधर्मके पास या उस गण गच्छवालोंके मंदिरोंमें जाना For Personal & Private Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८२ 2 पातक समझते हैं । तेरापंथी पंडित आम्नायके समझे जाते हैं । पं० टोडरमलजी, पं० जयचंदजी आदिके समयसे इस पंथकी उत्पत्ति बतलाई जाती है । इस पंथमें और बीसपंथमें केवल आधारोंकी थोड़ीसी भिन्नता है । बीसपंथी वस्त्रधारी भट्टारकोंको अपना गुरु मानते हैं और उन्हींकी आज्ञा प्रमाण मानते हैं । दूसरे, बीसपंथी लोग रात्रिमें पूजनाभिषेक करते हैं, और पूजनकी सामग्रीमें सचित्त फूल, फल, चढ़ाते हैं तथा पंचामृत - दूध, दही, घृत, शक्कर, और केशरमिश्रित जल—से अभिषेक करते हैं । इसके अतिरिक्त नवग्रहपूजन, पद्मावती, क्षेत्रपाल आदि देवी देवताओंकी आराधना करते हैं । तेरापंथी इन सब बातों का निषेध करते हुए दिनको ही पूजनादिक कर लेते हैं। पूजनकी सामग्री अचित्त लेते हैं । पंचामृतकी जगह केवल जल, सुगंध ( केशरमिश्रित जल ) का अभिषेक करते हैं । पहले दिगम्बर मुनियोंको अपने गुरु और साधु मानते थे, परन्तु वर्तमानमें ऐसे मुनियोंका अभाव है; इसलिये ऐलक, क्षुल्लक, ब्रह्मचारी गणों को ही अपने गुरु समझते हैं । पद्मावती, क्षेत्रपाल आदि देवी देवताओं की स्थापना तेरापंथी अपने मंदिरों में नहीं करते । प्रायः यही बीसपंथी और तेरापंथी आम्नायमें भेद है । बीसपंथके माननेवाले दक्षिण महाराष्ट्र और गुजरातप्रांत में अधिक हैं। तेरापंथके अनुयायी राजपूताना संयुक्त प्रांत, बुंदेलखंड आदि उत्तरी भागों में विशेष हैं । तारनपंथ के अनुयायी परवार गोलालारे आदि जातियों के कुछ लोग है । तारनपंथी मूर्तिको नहीं मानते, वे शास्त्रकी आराधना करते हैं। तारनपंथी अपने मंदिरोंमें मूर्तियों के स्थान में शास्त्र रखकर पूजा करते हैं । उनके मंतव्य, मूर्तिके विरोधमें, प्रायः श्वेताम्बरसम्प्रदायके स्थानकवासियों के समान हैं। जैनहितैषी - [ भाग १४ ऊपर कहा जा चुका है कि श्वेताम्बर संप्रदायमें भी स्थानकवासी, बीसपंथी आदि भेद हैं । स्थानकवासी, मूर्तिपूजाका विरोधी पथ है । इसके अनुयायी अपने साधुओंको ही पूज हैं । श्वेताम्बर संप्रदाय के लोग मूर्तियों में आँखें जड़वाकर आभूषण इत्यादिसे विभूषित कर पूजन करते हैं । दूसरे उनके सिद्धांत में स्त्रीमुक्ति, शूद्रमुक्ति, केवलि-भुक्ति और वस्त्रसबातोंके विरोधमें हैं । हित मुक्ति मानी है । दिगम्बर संप्रदाय इन इन बातों का तात्पर्य यही है कि जैन समाजमें बाहरी क्रियाकाण्ड - आचरणकी मतभिन्नता पर अनेक आम्नाय और पंथ हो गये हैं । वास्तवमें देखा जाय तो यही ज्ञात होता है कि क्या दिगंबर और क्या श्वेताम्बर दोनों संप्रदायके मूल और तात्विक सिद्धांत प्रायः एक ही हैं । किन्तु अज्ञानताके कारण जैन जनता आंतरिक बातों तक प्रवेश नहीं कर पाती, इसलिये केवल वंशपरंपराकी मान्यता कायम रखनेके लिये अपने अपने पूर्वजों के बाहरी क्रियाकाण्डके पंथाभिमान में खूब सन रही है । आम्नाय और पंथके हठमें जैनसमाज इतना उन्मत्त हो रहा है कि वह धर्मके नाम पर लाखों रुपया अपने ही भाई बन्धुओं से लड़नेझगड़ने में बर्बाद कर चुका, तौ भी उसको अकल नहीं आई । आवे कैसे ? उसे तो अपने अपने मत-पंथों का वर्चस्व कायम रखना है न । इसी मतपंथ की चढ़ा ऊपरीसे नित्य प्रति तीर्थों, और मंदिरोंके लड़ाई झगड़े खड़े होते हैं और उनसे सामाजिक उन्नतिमें बाधा पहुँचती है। जैनधर्मके अंतर्गत ऐसा कोई संप्रदाय, आम्नाय, मत-पंथ इत्यादि नहीं है जो स्याद्वादको नहीं मानता हो । तथापि स्याद्वाद धर्मके अनुयायी पंथहठ और क्रियाकाण्डमें इतने एकांती बन रहे हैं कि उन्हें जैनधर्मके मूल सिद्धांतों पर For Personal & Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११ ] जैन समाजकी दशा और उसके सुधार के उपाय । २८३ 2 सोचने, विचार करने और अनुभव करनेकी आविर्भाव होता गया । दिगम्बर समाजमें सबसे जरा भी इच्छा नहीं होती । स्याद्वाद ' पहले भा० दि० जैन महासभा, और दो एक शब्द केवल कहने मात्रके लिये रह गया है । विद्यालयोंकी स्थापना हुई। बाद में प्रांतिक सभास्याद्वाद के द्वारा वे अपने संप्रदाय और पंथके ओंका जन्म हुआ । दो एक पत्र भी निकलने विरोधको दूरकर एक नहीं हो सकते प्रत्युत, लगे । पहले पहले शिक्षाप्रचारका ही उक्त सभाओं स्याद्वादका दुरुपयोग कर धर्मके असली सिद्धां और पत्रोंमें खूब आंदोलन होता रहा । साथमें तोंसे सदैव अलग रहनेकी कोशिस किया जैनग्रन्थ भी छपने प्रारम्भ हो गये । तीर्थोंकी करते हैं । जैन जनताने अपने अपने पंथों रक्षा और प्रबन्धके लिये कमेटी बन गई। जगह और संप्रदाय के क्रियाकाण्डों को जानकर उसकी जगह बोर्डिंग और पाठशालाएँ भी खुलने लगीं । हठ कर लेना ही सम्यक् ज्ञान तथा श्रद्वान इसी प्रकार श्वेताम्बर सम्प्रदाय में भी उक्त प्रकामान लिया है और क्रियाकाण्डकी ओटमें रकी सभासुसाइटियाँ और भिन्नभिन्न संस्थाएँ मिथ्यारूढियों पर चलना ही चारित्र समझ खुलने लगीं। इन संस्थाओंके प्रारम्भमें, जबरक्खा है । इन्हीं बातोंसे जैनसमाजकी बड़ी तक उनके कार्यकर्त्ता योग्य रहे तबतक समाअधोगति हो रही है । सब जैन अपने अपने जका उक्त संस्थाओंसे गाढ़ प्रेम रहा । किन्तु सांप्रदायिक ग्रंथोंके क्रियाकाण्डके अनुसार ही समयकी गति से जैसे जैसे शिक्षाका थोड़ा अपना अपना आचरण रखते आ रहे हों, यह बहुत प्रचार होता गया, सभा सुसाइटियों की बात भी नहीं है । ग्रंथोंकी बातें तो सिर्फ अन्य भरमार होती गई और वह भी यहाँ तक कि पंधों से विरोध करनेके ही लिये हैं । आचरण समाजको उनका अजीर्णसा हो गया, उनके तो यही है कि सिर्फ अपने स्वार्थसाधनके कार्यकी ओर ध्यान देते हुए जनताको फल की भीतर जो जो बातें गर्भित हों उन्हींका वर्ताव आशां कम होने लगी, दूसरे चंदा देते देते किया जाय, बाकी श्रद्धा और झगड़नेके लिये लोग ऊब गये। बाद में कई संस्थाओं की कलई अलग रख दी जायँ । इसी पंथाचार की ओटमें खुलना प्रारंभ हुआ । इससे लिखे पढ़े लोगों का जैन समाज ने अपनी परंपराकी सामाजिक रूढ़ि - प्रेम सामाजिक संस्थाओंसे कम होने लगा । योंको भी धर्माचरणका स्वरूप देकर उन पर इसी अर्सेसे जैनपत्रोंमें विवादग्रस्त और आक्षेमुहर लगा दी है । पक लेख निकलना शुरू हो गये । दलबन्दियाँ प्रारम्भ हो गई । अर्थात् धीरे धीरे लिखे-पढ़े लोग भी परस्पर बिछुड़ते गये । इसका फल यह हुआ कि कुछ समय पहले छापेका प्रचारक और छापेका विरोधी ऐसे दो दल उत्पन्न हुए । इनके अनंतर संस्कृतज्ञोंका पंडितदल और अंग्रेजीके मर्मज्ञोंका बाबूदल बना । ये दोनों दल वर्तमानमें जारी हैं । इस तरह इन सभा सुसाइटियों और अन्यान्य संस्थाओंकी भरमारसे तथा दलबन्दियोंसे और भी अधिक भेदभाव बढ़ गया है। इससे धर्मकी उन्नति और प्रचार होना तो दूर रहा यह तो हुई साम्प्रदायिक पंथभेदोंकी बीमा'रीकी बात; अब विशेष रूपसे जैनसमाजके नये भेद प्रभेदों को देखिये । जबसे भारतवर्ष में पश्चिमी सभ्यता और शिक्षाका जोर शोरसे प्रचार हुआ, तबसे जैनसमाजपर भी इन बातोंका कुछ न कुछ प्रभाव पड़ता ही गया । धार्मिक उन्नति, सामाजिक सुधार और संगठन तथा शिक्षाप्रचार के लिये जैनसमाजमें भिन्न भिन्न सभा - सुसाइटियाँ, शिक्षा प्रदान करनेवाली • संस्थाएँ, और जैनसाहित्यप्रकाशक संस्थाओंका For Personal & Private Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८४ जैनहितैषी [भाग १४ केवल आपसहीमें शक्ति नष्ट हुई और हो रही जमें धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन, उन्नति है । सभा सुसाइटियोंकी मनमानी कार्यवाही और सुधारके लिये, वर्तमान समयतक होता और वर्षमें तीन दिनके बातूनी प्रस्तावोंसे न तो आया है वैसे ही हमारा धार्मिक और सामाजिक समाजका सुधार हुआ और न समाजका उचित पतन होता जा रहा है। इसका कारण यही है संगठन ही हुआ । इसके विपरीत समाज पूर्वकी कि हम लोग जैनसमाजके रोगकी वास्तविक अपेक्षा और भी छिन्न भिन्न हो गया। परीक्षा न करके आँख बंद किये केवल बाहरी ___ इसका कारण यही है कि जैनसमाजमें उपचार करते आये हैं जो समाजको पथ्यरूप अन्धश्रद्धा और रूढियोंकी गुलामीका बड़ा जोर होना तो दूर रहा उलटा अपथ्य हो रहा है । शोर है । जैनसमाजकी सभा, संस्थाएँ भी जैनधर्म और समाजकी उन्नति और सच्चे इन्हीं रोगोंसे आक्रान्त हैं । एक तो जैनसमाजमें सुधारके लिये निम्न लिखित उपाय काममें लाना अन्य जातियोंकी अपेक्षा शिक्षाकी बहुत ही कमी होगा तभी वास्तवमें उन्नति होगी, ऐसी लेखकहै । जो थोड़ी बहुत शिक्षा आजकल जैनछात्रों- की दृढ भावना हैको दी जाती है वह भी उक्त रोगके संक्रमणसे (१) सबसे पहले जैनसमाजके अंतर्गत खाली नहीं । पिछले दश वर्षों में (सन् भेद भावों ( आम्नाय, मत, पंथ और संप्रदाय १९१० से आजतक ) भारतके राजनैतिक, इत्यादि) को मिटाने के लिये जैनधर्मके वास्त. सामाजिक और आर्थिक आकाशमंडलमें बड़ाभारी विक मूल सिद्धांत अध्यात्मका खूब जोर शोरसे परिवर्तन हो चुका है जिसके होनेकी कल्पना प्रचार करना चाहिये, ताकि जैन जनताकी भविष्यतमें सौ पचास वर्षांतक नहीं थी। इसका नस नसमें आध्यात्मिक भाव जागृत हो उठे । कारण यूरोपीय महा समर है । यद्यपि यह महा- आध्यात्मिक भावोंकी जागृति होने पर स्वयं ही समर स्थगित हो गया तथापि अंतर्राष्ट्रीय विप्लव- बाहरी भेदभाव नष्ट होने लगेंगे और अभेकी अग्नि जहाँ तहाँ भड़क रही है और संभव दभावकी वृद्धि होने लगेगी। दूसरे आध्यात्मिक है कि थोड़े ही समयमें संसारमें महाप्रलयका भावोंकी जागृति हो जानेपर जैनसमाज मिथ्या युद्ध फिर आरंभ हो जाय । इन्हीं बातोंसे संसा- रूढ़ियोंकी गुलाम न बनी रहेगी, बल्कि देश, रके सभी देशोंमें जनताकी राष्ट्रीय, सामाजिक काल, भावकी परिस्थितियों और आवश्यकताओंके गति बड़ी तीव्रतासे बदल रही है । ऐसी अव- मार्ग पर चलने लगेगी। उसके सब बनावटी ढोंग स्थामें भी हमारे जैनसमाजकी सभा, सुसाइटियाँ और असमयानुकूल दानकी प्रवृत्ति मिट जायगी। और भिन्नभिन्न संस्थाएँ भारतके उसी वातावरणमें (२) आध्यात्मिकताके साथ ही साथ जैनलीन हो रही हैं जो आजसे लगभग २०-२५ समाजमें नीतिपथका विचार और प्रवृत्ति बढ़ावर्ष पूर्व था । यह बात प्रत्येक व्यक्तिको अपने नेकी योजना करनी चाहिये । नीतिपथके वर्तहृदय-पटपर लिख रखना चाहिये कि प्रत्येक मानमें तीन भेद हैं-व्यक्तिगत, सामाजिक, समाजका देशसे अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध है और और राष्ट्रीय ( राजनैतिक )। जैनधर्मके ग्रन्थों में देशकी गतिके अनुसार ही उसे अपनी गति, वर्णित क्रियाकाण्ड जिसे हम मोक्षमार्गका बाह्य अपना अस्तित्व कायम रखनेके लिये, बदलनी चारित्र मानते हैं उसकी रचना यद्यपि नीतिके पड़ती है । और यह बात हमारे जैनसमाजमें सिद्धांतों पर अवलम्बित है, तथापि हमें वर्ततथा उसकी सभा संस्थाओंमें नहीं है। इसी लिये मान द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावके अनुसार सर्वअनेक आन्दोलनोंके होते हुए भी समाजका सुधार व्यापी, सुगम, और उपयोगी बनाने के लिये नहीं होता । बल्कि समाजकी शक्ति दिन पर उसमें कई प्रकारके परिवर्तन करने होंगे और दिन क्षीण ही होती जा रही है । जैसे जैसे समा- यह बात पूर्वाचार्यों के शासनभेदसे भी भली; For Personal & Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] जैनसमाजके शिक्षित। भाँति सिद्ध होती है कि चारित्र मार्गके नियमोंमें जैनसमाजके शिक्षित । समयानुकल परिवर्तन प्राचीन परंपरासे होते । आ रहे हैं। किन्त चारित्रकी मूल नींव-नीति- (खासकर, बाबूलोग।) नष्ट नहीं हुई और न इसे कभी नष्ट ही होने देना चाहिये । नीतिकी उत्कृष्टता ही व्यक्ति, समाज, देश और धर्मको उज्ज्वल करती है। जिस (ले०-श्रीयुत बाबू सूरजभानजी वकील ।) ..व्यक्तिमें जितना अधिक नैतिक बल होगा उतना . प्रत्येक जातिकी उन्नति उसके पढ़े लिखे ही वह व्यक्ति पूज्य और मोक्षमार्गका अनुगामी बनता जायगा । समाज और देशकी नीति . विद्वानों और समझदारों पर ही निर्भर होती जितनी उदार, पक्षपातरहित, सत्यमार्ग पर अव- है । वे ही संसारकी गतिको, जातिकी वास्तविक लंबित होगी उतना ही उस समाज और देशका . दशाको, और उसे उन्नति शिखर पर चढ़ाने मुख उज्ज्वल होता रहेगा। कोई भी देश और समयोचित उपायोंको जान सकते हैं और वे ही समाज कितना ही धनवान् और शिक्षित क्यों. उन उपायोंका जातिमें प्रचार तथा प्रसार कर न हो, यदि वह आध्यात्मिकताके भाव और नीति- सकते हैं। हमारी इस जैनजातिमें भी विद्वानोंकी पथसे गिरा हुआ हो तो उसकी उन्नति नहीं बल्कि कमी नहीं है । भारतवर्षकी ३० करोड़ प्रजामें अधोगति ही समझिये। उसी प्रकार धर्मको यद्यपि जैनियोंकी संख्या केवल बारह लाख ही उत्कृष्टताकी कसोटीपर जाँचने के लिये प्रत्येक रह गई है अर्थात भारतके २५० मनष्यों में धर्मकी नीति जाँच कर ही तुलना होती है। जिस केवल एक ही जैनी है, और यह १२ लाखधर्म में नीति जितने अधिक परिमाणमें होती है, की संख्या भी तब ही है जब कि संपूर्ण दिगम्बर, वह धर्म उतना ही अधिक उत्कृष्ट गिना ताम्बर और स्थानकवासियोंको इकट्रा गिन जाता है । अहिंसा, सत्य आदि पंच अणवत और महावत आदि जैनधर्मकी नीति के मूल सिद्धांत लिया जाता है । यदि प्रत्येक सम्प्रदायवाले हैं, परन्तु इस समय जैनियोंमें कोई भी ऐसा केवल अपनी ही सम्प्रदायके लोगोंको जैनी गृहस्थ या त्यागी नहीं निकला जो अपने धर्म- मानें और दूसरोंको मिथ्याती जानें, जैसा कि की नीतिको समयानुकल वर्तावमें लाकर धर्मका आजकल हो रहा है, तब तो उनकी गणनाके मुख उज्ज्वल करता । परन्तु, धन्य है कर्मवीर अनुसार जैनी केवल ४ लाख ही रह जाते हैं महात्मा गाँधीको-जिन्होंने अजैन होते हुए भी अर्थात् भारत के ७०० मनुष्योंमें केवल एक ही अहिंसा और सत्यके सिद्धांतको अपनाकर, उसे जैनी गिनने में आता है । आजका हमारा यह समयानुकूल स्वरूप देकर, अपने देशके उद्धारमें लेख भी दिगम्बर सम्प्रदायके ही विषयमें होनेके लगाते हुए संसार भरको चकित कर दिया है। कारण हम भी इस लेखमें दिगम्बर जैनियोंको इसी समयानुकूल परिस्थितिके अनुसार हमें अब ही जैनी मानते हैं और उनकी संख्या ज्यादासे अपने धर्मनीतिके प्रायः सभी नियम उपनियम ज्यादा ५ लाख अनुमान करके भारतके ६०० , बदलने होंगे और उन्हें समाज और देशकी मनुष्योंमें एक जैनीकी गणना करते हैं । इस वर्तमान गतिके अनुकूल व्यापक स्वरूप देना। प्रकार, इस समय, यद्यपि जैनियोंकी संख्या होगा, ताकि हमारी धार्मिक और लौकिक उन्नति उन्हीं व्यापक नियमों पर चलनेसे एक ही बार बहुत ही थोड़ी बल्कि न होनेके ही समान रह . • साथ होती रहे। गई है तो भी अपनी इस थोड़ीसी संख्याकी अपेक्षा इस जातिमें विद्वानोंकी कमी किसी For Personal & Private Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ प्रकार भी नहीं है । क्योंकि जब भारतके ६०० अपने अपने हाईस्कूल, बोर्डिंग और कालिज मनुष्योंमें केवल एक ही जैनी है तब भारतके बना लिये हैं और बनाती चली जा रही हैं, ६०० विद्वानोंमें यदि एक भी जैन विद्वान हो तो जिनमें अपनी अपनी जातियोंके बालक इकट्रे जातिमें विद्वानोंकी कमी नहीं कही जा सकती। रह कर विद्याध्ययन करते हैं, अपना धर्म कर्म परन्तु जातिमें तो इससे कई गुणे विद्वान् पाये सीखते हैं और अपनी जातिके प्रेमका पूर्ण जाते हैं । उदाहरणके लिये यदि इस समय संस्कार प्राप्त करते हैं; परन्तु हमारी अधिकांश 'भारतके विद्वानोंकी संख्या ६० हजार भी मान जाति अभी तक अपने बालकोंके लिये अपने ली जावे तो जैनियोंमें १०० विद्वानोंका होना स्कूल, बोर्डिंग और कालिज बनाना पाप ही ही काफी हो जाता है । परन्तु देखते यह हैं समझ रही है । उसके धर्माधिकारी और मोक्ष'कि जैनियोंमें इस समय कमसे कम १०० विद्वान पथप्रदर्शक विद्वान् भी चिल्ला चिल्ला कर और तो संस्कृतविद्याकी उच्च उपाधियोंसे विभूषित पुकार पुकार कर जातिको ऐसे कामोंसे रोक रहे हैं और २०० विद्वान् अंग्रेजीकी बी० ए० और हैं और ऐसे कामोंमें रुपया देनेको कुदान बता एम० ए० आदिकी उपाधियाँ-प्राप्त हैं। इस प्रकार रहे हैं । इस कारण इस जातिके बालक बहुत कमसे कम ३०० विद्वान मौजूद हैं, जिससे करके अन्य जातियोंके ही स्कूल कालिजोंमें हमको बड़े अभिमानके साथ यह कहनेका पढ़ते हैं, उन्हींके बोर्डिंगोंमें रह कर उन्हींकी साहस होता है कि अन्य जातियोंकी अपेक्षा बातें सीखते हैं और उन्हींके संस्कार प्राप्त करते जैनजातिमें तिगुणे विद्वान् हैं । परन्तु ऐसा हैं-यहाँ तक कि, ईसाइयोंके स्कूलों और कालिहोने पर क्या अन्य जातियों की अपेक्षा इस जोंमें पढ़नेकी हालतमें तो वे उनके धर्मग्रन्थोंको जैनजातिकी उन्नति भी तिगुनी हो रही है ? भी कंठस्थ करते हैं, नित्य प्रति उनकी नमाज उत्तरमें शोकके साथ कहना पड़ता है कि 'नहीं;' या प्रार्थनामें शामिल होते हैं और उनके धर्मो यह जाति तो अन्य जातियोंकी बराबरी भी पदेशोंको सुननेके लिये भी वाध्य किये जाते हैं। - नहीं कर रही है बल्कि उनसे बहुत नीचे गिरी इससे अधिक गिरी हुई दशा जातिकी और क्या हुई है और ज्यादा ज्यादा गिरती चली जाती हो सकती है ! है । दृष्टान्तरूपसे विचार कीजिये कि मनुष्य- भ्रातृभाव, परस्परकी प्रीति और ऐक्यमें गणनाके अनुसार भारतकी अन्य जातियाँ तो भी यह जाति अन्य जातियोंसे बहुत नीचे गिरसंख्यामें बढ़ती चली जा रही हैं, जिससे पिछले गई है । एक समय था जब यह जाति संख्यामें ३० वर्षके अंदर ही भारतके लोग २८ करोड़से अल्प होते हुए भी अपने वात्सल्य और ऐक्यके ३३ करोड़ हो गये और अबकी मनुष्यगणनामें कारण सब कुछ शक्ति और गौरव प्राप्त किये आशा है कि वे ३५ करोड़ हो जावेंगे; परन्तु हुए थी और अन्य बड़ी बड़ी जातियोंसे किसी जैनजाति इन ही पिछले ३० वर्षों में घटते घटते बातमें भी कम नहीं समझी जाती थी; परन्तु १५ लाखसे १२ लाख रह गई है और भय है कि अब तो इसने अपने इस अमूल्य रत्नको भी कहीं अबकी मनुष्यगणनामें वह १०-११ लाख खो दिया है और आम्नायभेद, पंथभेद, सम्प्रही न रह जावे ! इससे अधिक अवनति और दायभेद, जातिभेद, आदि अनेक भेदोंके द्वारा अधोगति और क्या हो सकती है ? इसही प्रकार ईर्षा और द्वेषका अटल राज्य ही स्थापित कर भारतकी अन्य सब ही जातियोंने स्थान स्थानपर दिया है। यह गिरते गिरते यहाँतक गिर गई है . For Personal & Private Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११ ] कि गाँव गाँव और नगर नगरमें अनेक गोठें तथा धड़े खड़े होकर धर्मकार्यों में भी लड़ाई दंगे होने लग गये हैं, कहीं कहीं मंदिरोंतकको भी ताले लग जाते हैं, कहीं कहीं अनंत चौदसके दिन दो दो उत्सव निकलने लगते हैं और कहीं अन्य प्रकार से ही कहींके जैनीभाई अपनी फूट दिखाकर जैनधर्मकी प्रभावना करते हैं ! जैन समाजके शिक्षित । व्यर्थव्यय और कुरीतियोंने तो मानो इस जातिमें अपना अड्डा ही बना लिया है और यहाँ तक काबू पाया है कि चाहे कोई कितना ही कमावे, अपने बाल बच्चोंके खाने पहनने और पालन-पोषण में चाहे जितनी कमी करके कौड़ी कौड़ी बचावे तो भी जातिकी रीति : रस्मोंका पूरा नहीं पड़ सकता यहाँतक कि, घरकी सब पूँजी लगा देने और जितना कर्ज मिल सकता हो वह सब लेकर लुटा देने पर भी बिरादरी के स्त्रीपु - रुषों के मुख से यही सुननेमें आता है कि ' कुछ नहीं किया, ' अपने बाप-दादाओंका नाम भी डबो दिया। कुरीतियोंके विषयमें तो इससे अधिक और क्या कहा जाय कि आठ आठ दस दस वर्षके बच्चोंतकके ब्याह इस जातिमें होते हैं, पचास पचास साठ साठ बरसके बुड्ढों को उनकी पोतियों के बराबर दस दस बरसकी नन्हीं नन्हीं बच्चियाँ इस जातिमें बेची जाती हैं और ये बुड्ढे उनको गोद खिलाने के स्थान में अपनी जोरू बनाते हैं, विवाह रचाकर दोनों तरफकी बिरादरी के सामने उनसे फेरे फिरवाते हैं और बिरादरी के लोग लड्डू कचौरी खाकर बिलकुल मुँह सियेसे रह जाते हैं-चूँ तक भी नहीं करने पाते। इसी प्रकार बिरादरीके किसी भाईके जाने पर नुक्ता कराने और हलवा पूरी खानेमें भी ये लोग कुछ नहीं शरमाते, बल्कि जो न खिलावे उसीको उलटा शरमाते हैं और यदि बस जा तो जाति से ही बाहर कर दिखाते हैं। ऐसी ऐसी बातोंके कारण यदि जातिका चल २८७ नीचातिनीच दशाको पहुँच जाना मान लिया जाय तो इसमें कुछ भी आश्चर्य न होगा । जब धर्मकी तरफ खयाल करते हैं तो उसकी भी ऐसी ही दशा पाते हैं । अव्वल तो इस जैनजातिमें मिथ्यातका ही इतना भारी प्रचार है कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता | हिन्दू मुसलमानोंके देवी देवताओं समाधियों और कबरों को खुल्लमखुल्ला पूजनेवाले, हिन्दू मुसलमानोंके यंत्रों मंत्रों तथा गंडे तावीजोंको माननेवाले और हिन्दू ब्राह्मणोंसे उनके अनेक अनुष्ठान करानेवाले जैनियोंकी इस समय कोई कमी नहीं है; बल्किसे सबसे बढ़िया बात यह हो रही है कि विवाहसंस्कार तक कई प्रान्तों में बहुत करके हिन्दूधर्मकी ही विवाहपद्धति ही अनुसार होता है, जिसमें उन्हींके सब देवताओं का पूजन किया जाता है और उन्हीं के धर्मकी सब क्रियायें होती हैं । इस प्रकार जब कि दोनों ही पक्षोंकी बिरादरी के सामने और और अनेक नगरोंके भाइयोंके सन्मुख ही विवाह जैसे महान संस्कार में मिथ्यात्वका सेवन होता है तब इस जातिमें मिथ्यात्व के प्रचारकी हद्द ही क्या रह जाती है ? यह ठीक है कि अनेक स्थानों पर जैनपद्धतिके अनुसार भी विवाह होने लग गये हैं परन्तु जब उनमेंसे किसी किसी स्थान से यह बात भी सुननेमें आती है कि एक पक्षकी तरफसे जैनपद्धतिके अनुसार विवाह होनेका महान् आग्रह होने पर भी दूसरे पक्ष जैनियोंने इस बातको नहीं माना और लाचार वह विवाह हिन्दू विवाहपद्धति के अनुसार ही हुआ तो क्या ऐसी दशा में यह कहना अनुचित हो जाता है कि जैनजातिमें मिथ्यात्वका पूरा पूरा साम्राज्य हो गया है ? जातिके सन्मान और पूछ-प्रतीतिके विषय में भी जब कुछ गौर किया जाता है तो ऐसी ही गिरी हुई हालत नजर आती है । व्यापारी जाति For Personal & Private Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी भाग १४ होनेके कारण यद्यपि इस जातिके लोग अन्य रियोंको थोड़ा थोड़ा माल बेचकर ही अपनेको पुरुषोंकी अपेक्षा सरकारको कई गुणा ज्यादा महान व्यापारी समझने लग जाते हैं । रहे ग्रामोंके टैक्स देते हैं, और अनेक प्रकारके सरकारी दूकानदार, सो वे तो अपने ग्राममें प्रति सप्ताह चंदों तथा कोंमें भी भर भर थैलियाँ रुपयोंकी पीठ (हाट) भरने पर एक दिन अर्थात् महीनेमें देकर सरकारका खजाना भरते रहते हैं । परन्तु चार दिन ही कुछ कमा पाते हैं और बाकीके फिर भी सरकारमें इस जातिका सम्मान, राज्य- २६ दिन हाथ पर हाथ धर कर प्रायः खाली प्रबन्धमें इस जातिकी सम्मतिका वजन और ही बैठे रहते हैं या ताश-गंजफा खेल कर और इसकी पुकार तथा चिल्लाहट पर सरकारका चिलम तम्बाकू पीकर अपने दिन बिताते हैं । ध्यान इतना भी नहीं है जितना कि बहुत ही इस प्रकार जिधर भी दृष्टि डाली जाती है कम टैक्स देनेवालों या बिल्कुल ही न देनेवालोंसे उधर इस जातिकी प्रत्येक विषयमें ही अत्यंत सम्बंध रखता है । कारण इसका यही है कि हीन दशा दिखाई देती है । नतीजा इसका यही इस जाति के लोगोंके हृदयमें स्वयं अपनी प्रतिष्ठा निकलता है कि यद्यपि इस जातिमें भारतकी नहीं है, वे जैसे बने तैसे रुपया कमाते रहने अन्य जातियोंकी अपेक्षा तिगुणे विद्वान हैं और उस रुपयेको जातिकी रीति-रस्मोंमें आँख परन्तु वे अपना कुछ भी कर्तव्य पालन नहीं कर मीच कर लुटाते रहनेकी अपने आपको केवल रहे हैं। शास्त्री, आचार्य, विशारद और तीर्थ एक मशीन समझते हैं । इसी कारण जड़ आदि उपाधिधारी संस्कृतके विद्वानोंको तो पदार्थके समान ज्ञानशून्य रहकर न तो वे व्याकरणके सूत्रोंको घोकने, शृंगारादि रसोंसे संसारकी गतिका ही कुछ अनुभव प्राप्त करते हैं भरे हुए काव्योंका मनन करके संस्कृत भाषाकी. और न राज्यकी नीति--रीतिको ही समझनेकी जानकारी प्राप्त करने और नयप्रमाणके भेदकोई कोशिश करते हैं। प्रभेदों तथा लक्षणोंको याद करनेमें ही अपना . रही व्यापार और कमाईकी बात, सो इसका बहुत समय बिताना पड़ता है। साथ ही धर्मभी उनको कुछ विशेष ज्ञान नहीं है और न ग्रन्थोंको भी बहुत करके कंठस्थ ही कर लेना इस व्यापारविद्याको वे सीखना ही चाहते हैं। होता है। उन्हें न तो जातिकी दशाका ही कुछ वे तो बहुत करके बचपनमें औंचे-दौंचे विकट- अनुभव होता है और न संसारकी गतिका। जैनपहाड़े याद कर लेना ही जानते हैं; फल जिसका शास्त्रोंको घोक कर वे यह कहना तो जरूर यह हो रहा है कि यूरुपके व्यापारी बड़े बड़े सीख जाते हैं कि प्रत्येक कार्य अपने द्रव्य, क्षेत्र, कालिजोंमें व्यापारकी उच्च शिक्षा प्राप्त करके काल, भावके अनुसार होता है, परन्तु उनको इस और पोलिटिकल इकानोमीकी पूर्ण शिक्षा पाकर बातकी जराभी खबर नहीं कि अब क्या समय हिन्दुस्तानमें आते हैं और सोना, चाँदी, रूई, बीत रहा है, कैसी हवा चल रही है, कैसा राज्य अनाज आदि सब ही वस्तुओंका बाजार अपने है, किन लोगोंसे हमको वास्ता पड़ रहा है, क्या हाथमें कर लेते हैं और हिन्दुस्तानके मूर्ख हमारी योग्यता है और क्या दशा है; बल्कि व्यापारी सोचते ही रह जाते हैं कि क्यों एक- वे तो रूढिके दास बनकर सीधा मार्ग यह ग्रहण दम अमुक वस्तुका भाव घट गया और अमुकका कर लेते हैं कि जो कुछ भी प्रचलित है-चाहे वह बढ़ गया । वास्तवमें ये लोग तो आपसमें सट्टा लाभदायक हो या हानिकारक, समयके अनुकूल लगाकर या दलाली करके अथवा विदेशी व्यापा- होया प्रतिकूल-उसहीका पोषण करना और उसके For Personal & Private Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] जैनसमाजके शिक्षित। २८९ विरुद्ध जो कोई कुछ कहे उसको नास्तिक धर्म- महान कार्योको सम्पादन करते हैं और इस कारण ज्ञानशून्य आदि कहकर उसके पीछे पड़ जाना। वे धनमें, पदमें, मानमें, अधिकारमें और संसारके ऐसा करनेमें न तो उनको कोई हेतु ढूँढ़ना अनुभव आदि सब ही बातोंमें अपने संस्कृत पड़ता है और न किसी प्रकारके अनुभव प्राप्त विद्वानोंसे कई गुना बढ़िया रहते हैं, अतः सच करनेकी ही जरूरत होती है। क्योंकि इधर अपने पूछिये तो जातिकी उन्नतिका भार इन्हीं वाबू अनुकूल आवाज निकालते हुए देखकर साधारण लोगोंपर है न कि प्राचीन विद्याके जानकर जनता तो इनकी वाहवाही करने लग जाती है, बेचारे संस्कृतके विद्वानोंपर ! परन्तु शोक है कि और उधर ये पंडित लोग भी जाति भरको अपना इन बाबूलोगोंने अपने कर्तव्यका कुछ भी पालन साथी देखकर अपनी महाविजय समझ बैठते हैं। नहीं किया, बल्कि यों कहिये कि इन्होंने उसकी इन्हें इस बातका जरा भी खयाल नहीं आता कि ओर ध्यान भी नहीं दिया । हमारे संस्कृतके हमारा तो यह कर्तव्य था कि हम नासमझ विद्वान् यद्यपि जातिकी उन्नतिका कोई विशेष लोगोंको लोकमूढ़ताओं और रूढियोंके पंजेसे कार्य नहीं कर रहे हैं तो भी जातिकी पाठशानिकालकर समयानुकूल सत्यपथपर ले जावें, सो लाओंसे अध्यापक बनकर अपनी विद्याका लाभ न करके हम तो उलटा उन्हींके पथपर चलने अपनी जातिको जरूर पहुंचा रहे हैं, परन्तु लग गये हैं और उन्हीकी बोली बोलते हैं; इस हमारे बाबू लोग बिलकुल ही मौन हैं । वे न तो कारण हमारी तो बहुत ही भारी हार तथा जातिके प्रति अपना कुछ कर्तव्य समझते हैं, पतित दशा हो गई है। और न उसके लिये अपनी कुछ शक्तिका व्यय .. अब रहे बी. ए. और एम० ए० आदि ही करते हैं । ऐसी हालतमें यदि यह कहा जाय पदवीधारी हमारे बाबूंलोग, जो संख्यामें हमारे कि इनमें और जातिके अन्य साधारण अनपढ़ संस्कृत विद्वानोंसे दुगने तथा तिगने हैं । इनसे लोगोंमें कुछ भी अन्तर नहीं है, तो कुछ भी जातिकी उन्नति होनेकी बहुत ज्यादा आशा अनुचित न होगा। थी, क्योंकि इन्होंने प्राचीन संस्कृत भाषाके बल्कि हमारी रायमें, एक प्रकारसे, इन बाबू स्थानमें वह प्रचलित अंग्रेजी भाषा सीखी है जो लोगोंके कारण जातिकी उन्नतिमें बड़ी भारी इस समय भारतकी राज्यभाषा हो रही है, बाधा पहुँच रही है। ये लोग. यों तो सबहीको जिसके द्वारा इस समय संसार भरका व्यापार मूर्ख ठहराकर बड़ी बड़ी ऊँची बातें बनाया करते चल रहा है और जगत भरको प्रत्येक विषयकी हैं, सब ही रीतिरिवाजोंको दूषित बताया करते हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त हो रही है । इसके सिवाय हमारे परन्तु जब इनके यहाँ कोई ऐसा कारण आन संस्कृतके पंडित तो इस समय अपनी विद्याके पड़ता है, जिसमें बिरादरीके सम्मलित होनेकी द्वारा ज्यादासे ज्यादा १००-१२५ रुपये मही- जरूरत होती है तो बुरीसे बुरी और फिजूलसे नेका ही रोजगार प्राप्त कर सकते हैं और वह भी फिजूल रीतियोंको भी ये उस ही तरह पूरा करने प्रायः जैनपाठशालाओंके अध्यापक बनकर, लग जाते हैं जिस तरह कि मूर्ख स्त्रियाँ किया परन्तु हमारे अंग्रेजीके विद्वान तो अपनी विद्याके करती हैं; यहाँतक कि जिन छोटी मोटी रीतिद्वारा राज्यमें ही हजारों रुपये महीनका रोजगार योंको बिरादरीके लोग भी उपेक्षाकी दृष्टिसे पा लेते हैं और वकील, डाक्टर, इंजीनियर तथा देखते हैं और कोई उनको करे या न करे अथवा . न्यायाधीश आदि बनकर संसारके अनेकानेक जिस प्रकार चाहे करे इसकी कुछ भी परवाह For Personal & Private Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ नहीं करते हैं ऐसी फिजूल रीतियोंको भी ये बाबू और पानीका बरफ आदि भी पीने लग जाते हैं, लोग ज्योंकी त्यों ही करके दिखाते हैं। उनके कोई कोई बाजारोंमें बिकते हुए बिस्कुट भी ऐसा करनेसे रूढ़ीके दासोंकी बड़ीभारी मजबूती खाने लगते हैं और इस बातकी जरा भी परवाह हो जाती है और सबहीके हृदयमें यह बात नहीं करते हैं कि इन सोडावाटर, बर्फ, बिस्कट जम जाती है कि रूढ़ियाँ तो ऐसी अटल और आदिके बनानेमें पानी चमड़ेकी मशकका वर्ता पालन करने योग्य होती हैं कि बड़ी बड़ी बातें गया था या काँसे पतिलके कलशोंका और इनके बनानेवाले बाबूलोग भी उन पर चलना अपना बनानेमें क्या क्या मसाला डाला गया था। इस परमधर्म समझते हैं। फल इसका यह होता है प्रकारकी अन्य भी अनेक ढीलें इनके खानकि अगर जातिका कोई साधारण मनुष्य किसी पानमें हो जाती हैं, जैसा कि कभी बगैर कुरीति या दुखदाई रूढिको तोड़ना या किसी- नहाये या बगैर कपड़े उतारे ही रोटी खा प्रकारकी लोकमूढ़तासे निकलना चाहता है तो लेना, रोटी खाते समय कोई एक आध कपड़ा भी लोग उसके विरोधी हो जाते हैं और उदा- पहने रहना, रोटी खाते हुए यदि किसी अन्य हरणके तौर पर कहने लग जाते हैं कि जब जातिके हिन्दूका हाथ उसके किसी कपड़े ऐसे ऐसे बाबूलोग भी इन रीतियोंका पालन या शरीरसे छू जाय तो खाना नहीं छोड़ना, करते हैं तो इनको छोड़नेका तुम्हारा साहस तो बाजारकी कचौरी पूरी या मिठाई आदिक महामूर्खता और पागलपनके सिवाय और कुछ खाने लगना, मेज पर रखकर भी खा लेना, भी नहीं हो सकता है। इस प्रकार इन बाबूलोगोंके अन्य जातिके हिन्दू मुसलमान बालकोंके पास उदाहरणसे जातिमेंसे कोई भी कुरीति दूर होने बैठे हुए भी खा लेना, बूट पहने हुए पान चबाना नहीं पाती, बल्कि कुरीतियाँ ज्यादा ज्यादा मज- या इलायची आदिक खा लेना और सूतकी बूत होती जाती हैं। बनी हुई दरी तथा फर्श पर बूट पहने ही ___परन्तु ये बाबूलोग ऐसा करते क्यों हैं ? फिरते रहना, इत्यादि। कारण इसका यह है कि बी० ए० और एम० विद्याध्ययनके इस बहुत बड़े लम्बे चौड़े ए. की उपाधि प्राप्त करने और फिर उसके पीछे कालमें इस प्रकारकी ढीलोंका इन्हें इतना विकालत इंजीनियरी या डाक्टरी आदि पास अधिक अभ्यास हो जाता है कि अपने कारकरनेतकके लिये इन बाबू लोगोंको पाँच सात. बारी जीवनमें इन ढीलोंको छोड़कर फिरसे वर्षकी उमरसे लेकर २३-२४ वर्षकी उमरतक प्राचीन बंधनोंका ग्रहण करना इनके लिये प्रायः बराबर विद्याध्ययनमें लगा रहना पड़ता है, असम्भव हो जाता है । इनकी आजीविका भी समें अनमान दस बारह वर्ष तो उनको अपने बहुत करके ऐसी ही होता है जिसमें इन्हें अपने मा-बापोंसे अलग किसी बोर्डिंगमें ही रहना जैसे अंग्रेजी लिखे पढ़ोंकी ही अधिक संगति होता है जहाँ इनका रातदिनका समागम हिन्दू रहती है और अनेक अंग्रेजी दफ्तरोंमें नित्य मुसलमानोंकी अनेक जातिके बालकोंसे रहता उन्हीं सूतके बने हुए दरीफर्शीपर बैठकर है । इसलिये इनकी खान-पानकी छूत-छात बहुत दफ्तरका काम करना होता है जिन पर भंगी ढीली पड़ जाती है-यहाँतक कि इनमेंसे बहुतसे ही झाडू देता है । इस वास्ते अपनी इस तो चूढ़े-चमारों और हिन्दू-मुसलमान आदि चाहे चिराभ्यस्त परिणतिको छोड़कर नवीन प्रका- . जिस जातिके लोगोंका बनाया हुआ सोडावाटर रके कठिन बंधनोंमें पड़ना उन्हें और भी For Personal & Private Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] जैनसमाजके शिक्षित। २९१ मुश्किल हो जाता है, अतः वे कारोबारी हो- ७-८ वर्षकी उमरसे लेकर २३-२४ वर्षकी कर भी छतछातके विषयमें अनेक प्रका- उमर तक बराबर अंग्रेजी भाषाका ही अभ्यास रसे ढीले ही रहते हैं, परन्तु यह संकोच उनके करते करते और इस अभ्यासमें निपुण होनेके हृदयमें जरूर रहता है कि ऐसा करनेसे हम वास्ते अपने साथके विद्यार्थियों तथा पाठकोंके साथ अपने जाति भाइयोंसे ताके अवश्य जाते हैं, साथ भी हरवक्त अंग्रेजीमें ही बात चीत करते करते ही वे यह भी जानते हैं कि जातिका पृथक् और कारबारी होने पर अपने पदका सब काम पृथक् व्यक्ति तो हमारे प्रभावसे सामने कुछ बोल भी अंग्रेजीमें ही करते रहनेसे इनको इस भाषाका नहीं सकता और यदि कुछ आक्षेप करता भी है इतना अधिक अभ्यास हो जाता है कि ये लोग तो उसकी कुछ चलती नहीं, परन्तु मरने जीने या परस्पर सदा अंग्रेजीमें ही बातचीत करते हैं विवाह शादी आदिके अवसरोंपर जब बिरादरीके और यदि देशभाषा भी बोलते हैं तो उसमें सब लोग इकटे होते हैं उस समय जातिके प्रत्येक भी आधे शब्द अंग्रेजीके बोल जाते हैं, यहाँ मनुष्य में ही समूहका • बल आजाया करता है, तक कि, अनपढ़ नौकरों चाकरोंसे बातचीत इस कारण उस समय छोटेसे छोटा आदमी .. करते हुए भी इनकी जबानसे कोई न कोई भी जातिके बड़े बड़े सर्दारोंपर आक्षेप करनेका शब्द अंग्रेजीका निकले बिदून नहीं रहता । ये साहस कर बैठता है और उसका वह आक्षेप लोग अपने घरका हिसाब किताब तथा अन्य बहत कुछ कार्यकारी भी हो जाता है । ऐसा प्रकारकी कोई याददाश्त भी अंग्रेजीमें ही । विचार कर ये बाबूलोग नित्य तो चाहे जैसी स्वच्छन्दतासे रहते हैं परन्तु बिरादरीके इकट्ठा व्यवहार भी अंग्रेजीमें ही किया करते हैं । ऐसी सा लिखते हैं और जहाँ तक हो सकता है पत्र-... होनेके अवसरपर बिल्कुल उन्हींका अनुकरण करने लग जाते हैं और छूतछात आदि सबही . दशामें इनको उन लोगोंसे मिलना जुलना और प्रकारके बंधनोंको पूरा पूरा पालके दिखाते हैं; र बातचीत करना बहुत ही मुश्किल तथा अरुबल्कि कभी कभी तो वे उस समय सर्वसाधारणसे १चिकर होता है जो अंग्रेजी नहीं समझ सकते हैं। भी आगे बढ़ जाते हैं और छूतछात आदि प यही कारण है कि देशभाषामें लिखी हुई पुस्तबंधनोंका खूब ही बढ़िया स्वांग बनाकर लोगोंके कोंका पढ़ना भी उनको अच्छा नहीं लगता, वे प्रशंसापात्र बनते हैं । ऐसा करनेके लिये उनको अपने प्यारे धर्मसे जानकारी प्राप्त करनेके वास्ते अपनी विचारबुद्धिके अतिरिक्त जाति से भी अंग्रेजी पुस्तकोंकी ही इच्छा रखते हैं, जिनके लोगोंका उदाहरण भी मिल जाता है जो मदि- न मिलनेके कारण उनको जन्मभर धर्मसे अन-- रापान और वेश्यागमन आदि अनेक महा कुक- जा जान ही रहना होता है । इसके सिवाय विद्यामाँसे दूषित होने पर भी जाति-बिरादरीके जी- ध्ययनके बहुत बड़े लम्बे समयमें रातदिन वनमें पूरी पूरी छूतछात दिखानेसे जातिले अंग्रेजी साहित्यका ही अध्ययन करते करते प्रशंसाभाजन ही बने रहते हैं, साथ ही ऐसे उनका "" उनको उनही विषयोंकी चर्चाका व्यसन हो धनवानोंका दृष्टान्त भी बहुत असर करता है जाता है जिनकी मुख्यता और बहुलता जो नित्य स्वच्छन्दताके साथ जीवन व्यतीत अंग्रेजी साहित्यमें पाई जाती है, और जिनकी करते हुए भी बिरादरीसंबंधी रीतिरिवाजोंको चर्चा अंग्रेजी समाचारपत्रोंमें हुआ करती है । प्रचलित रीतिके अनुसार कर देनेसे ही जातिके इस लिये गप-शपके समय भी ये बाबू लोग सर्दार बने रहा करते हैं। . ऐसी ही बातोंकी चर्चा करके अपना दिल... For Personal & Private Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९२ जैनहितैषी [भाग १४ बहलाया करते हैं। यदि कोई अंग्रेजी पढ़ा लग जाते हैं, किसी रातिको किसी प्रकार और साथी, नहीं मिलता, तो किसी अग्रेजी समा- किसीको किसी प्रकार करके अपनी खूब ही चारपत्र या पुस्तकको ही अपना साथी बनाकर हँसी कराते हैं और अनभिज्ञता प्रकट करते हैं। उसीसे अपना दिल बहलाते रहते हैं; परन्तु ऐसे सारांश यह कि, जातिके रीतिरिवाजोंसे अच्छी पुरुषसे बातचीत करके दिलबहलाना पसन्द तरह वाकिफ होकर और अपनी स्त्रीको अच्छी नहीं करते जो अंग्रेजी पढ़ा नहीं होता और तरह समझानेके पश्चात् उससे सम्मति मिलाकर जो उनके रुचिकर विषयोंमें अच्छी तरह बात- सुधार करना तो इन लोगोंके लिये बहुत ही चीत नहीं कर सकता । यही कारण है कि इन मुश्किल हो रहा है । यही वजह है कि इन बाबू लोगोंको अपनी अनपढ़ स्त्रीके साथ बात. लोगों द्वारा कुछ भी सुधार नहीं होता बल्कि चीत करके दो घड़ी दिल बहलाना भी बहुत करीतियोंकी बहत कछ पष्टि ही होती रहती है। दूभर होता है। बल्कि अपनी स्त्रीके पास बैठने बाबू लोगों के विषयमें एक बात यह भी पर तो इनको ऐसा कोई विषय ही नहीं मिलता जाननेके योग्य है कि, बड़े बड़े धनाढ्योंके बालक जिसमें इन दोनोंकी बातचीत होकर दिल बह- तो प्रायः विद्याप्राप्तिका कष्ट उठाना ही पसन्द लावा हो सके। नहीं करके बल्कि उनमें कोई कोई तो ऐसे लाडले ऐसी हालतमें वे अपनी जातिकी दशा और भी होते हैं जो अपनी दूकानके बहीखातोंका रीति रस्मोंसे बिल्कुल अनजान ही रहते हैं, लिखना पढ़ना मात्र भी नहीं सीखते हैं, और बड़े न उसका कुछ सुधार कर सकते हैं और न होकर अपना सब काम मुनीमों तथा कारिदोंके ही सुधार करनेकी कुछ इच्छा ही रखते हैं। वे भरोसे पर छोड़नेके लिये लाचार होते हैं । रहे अपने लिये सबसे सहज सुखका मार्ग यही गरीब लोग सो वे अंग्रेजी पढ़नेका भारी खर्चा समझते हैं कि नित्य तो जो चाहा सो किया नहीं उठा सकते हैं । अतः अंग्रेजीकी उच्च शिक्षा परन्तु जब कभी बिरादारीके साथ मिल कर कोई प्रायः मध्यम स्थितिके मनुष्योंके बालक ही पाते कार्य करना पड़ा तो जातिकी पुरानी चाल हैं और वे सब सरकारी नौकरी पाने या वकील ढालके अनुसार ही कर दिया । इसीसे आदि होनेके वास्ते ही पढ़ते हैं । ये अंग्रेजी इन बाबू लोगोंके रीति-रिवाज सम्बन्धी सब पढ़नेवाले बालक सरकारी हाकिमोंको बहुत कुछ कार्य प्रायः उनकी स्त्रीके ही अधिकारमें रहते अधिकारप्राप्त और बड़े बड़े धनाढ्यों तथा ध्वजाहैं, ये लोग उस समय उसीके इशारे पर काठकी धारियोंसे भी सर्व प्रकार सेवित और पजित देखपुतलीकी तरह नांचा करते हैं और अपनी कर अपने वास्ते भी बड़ी ऊँची ऊँची आकांक्षाएँ बुद्धिको जरा भी काममें नहीं लाते; परंतु कारज बाँध लेते हैं और शेखचिल्लीवाले बड़े बड़े पूरा होने पर फिर अपनी उसी चाल ढाल पर मंसूबे घड़ने लग जाते हैं कि पढ़लिखकर हम आ जाते हैं । यदि किसी नगर या ग्राममें या भी ऐसा ऐसा वैभव प्राप्त करेंगे और ऐसे ऐसे किसी जातिमें इन बाबू लोगोंकी कुछ जबर- अधिकार पावेंगे । इसी प्रकार इनके कुटुम्ब तथा दस्ती चल सकती है तो वहाँ ये लोग अपनी ग्रामके लोग भी इनके विषयमें ऐसा ही विचार स्त्रीको भी धता बताकर और जातिके करके इनके विद्यार्थी-जीवनमें ही इनकी बहुत लोगोंके बुड़बुड़ानेकी भी कुछ परवाह न करके बड़ी प्रतिष्ठा करने लग जाते हैं, जिससे इनके रीतिरिवाजोंको बिल्कुल अंधाधुंध ढंगसे तोड़ने दिमाग और भी ज्यादा ऊँचे चढ़ जाते हैं । For Personal & Private Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन समाजके शिक्षित । अङ्क १०-११ ] वे विद्यार्थी अवस्थामें ही बड़ी शान शौकतके साथ रहने लग जाते हैं और अपने माता पिताको बड़ी बड़ी आशायें दिलाकर उनसे बहुत ज्यादा खर्च लेते हैं । परन्तु जब परीक्षा पास करके ये लोग कालिजसे निकलते हैं तब तुरन्त ही उस ऊँचे पदको नहीं प्राप्त कर पाते हैं जिसकी आकांक्षा अपनी बालबुद्धिके कारण बाँधे बैठे थे । प्रारम्भमें इनको बहुत ही छोटा पद और बहुत ही थोड़े वेतनकी नौकरी मिलती है जिसमें वह किसी प्रकार भी अपनी इस ऊँची हैसियत से नहीं रह सकते जो उन्होंने विद्यार्थी अवस्था में बना रक्खी थी। इसके सिवाय उनके मां-बाप जो उन पर पूरी पूरी आशा बाँधे बैठे थे और इस ही कारण जिस तरह भी हो सकता था उनको पूरा पूरा खर्च देते थे साथ ही, उनकी स्त्री और बालबच्चोंको भी ऊँची हैसियतमें पाल रहे थे वे भी अब उनका रोजगार लग जाने पर तुरन्त ही उनकी स्त्री और बालबच्चों का सारा बोझ उन पर डाल देते हैं और अपने वास्ते भी सब कुछ सहायता चाहने लग जाते हैं । बल्कि, बेटेका रोजगार लग जाने पर जो ऊँची हैसियत बनानेकी आकांक्षा बाँध रक्खी थी उसके पूरा होनेकी इच्छा करने लगते हैं और यदि विद्यार्थी अवस्था में उसको अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च देते रहने के कारण कुछ कर्ज भी जिम्मे हो गया हो तो उसके बेबाक करदेने का भी तकाजा करने लग जाते हैं । इस प्रकार नौकरी लगते ही बाबूसाहब पर एकदम इतने भारी बोझ पड़ जाते हैं कि वह अपनी प्रारम्भिक छोटी नौकरीमें उनको किसी प्रकार भी नहीं झेल सकता, बल्कि शुरू शुरू में तो वह स्वयं अकेला अपना भी खर्च नहीं चला सकता है जिसको वह बहुत ही ऊँचे दर्जेका रखना चाहता है । इसलिये वह बहुत ही ज्यादा सट २९३ पटाता है और रातदिन इसी सोच में पड़कर परम स्वार्थी बन जाता है और अपने मातापिता से - भी आँख चुराने लगता है और अपने बालबच्चों को भी भारस्वरूप ही समझने लग जाता है। यही कारण है कि विद्यार्थी अवस्था में जो थोड़ाभी होता है वह कालिजसे निकलकर कारबारी बहुत जोश जातिप्रेम तथा देशसेवाका पैदा होनेपर बिलकुल ही जाता रहता है, सर्व प्रकार सद्विचार लुप्त होकर उन्हें आटे दालका भाव मालूम होने लग जाता है और यह कहावत उन-पर बिलकुल चरितार्थ हो जाती है कि "भूल गये राग रंग भूल गये जक्कड़ी, तीन चीज याद रहीं नून तेल लक्कड़ी । " होते होते जब हमारे ये बाबू लोग बहुत ऊँचे पद पर पहुँच जाते हैं, वेतन भी इनका बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और घरबारका सब प्रबन्ध भी ठीक बैठ जाता है, तब यदि फिर इनको जाति तथा देशकी सेवाका खयाल आता है या सरकार के द्वारा प्रतिष्ठा पानेके पश्चात् जातिमें भी भी प्रतिष्ठा पानेका कुछ शौक उभरता है तो उस समय ये लोग जातीय सभाओंमें भी शामिल होते हैं और बहुत कुछ सेवा करनेका जोश दिखलाते हैं । परन्तु जब देखते हैं कि वहाँ तो अनपढ़ और नासमझ धनाढ्य ही पूजे जाते हैं और बड़े बड़े पंडितों तथा विद्वानों के ऊपर भी वे ही प्रधान बना दिये जाते हैं; बल्कि पंडित और विद्वान् लोग स्वयं भी उन्हींकी हाँ में हाँ मिलाते हैं तब बहुत घबराते हैं और अपनी दाल गलती न देखकर सभाओं में सम्मिलित होनेकी अरुचि ही पैदा कर लेते हैं। इसके सिवाय वहाँ इनकी चालढाल और वेशभूषा के ऊपर भी लोग कानाफूसी किया करते हैं। पंडित लोग तो इस मौके को गनीमत समझकर और शेखीमें आकर उनकी अनेक क्रियाओंमें त्रुटि निकालने For Personal & Private Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९४ जैनहितैषी [भाग १४ morror लग जाते हैं; धर्मात्माओंका रूप बनाकर कभी दर्शन देता है तो जातीय समाचार तो उनको धर्मका उपदेश देने लगते हैं और अनेक उसमें नाममात्रको ही रहते हैं, बहुत करके लेख प्रकारकी आखड़ी तथा नियम लेनेके लिये बाध्य या शास्त्रोंके अनुवादका सिलसिला ही जारी किया करते हैं, जिससे वे लज्जित होकर ज्यों रहता है । इन समाचारपत्रोंके अतिरिक्त जातिके - त्यों अपना पिंड छुड़ाते हैं। फिर जब वे सभामें लोगोंसे मिलकर अपनी जातिकी दशाके विषबैठते हैं और किसी प्रस्तावपर अपनी सम्मति यमें बात चीत करते रहना भी इनको बहुधा देते हैं तो जातिका पूरा पूरा अनुभव न होने पसंद नहीं हुआ। इसलिये जातिकी दशा और और सभाकी परिस्थितिको भी ठीक ठीक न उसके समाचारोंसे तो ये लोग बिल्कुल ही अनजाननेके कारण उनकी वह सम्मति बिल्कुल जान रहते हैं । हाँ, अंग्रेजी भाषा और उसमें ऐसी ही बेतुकी हुआ करती है जैसी कि उस वर्णित विषयोंका इनको एक प्रकारका व्यसन अनाडी अंग्रेज हाकिमकी जो किसी हिन्दस्तानी सा हो जानेके कारण ये लोग बहत बहत मल्य सभामें आने और सभाकी तरफसे फूलोंका देकर भी अंग्रेजी समाचारपत्रोंको मँगाते हैं हार गलेमें पड़ जाने पर सम्मति प्रकाश किया और उनके द्वारा बेजरूरत भी दुनिया भरकी करता है। ऐसी हालतमें सभाके लोग बाबूसाह- व्यर्थकी राजनैतिक बातोंको पढ़कर अपना बकी उस सम्मति पर कुछ भी ध्यान नहीं देते दिल बहलाते रहते हैं और आपसमें भी इस ही बल्कि उनको उपेक्षाकी दृष्टिसे देखने लग जाते प्रकारकी चर्चा किया करते हैं कि जापानने हैं । बाबूसाहब इससे अपना बड़ा भारी रूसका अमुक देश ले लिया है, चीन यह कहता अपमान समझकर . यही सोचने लग जाते है और अमरीकामें सभापति चुननेके वास्ते हैं कि इन मूल्की सभामें सम्मलित होकर यह सलाह हो रही है । इत्यादि । तो हमने बहुत ही ज्यादा भूल की जिसे फिर नहीं हा । तात्पर्य इस सारे कथनका यह है कि न तो करेंगे,अर्थात् अबसे फिर कभी सभामें नहीं आयेंगे। "। हमारे पंडित लोग ही जातिका उद्धार कर सके हैं . इस प्रकार हमारे इन बाबू लोगोंके हाथोंसे और न हमारे बाबू लोग ही जातिके उन्नतिमें लगे भी जातिका कुछ उपकार या सुधार नहीं हो .. हुए हैं, इसी कारण यह जाति अन्य सब जातियोंसे -रहा है । बाबू लोग जातिके वास्ते कुछ भी काम बहुत पीछे पड़ी हुई है और नीचेको ही गिरती नहीं कर रहे हैं और बिल्कुल ही उपेक्षित हुए चली जाती है। बल्कि अपनी मनुष्यगणना कमती बैठे हैं; मानो इनके जिम्मे जातिका कुछ कर्तव्य ही नहीं है । ये लोग जातिके वास्ते कछ करके होते रहनेसे तो शीघ्र ही समाप्त हो जानेकी भी तो क्या दिखाते इनको यह भी खबर नहीं है कि र र सूचना दे रही है। इस कारण इसकी रक्षाका तो - बहुत ही जल्द कोई उपाय होना चाहिये और इस समय जातिमें क्या हो रहा है, और क्या ऐसे विद्वान पैदा करने चाहिये जो इस जातिको हालत बीत रही है । क्यों कि देशभाषामें छपनेवाले जातिके समाचारपत्रोंको तो यह लोग 3 उन्नति-शिखर पर चढ़ावें और अन्य सब जातिपढ़ना पसंद नहीं करते और अंग्रेजी में जो एक योसे आगे निकाल कर ले जावें। यह कार्य मासिकपत्र निकलता है वह अव्वल तो कई कई ऐसे ही विद्वानोंसे चल सकता है जो संस्कृत और महीनेकी डुबकी मारता रहता है और दूसरे जब अंग्रेजीके पूरे पंडित हों, अपने धर्मके पूरे ज्ञाता For Personal & Private Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन समाजके शिक्षित । अङ्क १०-११ ॥ “हों, जातिसें पूर्ण प्रेम रखते हों, जातिमें पूरी • तरह घुसते हों, उसकी सब रीति रस्मों और चाल ढालको अच्छी तरह जानते हों, अपनी देश भाषा और देशी भाइयोंसे पूरा अनुराग रखते - हों, अपने देश और जातिकी घरेलू बातोंकी चर्चा में ही अपना दिल बहलाते हों और जाति की उन्नति करना अपना परम कर्तव्य समझते हों। कोरे पंडितों अथवा कोरे बाबुओंसे काम नहीं चलेगा । परन्तु यह तब ही हो सकता "है जब कि जातिके बालक अपने ही स्कूल और कालिजों में पढ़ें और अपने ही बोर्डिंगों में रहें जहाँ उनको उपर्युक्त सभी बातें बड़ी कोशिशके साथ सिखाई जावें और उनके हृदयमें जातिप्रेम और जात्युन्नतिका जोश खूब मजबूती के साथ कूटकूट कर भर दिया जाय । यहाँ हमें शोक और महाशोकके साथ लिखने पड़ता है कि हमारे पंडित लोग जाति से अंग्रेजी पढ़नेके प्रचारको तो बंद नहीं करते हैं और न बन्द कर ही सकते हैं-इस कारण जातिके बालक अंग्रेजी पढ़ पढ़ कर बाबू तो धड़ाधड़ बनते ज़ारहे हैं, दिन प्रतिदिन उनकी संख्या बढ़ती ही जाती है और वह आगेको और भी ज्यादा बढ़ेगी; परंतु फिर भी हमारे बहुतसे विलक्षण पंडित जातिकी तरफसे ऐसे स्कूल तथा कालिजोंके खड़ा करने और बोर्डिंगों के खोलनेको अन्तमें हम इतना कह देना जरूरी समझते हैं कि पंडितों, बाबू लोगों, धनाढ्यों तथा सर्व साधारण आदिके विषयमें जो कुछ भी लेखमें लिखा है उससे हमारा यह मतनहीं है कि वह सब पर ही लागू होता अथवा सब ऐसे ही हैं; नहीं, यह हमारा अभिप्राय हर्गिज नहीं है और न ऐसा हो सकता है बल्कि वास्तवमें तो पंडितों में भी अनेक प्रकारके लोग हैं, और बाबुओं में भी, और इसी तरह दूसरोंमें भी; और ऐसा ही सदा हुआ भी करता है । यहाँ तक कि बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिनपर हमारे लेखका एक अक्षर भी शिक्षा होती रहे और अंग्रेजीकी भी, जहाँ -रहकर जातिके बालकोंका धर्म कर्म सब ठीक ठीक बनता रहे, उन पर अपनी जाति और धर्मके प्रेमका संस्कार पढ़ता रहे और संगति भी अपनोंहीकी मिलती रहे । अतः जब तक इन पंडित महाशयोंकी यह अद्भुत महापाप बताते हैं जहाँ जैनधर्मका भी लागू न होता हो । हमारा अभिप्राय तो इस लेखमें जातिकी बहुत ही मोटी बाहरी दशाके दिग्दर्शन कराने का है, जिससे जातिके हितैषियों और शुभचिन्तकोंको इसकी अंतरंग दशाके जानने की उत्सुकता हो और वे इसके सुधारका कुछ उपाय करें । २९५ नीति चलती रहेगी तब तक जातिके बालक ऐसे ही स्कूलोंमें पढ़ते रहेंगे और ऐसे ही बोर्डिगोंमें रहते रहेंगे जहाँ जैनधर्म और जैनजाति के प्रेमकी तो कुछ भी चर्चा न हो; बल्कि जैनी ६०० में एक होनेके कारण अन्य मतियोंकी ही बहुलतासे उन्हींके धर्मकर्मकी चर्चा हुआ करती हो और उन्हींका प्रभाव पड़ता हो और ऐसे ही बाबू लोग बनते रहेंगे जैसा कि पंडित लोग इनको समझते हैं और फिर होते होते इन बाबू लोगोंकी बहुतायत से सम्भव है कि इनका असर जाति पर भी पड़ने लग जाय और सारी जाति ही इन जैसी हो जाय । इस लब है For Personal & Private Use Only י Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ छदाम २९६ जैनहितैषी [भाग १४ हिन्दीके स्थानकवासी इस ग्रन्थकी भाषा कुछ प्राचीन अवश्य है, परन्तु है प्रसादगुणसंपन्न । इसकी रचना ज्ञातधर्मकजैन लेखक । थाङ्गके प्रथम अध्यायके आधार पर हुई है । इसमें जो'नखशिखवर्णन है वह औपपतिको पाङ्ग के आधार पर लिखा गया है । इस ग्रन्थका (लेखक-बाबू मातालालजा जन, एम. ए.) निर्माण संवत् १९३९ में हुआ था । तत्पश्चात् १-मगन मुनि। मनि महाराजके शिष्य माधव मानने इस ग्रंथके आप श्वेताबर स्थानकवासी संप्रदायके साधु कया। इस कारण हैं । आपका जन्म भरतपुर रियासतके अन्त- इसमें कहीं कहीं गुजराती शब्दोंका भी समावेश हो गया है। यह ग्रंथ अभी प्रकाशित नहीं हआ र्गत डीग नामक नगरमें हुआ था । विक्रम संवत् और इसकी केवल एक हस्तलिखित प्रति उप१९१८ में आपने पूज्य मुनिवर धर्मदासकी " लब्ध है. जो माधव मनिके पास सरक्षित है। संप्रदाय ( गच्छ ) में दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा । लेनेके पश्चात् आप ५-६ वर्ष तक मालवा उन्होंकी कृपासे मुझे इस ग्रंथके देखनेका प्रान्तके इन्दौर इत्यादि स्थानों में देशाटन करते सौभाग्य प्राप्त हुआ है । इस ग्रंथमें जो कथा रहे। पनः आपने कोटा, बँदी, बजरङगढ, लश्कर वर्णन की गई है वह संक्षेपमें इस प्रकार है। इत्यादि अनेक स्थानोंमें भ्रमण किया और जनता- कथाके साथ कविताके नमूने भी दिये जाते हैं:को जैनधर्मका उपदेश दिया । आज कल आप मगधाधिपति राजा श्रेणिककी धारिणी नामक जयपुर राज्यके अंतर्गत मँडावर नगरमें ही अधि- रानी थी। उस रानीके उदरसे मेघकमार नामक कतर रहते हैं और उसीके आसपासके ग्रामोंमें पुत्र उत्पन्न हुआ। गर्भिणी रानीके मनमें जो देशाटन करते हैं । कालू मुनि, शोभाचन्द मुनि, माधव मुनि और हंसरत्न मुनि आपके दोहद उत्पन्न हुआ था उसका वर्णन कविने इस चार शिष्य हैं। प्रकार किया है:.. आपको हिन्दी कवितासे बहत प्रेम रहा है। “ बिना काल वारिदं होवें, धन बरसै अति जोर । आपकी समस्त रचना हिन्दी-पद्यमें है। आपकी तड़ तड़ात तड़के तड़ित गाज रहा चहुँ ओर ॥ रचना विविध छंदोंमें है, परन्तु आपने अधिक- वारिद पंच बरणके न्यारे हैं। तर झूलना छंदका ही प्रयोग किया है । काव्यकी घनघटा उठी उमगी आवें मनो इंदर बान समारे हैं । दृष्टिसे आपकी रचना साधारण है, परन्तु कहीं मारेगा दुस्मन सूखाकूँ, वो सूर रूप अवधारे हैं। कहीं आपकी रचनामें चमत्कार भी पाया जाता इम विविध भाँति अँबरकी सोभा हो मुझ मन अनुसारे हैं। है। आपकी भाषामें कतिपय प्राकृत शब्दोंका विहग विविध क्रीड़ा करें, निज तिय सँग लवलीन । प्रयोग हुआ है । आपने कुल मिला कर चार हों षट रितु फल फूल युत, सब तरु रम्य नवीन । ग्रंथ लिखे हैं। सर्ज अर्जुन. सहकार कलंबू हैं। .१ मेघमुनिचरित । यह एक खण्ड काव्य पुंगीफल श्रीफल नारंगी केला दाडिम अरु जंबू है ॥ है। विविध छन्दोंमें लिखा गया है । बड़ा रोचक चारोली पिस्ता खरजूरी बादाम सेब पुनि निंबू हैं। है। आपकी रचनाओंमें यही ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ है। इत्यादि वृक्ष भूमें राजें, मनो विहग-वसन ये तंबू हैं ॥ For Personal & Private Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] हिन्दीके स्थानकवासी जैन लेखक। २९७ पड़े जल-धार त्रिविध वयार चले।। ता समान जिनराजकी नाभी अति परधान । चपला चमके घन गरज करे शुचिधाय भूमि प्रताप टले। जिन आगम अनुसारथी' कहें मुनि मगन बखान ६ इस विधि पूरण पावस ऋतु हो, तब मुझ चिन्तितकी जब मेघकुमारने श्री महावीरका धर्मोपदेश आस फले। सुना तब उनके चित्तमें वैराग्य उत्पन्न हो गया। नृप साथ तामे गज पर बै→ शिर छत्र होय, अरु घर आकर मातासे कहने लगेः चमर ढले ॥ श्री जिन भाषियो मा अथिर यह संसार । मेघकुमार जब विवाहके योग्य हुए तब उनको जिन उदय रविको अथिर, तिम अथिर नर अवतार । " अद्भुत अलबेली अष्ट राज-कन्या विधियुत परणाई। नियम ना पुनि धनीसे होय दरिद नो आगार ॥१॥ समवयवाली भोली विशालनयनी मनमोहनगारी। नलिनदलगत जल तग्ल जिम तड़ितको झवकार। शशिबदनी, नासा शुकसमान, जस अधर अरुण छबि जलद बुदबुद सुर-धनुष सम चपल आयु विचार ॥२॥ . न्यारी॥ जिम कुशाके अग्रपर जल-बिन्दु थिति निरधार । दाडिम-कणदंती सोहै वो सुर नरको मन मोहै। तरल चल दल बाण संध्या सरिस आयु निहार ॥३॥ ग्रीवा कम्बू सम भुज मृणाल सरसी शुचि नरम कलाई चैतन्य चिड़ियाकी करै जब काल बाज सिकार । कज कोमल कज पल्लव पर महँदी बुंद अमंद लसै है। तबै अबरै चिड़िया सम सजन रह जात पुकार ॥४॥" अति उत्तम शोभन रिदय, कठिन कुच कनक कुंभ इसी प्रकार बहुतसी बातें कहके मेघकुमारने , सरसे हैं ॥ मुनिव्रत धारण करनेकी मातासे अनुमति माँगी। त्रिवली सह क्षामोदर है, नाभी पियूषको सर है। . माताने बहुत कुछ समझाबुझाकर मेघकुमारको कटि केहर लखि सरमाय मदनके सदन सुमन सुख. वैराग्य लेनेसे रोकना चाहा, परन्त सब प्रयत्न दाई ॥” निष्फल हुआ । अंतमें माताने मेघकुमारकी विवाहके पश्चात् एक बार मेघकुमार वीर पत्नियोंको बुलवाया। वेभगवान्के समव-सरणमें गये । यहाँ पर कविने प्रियतमको पाइन प्रेम-पाशमै पदमनि बन बन आई। वीर भगवानका शिख-नख विर जिन पहिरयो अनुपम वेश अंग आभूषण नूतन धारे। किया है। यथा-- मृदु कृष्ण अभ्रराजी समान सूच्छम केश समारे ॥ खगपति गरुड़ तनी परें, लम्बी अरु ऋजु जान । देणी काली धुंघराली, चोटी जडावनी डाली। ऊँची घ्राण जिनशकी, कहि मुनि मगन बखान ॥१॥ शिर शीस फूलमणिरतन-जटित, मुतियनसे माँग उपचित परम उदार, जैसे होवें बिम्बफल । ___ भराई ॥१॥ ता समान सुखकार, अधर लसें जिनराजके ॥ २॥ कल दल सम कोमल करतल पर महँदी अमंद राजै है। रक्त हस्त-तल अरु सुकुमार, उन्नत पुष्ट सुंदराकार। लचकती लंक पर हेममेखला अति अद्भुत छाजै है ॥ अति प्रशस्त लक्षणयुत जान, छिद्ररहित जिनके नपुर पग माँहि विराजै, जिन लख सुर-परियाँ लाजै । जुग पाण ॥ ३॥ पग धरत धरणि पर अचक पचक बिछुअनकी तरुण सूर्यको किरण कर, ज्यों जाग्रत कज होय। झनक सुनाई ॥२॥ त्यों गंभीर रु पसरती, नाभि आकृती जोय ॥४॥ अपनी स्त्रियोंके देखने पर और माताके पुनः नाभि आकृती जोय, किधों सर सरितामाँही। समझाने पर भी मेघकुमार अपने संकल्पसे विचभ्रमर दक्षिणावरत तरंगें अधिक तहाँ ही ॥ ५॥ लित न हुए और उन्होंने माता-पितासे बलात्कार १ तब । २ कारी अर्थात् करनेवाली। ३ हृदय । १ से। २ का । ३ सदृश । ४ अन्य । ५ की। For Personal & Private Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी- .. [भाग १४ आज्ञा लेकर श्रीमहावीरसे मुनि दीक्षा ग्रहण कर तीव्रतर वेदना अनुभवी ता समै', ली । परन्तु वे मुनिव्रतकी परीषहसे एक दिनमें सात दिन रात तक तें करारी ॥" ही घबड़ा उठे और पुनः गृहस्थ जीवनमें प्रवेश महावीर स्वामीने मेघमुनिको धर्मोपदेश देकर करनेको उद्यत हो गये । इसी इरादेसे महावीर मुनिव्रतमें पुनः दृढ किया। स्वामीके पास पहुँचे । स्वामीने उनके मनकी सुन बैन वीर प्रभुके मुनि मेघ चैन पायो। बात जान ली और उन्हें उनके पूर्व भवोंका जिनराजके चरणमें एकाग्र मन लगायो । वृत्तान्त सुनाया । महावीरस्वामी बोले पुनि मेघने दुबारा चारित्र लेन चायो। " सुनहु मुनि मेघ तव पुवभव वारता, उठान सूत्र फिरसे श्री वीरने सुनायो । देहु उपयोग विनम विसारी । दीक्षा प्रदान करके मुनि-मार्ग भी बतायो । पेख इहे भव थकी तीसरे भव विषं, आज्ञानुसार मेघे मुनि-मार्गको निभायो॥" हतो गजराज तूं बन बिहारी ॥ तदुपरान्त मेघमुनिने सिद्धांत पढ़े और घोर . एकदा ग्रीष्मऋतु माँहि तिहँ बन विषे, तप किया। लगी दावाग्नि अटवी अजारी। . २ श्रीप्रदेशीचरित्र । इस ग्रंथकी रचना विस्तरी धूम दिशि विदिश वायू बलें, संवत् १९५८ में हुई थी। यह राजप्रश्नीय भये भयभीत सब विपिनचारी ॥ सूत्रके आधार पर लिखा गया है । इसका अपर करत आक्रद निज जीव जीवा विवा, नाम 'नास्तिकमतनिराकरण' है । इसमें एक इत उतें भ्रमण लागे तिवार भूमि भवकंत आतप पड़े आकरी, कथाके बहाने नास्तिकमतका खण्डन किया लगें लू लपट तन दहनहारी in गया है । इसमें युक्तियों सहित बतलाया गया दैववश एक सर नजर तुझ आवियो, है कि जीव और काया पृथक् पृथक् पदार्थ हैं। ता विर्षे पंक बहु, अल्प वारी । अन्तमें क्षमा और तपका महात्म्य दिखाया गया . सर विष पैठियो नीर पीवा भनी । है । यह ग्रंथ छोटासा है; कुल ८१ छंदोंमें है । -दंड सम सुंड जलहित पसारी ॥ प्रकाशित हो चुका है। रचना बहुत साधारण नीर ना कर चढ्यौ, कीच माँही गढ्यौ, है । उदाहरण:लौट हू सक्यौ ना तूं पिछारी । “तप दावानल कर्मः, क्षणमें डारे जार । नीर अरु तार दोऊनकी ना रह्यो, लब्धादिक बहु ऊपजै, पावे केवल सार ॥ कर्मगति अजब ना टरे टारी ॥ ३ भावनाविलास-इसमें द्वादश भावनाएतले तिहाँ तव शत्रु गज आवियों, ओंका स्वरूप वर्णन किया गया है । यह ग्रंथ पूर्वलौ वैर चित माँ चितारी। विवश लख तोय कर कोप पायें हन्यौ. अभी प्रकाशित नहीं हुआ। होय प्रतिकूल रद-सूल मारी ॥ ... ४ चौथे ग्रंथमें मुनिजीके फुटकर छंदोंका मारता मारता और हू कीचमें, . संग्रह है। प्रायः सभी छंद अप्रकाशित हैं । दो घोंचियो अस्थि नस तोरि डारी। चार छंद प्रकाशित हो चुके हैं। उदाहरण:१ पूर्व । २ इस । ३ से। ४ जिलाने के लिए “समकत पान सुधारक चूना चारित लाय । अर्थात् रक्षा करनेके लिए। ५ पानी । ६ पानी पीनेके करणीका कत्था करो बीड़ी लेय बनाय ॥ लिए। ७ इतनेहीमें। ८ भागमा । १ समय। For Personal & Private Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] हिन्दीके स्थानकवासी जैन लेखक । २९९ wwmarwinnarrinaam बाड़ी लेय बनाय सुपारी तपस्या कीजै। कहाँ बुध मेरी जु हों, ऑरभ परिग्रह लीन । प्रभू नामकी डार इलायची मुखमें दीजै ॥ गुरुमुषरौं नहिं लह्यो, आगम अरथ अहीन ॥ कहे मगन ऋषि राय पापकी काटो स्याई । जो कोई जिन वयनसों, अल्प भिन्नता + + । संक्यों पीक निकाल ज्ञान मुख लाली छाई॥ बहुश्रुति सोधौ करि मया, मोहि नहीं पषपात ॥ २-दलपतराय । सकल जिनेश्वर देवर, भक्ता तिनको दास । आप दिल्लीके रहनेवाले श्वेताम्बर स्थानक दलपतराय सुसंघ तूं, करै सुनो अरदास ॥ वासी श्रावक थे। जौहरीका काम करते थे। मैं पापी अति मूढ़मति, विकल विषैमें लीन । सुना जाता है कि आपने अपनी पढाईमें और तारो मोहूँ करि मया, बाँचौ ग्रंथ प्रवीन ॥ पण्डितोंके आदर-सत्कारमें तीन लाख रुपया खर्च ।। जहाँ लिष्यो आगम विरुध, देषो वहाँ निसंक। किया था। आप संस्कत, प्राकत. हिन्दी. गज- कहु अज्ञान मुझ मूढ़ा, तात हों निकलंक ॥ . राती, उर्दू फारसी इत्यादि भाषाओंके ज्ञाता थे। संवत अट्ठारैसें, बारा अधिके जान। आपने इनमें से पहली तीन भाषाओं में रचना की वैसाष शूद दसमको, ग्रंथ समापत ठान ॥ है । आपकी हिन्दी रचना गुजरातीमिश्रित है। इसी नामका एक ग्रंथ आपने संस्कृतमें और वह गद्य और पद्य दोनोंमें है और काव्यकी एक प्राकृतमें लिखा है, परन्तु वे चित्रबद्ध नहीं दृष्टिसे बहुत साधारण है । आपके बनाये हुए हैं। दोनों ग्रंथ पद्यमें हैं । आपने प्राकृतमें एक तीन हिन्दी ग्रंथोंका हमको पता है, इनमेंसे 'शकुनावली' नामक ग्रंथ भी लिखा है। पहले दो हमने स्वयं देखे हैं। आपके बनाये हुए २-सम्यक्त्वषट्पंचासिका । यह एक. कदाचित् और भी ग्रंथ होंगे। बहुत छोटा ग्रंथ है । विषय नामसे ही स्पष्ट है। १-नवतत्त्वप्रकरण । यह ग्रंथ गद्य-पद्यमय इसकी भी मुझे एक बहुत अशुद्ध प्रति देखनेको है। बड़े महत्त्वका है । श्वेताम्बरोंके बत्तीस मिली । नमूना देखिएसूत्रोंका सार इसमें बड़ी खूबीके साथ भरा है। उपशम जेह कषाय नों, तेदनो सम अवधान। यह ग्रंथ गागरमें सागर भरनेकी उक्तिको चरि- मुक्ति पंथनी चाहना, संबेग...प्रधान ॥ . तार्थ करता है । समस्त ग्रंथों खानापूरी की हुई। हुई होय उदास विषय विर्षे, जाना जो निर्वेद । है और अनेक चित्र दिये हैं, जो दर्शनीय हैं परदष देषी दुष दया, ये है चौथौ भेद ॥ और लेखकके पाण्डित्य और बुद्धि-विकाशका ३-द्रव्य-गुण-पर्याय । यह ग्रंथ अलवर परिचय देते हैं । इस ग्रंथम इबारत बहुत कम में भज्जलाल साधकेभाण्डारमें मौजद है। हमारे है। इसके लिखने में गोमद्रसार और लीलावती वती देखनेमें नहीं आया । इत्यादि ग्रंथोंसे भी सहायता ली गई है। इसकी __आपके लिखे हुए फारसीके कुछ शेर भी रचना संवत् १८१२ में हुई थी। इसकी जो . प्रति हमने देखी है वह बहुत अशुद्ध लिखी हुई। . एक सज्जनने देखे हैं। थी। प्रशस्ति देखिए--. ३-मुनि तिलोकरिख । कीरत कूँ नाहीं किया, कर विचार उपगार । आप श्वेताम्बर स्थानकवासी संप्रदायके साधु अपने समरणको कियो, नवतत संग्रह सार॥ थे। आपकी भाषा गुजराती और प्राकृत मिश्रित १शंका। १ दया। २ विनय। For Personal & Private Use Only | Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०० जैनहितैषी [भाग १४ः है। रचना कविताकी दृष्टिसे साधारण है। जैनधर्मका अध्ययन । आपके लिखे हुए हमने दो ग्रंथ देखे हैं। १ श्रीप्रतिक्रमणसत्यबोध । यह ग्रंथ संवत् १९४७ में निर्णयसागर प्रेसमें छपा “प्रो० वेबर, बुल्हर, जेकोबी, हर्नल. था। ४०० पृष्ठका बड़ा ग्रंथ है। इस ग्रंथका भाण्डारकर, ल्यूमन, राइस, गेरीनाट आदि मूल विषय प्रतिक्रमणसत्र और उसका अर्थ विद्वानोंने यद्यपि बड़े ही परिश्रमसे जैनधर्मके थोड़े ही पृष्ठोंमें आगया है । ग्रंथके अधिकांशमें सम्बन्धमें अनेक महत्त्वकी खोजें प्रकाशित की चौबीसौं तीर्थंकरोंके स्तवन द्वादश भावनासे हैं, तो भी हम देखते हैं कि भारतीय विद्रा और जिन देवोंकी अनेक प्रकारकी बंदनायें दी नौने अभी तक इस धर्मके अध्ययनकी ओर हैं । विविध छंदोंका प्रयोग हआ है। नमना जितना चाहिए उतना ध्यान नहीं दिया है। देखिए: जिस समय प्राच्य विद्याओं, और कलाओंके संशोजिनसासन स्वामी,अंतरजामी, शिवगतगामी, सुखकारी, धनका प्रारंभकाल था, उस समय जैन जगमें जसवंता, श्रीभगवंता, सुगुणअनंता, उपगारी । । साधुओंकी उदासीनताके कारण, अथवा हस्तसिद्धार्थकुलआया,जगत सुहाया शुभपलआया. गुणधारी: लिखित पुस्तकोंमें छुपे हुए अपने धमका पवित्र धनत्रिसलानंदन कुलध्वजस्यंदन जिनचरननकी बलिहारी॥ ज्ञान जैनेतराको देना वे पसन्द नहीं करते समकित क्रिया बिना जगतमें, नहिकोई तारणहारी जी। थे इस कारण, संभव है कि भारतीयोंको तिलोक रिखजी कहे इम सर्दहो, जे सुगुणां नरनारी जी॥ इस धर्मके अध्ययनका सुभीता न मिला हो २ श्रीश्रेणिकचरित्र । इसकी मैंने एक और उसके बाद बौद्धधर्मके अध्ययनके बढ़ते नितान्त अशुद्ध हस्तलिखित प्रति देखी है। हुए अनुरागके कारण, कितने ही अंशोंमें इसका विषय नामसे ही स्पष्ट है । यह ग्रंथ उनकी इस महत्त्वपूर्ण धर्मकी ओर उपेक्षा हो मुनिजीने जिला पूना ( दक्षिण ) में रह कर गई हो-क्योंकि शुरू शुरूमें-विद्वानों के मस्तिष्क संवत् १९३९ में लिखा था । इसमें ६३ पृष्ठ पर बौद्धधर्मकी इतनी प्रबल सत्ता स्थापित हैं। उदाहरणः हो गई थी कि वे जैनधर्मको बौद्धधर्मकी एक राजै राज प्रजा सुखी, इक दिन सभा मँझार । शाखा ही समझने लगे थे; परन्तु अब तो वह खे' मारग थी आवियो, कोइक विद्याधार ॥ बात नहीं रही है, उनकी दृष्टिमर्यादाको आच्छाभूपतिसे विनती करै, गिरि वैताव्य मझार ।' दित करनेवाले परदे हट रहे हैं और इससे दक्षिण श्रेणि केरल पुरी, मृगाङ्क नरपतिसार जनधर्म पूर्वीय धर्मामें अपना स्वतंत्र स्थान प्राप्त विलासवती तस कन्यका, रूप कला नहिं पार । __ करता जा रहा है । इधर जैनसमाज भी जोबन वय देखी करी, भूपति करै विचार॥ आलस्य छोड़कर जाग रहा है। उसकी ओरसे (३) आपका तीसरा ग्रंथ पाँच पदकी अनेक समाचारपत्र और सामयिक पत्रादि प्रका शित होने लगे हैं। साधुओंको भी जान पड़ता बंदना है, जो गद्यमें है। है अपने उत्तरदायित्वका भान हो रहा है। जैनधनिकोंके आश्रयसे अनेक संस्थायें दिनों दिन अधिकाधिक जैनग्रन्थ. प्रकाशित कर १ प्रकाश । २ से। रही हैं । जैनधर्म और जैनसाहित्यसम्बन्धी For Personal & Private Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] जैनधर्मका अध्ययन। ३०१ अनेक लघुग्रन्थ, सारग्रन्थ, स्थूलवर्णनात्मक भाषाको इस समय बड़े बड़े जैनसाधु और "ग्रन्थ, रहस्योद्घाटकग्रन्थ ( Keys), शब्दकोष, विद्वान भी नहीं समझते हैं। क्योंकि जब कभी आदि भारतीय विद्वानोंके द्वारा सम्पादित होकर उन्हें उन ग्रन्थोंके समझनका काम पड़ता है वे प्रकाशित हो रहे हैं। और इनके सिवाय देशी मूलके साथ दी हुई संस्कृतछाया अथवा टीका माषाओंमें भी प्रतिवर्ष बहुतसा जैनसाहित्य परसे ही अपना मतलब निकालते देखे जाते प्रकट हो रहा है। हैं। इस पद्धतिका विशेष अनुसरण होनेके यह सब होनेपर भी अभी बहत कछ करना है। कारण मूल भाषा प्राकृतके अध्ययनकी उपेक्षा जैनधर्म एक ऐसी चीज है कि वह केवल जैनों- हो गई है और इसका परिणाम यह हुआ है कि को ही नहीं किन्तु प्राच्य संशोधनविद्या प्रत्येक उसमें अनेक भूलें और असंगतियाँ घुस गई हैं । विद्यार्थीको-विशेषकरके उन लोगोंको जो कि बहुतसी हस्तलिखित प्रतियाँ तो शुद्ध पाठापूर्वदेशीय धर्मोंका तुलनात्मक दृष्टिसे अध्ययन L न्तरोंकी दृष्टिसे निराशाजनक ही दिखलाई देती करना चाहते हैं-अपनेमें तन्मय करके रख हैं। इससे जैनसाहित्यका जिन्हें व्यासंग है उन्हें सकता है। सबसे पहले तो जुदा जुदा पुस्तकालयोंमें संगृहीत सारी प्रतियाँ एकत्र करके, उन्हें बारीकीके साथ __ इस समय अर्वाचीन संशोधनपद्धतिके अनु- परस्पर मिलान करनेका काम अपने हाथमें लेना सार और गुणदोषविवेचक दृष्टिसे, जैनधर्मका चाहिए और इसके बाद पाली टेक्स्ट सुसाइटीके अध्ययन होने की बहुत ही आवश्यकता है। इस छपाये हुए बौद्धग्रन्थोंकी तरह पवित्र जैनग्रविषयके निष्णात विद्वान् स्पष्ट शब्दोंमें यह बात न्थोंकी भी विश्वासपात्र आवृत्तियाँ तैयार करनी स्वीकार करते हैं कि इस तरह तुलनात्मक पद्ध- चाहिए । अवश्य ही, यह कार्य बहुत ही कष्टकर तिसे जैनधर्मका अध्ययन होनेसे प्राचीन भार- और श्रमसाध्य है, परन्तु जब तक यह कार्य तके इतिहाससे सम्बन्ध रखनेवाली ऐसी अनेक नहीं होगा तब तक इस विषयमें हमें एक पैर बातें प्रकाशित होंगी जो अभीतक सर्वथा आगे बढ़नेकी भी आशा न रखनी चाहिए। अज्ञात हैं और उनसे ऐतिहासिक कालके अनेक यह कार्य ऐसा नहीं है कि इसे कोई एकाद परिचयहीन खाली स्थान भर जायँगे । इस तरह व्यक्ति कर डालेगा। इसमें अनेक सभा सुसाइइतिहासप्रेमियों और भारतीय धर्मों तथा तत्त्व- टियों और संस्थाओंकी सहकारिताकी आवश्यकता ज्ञानके जिज्ञासुओंके लिए जैनसाहित्य एक होगी। वर्तमानमें इस दिशामें जो कितने ही सर्वथा नवीन और बिना जुता हुआ विस्तृत क्षेत्र प्रयत्न हो रहे हैं उनसे तो उलटी निराशा ही है । परन्तु इस समय जैनधर्मके निष्पक्ष और होती है। प्रायः सभी संस्थायें उत्तराध्ययन और समदर्शी अध्ययन करनेवालोंको बहुतसी कल्पसूत्र जैसे अतिशय लोकप्रिय ग्रन्थ ही कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है । सबसे छपाती हैं । परन्तु उनके समान ही अन्य महपहली और मुख्य कठिनाई यह है कि उत्तमता- त्त्वके अन्य सर्वथा उपेक्षापात्र बन रहे हैं । इस पूर्वक सम्पादिक किये हुए मूल और प्रामाणिक कार्यके लिए सबसे उत्तम मार्ग तो यह है कि जैनग्रन्थोंका एक तरहसे अभाव हो रहा है । यह जितनी ग्रन्थप्रकाशक संस्थायें हैं, वे सब अपने तो सभी जानते हैं कि जैनोंके पवित्र ग्रन्थोंकी सम्मिलित उद्योगसे प्रामाणिक पद्धतिके अनुसार प्रधान भाषा अर्धमागधी नामकी प्राकृत है। इस यह मूल ग्रन्थ प्रकाशित करनेका काम उठा लें। For Personal & Private Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०२ जैनहितैषी - मैं समझता हूँ कि आराके 'जैनपब्लिशिंग हाउस' जैसी संस्था के लिए इस प्रकारका सहकारी कार्य उठाना कुछ कठिन नहीं पड़ेगा । इसके सिवाय, इस समय जो ग्रन्थ छपते हैं वे सब प्रायः पोथी साइजमें पत्राकार छपते हैं और इससे उनके जुदा जुदा पत्रोंके कारण, अध्ययन करते समय विद्यार्थियों को बहुत ही अड़चन पड़ती है । और फिर कितने ही सम्पा दक तो अपना कर्तव्य यहाँतक भूल जाते हैं कि ग्रन्थमें जो अवतरण या ' उक्तं च श्लोक ' आदि होते हैं उनको जुदा दिखलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करते- उन्हें भी मूलके ही टाइप ' रनिंग' छपा देते हैं । जिस समय यह कार्य अर्वाचीन पद्धतिके अनुसार योग्य रीति से सम्पादित किया जायगाअर्थात् जब मूल ग्रन्थोंमें, प्रकरणों और सूत्रोंके जुदा जुदा स्पष्ट विभाग रक्खे जायँगे, उनके अवतरण और उद्धरण स्पष्ट दिखलाये जायेंगे, अनुस न्धानोंका अन्वेषण किया जायगा, अनुक्रमणिकायें और सूचियाँ भी साथ ही दी जायँगी, उसी समय समझा जायगा कि अर्वाचीन विवेचकपद्धतिकी सहायता से इस साहित्य के अध्ययन करने का समय आ गया है। हमें नवीन साहित्यमेंसे प्राचीन साहित्य सावधानी के साथ जुदा करना होगा, विविधग्रन्थों का भरसक समयनिर्णय करना होगा, और उसकी शुद्धता या निर्दोषताकी छानवीन करनी होगी । ऐसा करते समय जो विषय स्वभावतः विवादास्पद हैं उनके सम्बन्धमें ऊहापोह करनेकी स्वतंत्रता रहनी चाहिए और उन पर प्रामाणिक मतभेद प्रकट करने की भी स्वतंत्रता रहनी चाहिए। इस समय प्राच्यविद्याविषयक विवेचनके दो जुदा जुदा सम्प्रदाय दिखलाई देते हैं । एक पक्ष तो मूलग्रथों को जितना बन सकता है उतना पुराना सिद्ध करने का प्रयत्न करता है और दूसरा पक्ष [ भाग १४ उन्हें ' येन केन प्रकारेण ' ईसाके बाद के किसी एक कालविभागमें - अर्थात् अर्वाचीन समय में खींच लाने में प्रयत्नशील दिखाई देता है । कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके मस्तिष्क पुराणप्रियता के विचारोंसे अतिशय संकुचित हो रहे हैं और इस कारण प्राचीन ग्रन्थोंमें एक भी भूल या दोष दिखलाया जाता है तो वे बहुत ही चिढ़ जाते हैं । उनके विश्वास के अनुसार मूलग्रन्थके किसी भी लिखित अर्थ या विचारके सम्बन्धमें किसी तरह की स्वतंत्र चर्चा की ही नहीं जा सकती । परन्तु अब इस प्रकार के विचार अधिक समय तक टिक नहीं सकते । तो भी हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि पुराणप्रियता भी बड़ी उपयोगी चीज है । उसके द्वारा हमें पुरातन परंपराओंका परिचय मिलता है और अनेक समय अन्य साधनों के अभाव में वही हमारे लिए मार्गदर्शिका होती है। यह ठीक है कि परम्पराओंकी भी गंभीरता से परीक्षा होनी चाहिए; परन्तु उनका सर्वथा त्याग कर देना भी किसी तरह न्याय्य नहीं हो सकता और इस विषयमें साधुओंको ही विशेष सहायता करनी होगी । उन्हें भी अपने सदाके मौनको त्याग करके, उनके पास जो परम्परागत बातोंका बड़ा भारी संग्रह है उसे उपासकोंके समक्ष उपस्थित करना चाहिए । अब उन्हें यह भय रखनेकी आवश्यकता नहीं है कि ऐसा करनेसे उनका धर्म किसी जोखिममें पड़ जायगा । क्योंकि अब यह सर्वमान्य सिद्धान्त हो गया है कि छुपा रखनेसे कभी किसी सत्यकी वृद्धि नही होती । यह सब व्यवस्था करने और जैनधर्मको अध्ययनकी सुदृढ़नीव पर खड़ा करनेके लिए एक उत्साही और शक्तिशाली विद्वन्मण्डलको आगे बढ़ना चाहिए और अपने दृढ़तायुक्त कार्यके द्वारा जगतको बतला देना चाहिए कि आज तक जिन जिन ज्ञानशाखाओंका पता For Personal & Private Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] जैनधर्मका अध्ययन। ३०३ लगा है, उन्हींके समान यह भी एक शाखा है हमारा खयाल है कि हमारे सम्प्रदायके जीवनऔर महत्त्वकी दृष्टिसे यह अन्य सब शाखा- भूत प्रधान धर्मग्रन्थ प्राकृतमें ही हैं और वही ऑसे जरा भी कम नहीं है । सौभाग्यसे पवित्र हमारा सबसे प्राचीन साहित्य है । भगवत्कुन्दआगमग्रन्थोंकी भाषामें प्रवीणता प्राप्त करनेकी कुन्दाचार्यके नाटक समयसार, प्रवचनसार, पंचाएक कठिनाई तो अब बाम्बे यनीवर्सिटीने दर स्तिकाय, षट्पाहुड़, आचार्य बट्टकेरका मूलाचार, कर दी है-उसने अपने अभ्यासक्रममें अर्ध-माग- शिवायनकी भगवती आराधना, यतिवृषभकी धीको भी स्थान दे दिया है। अब जैन विद्या- त्रिलोकप्रज्ञप्ति, स्वामिकुमारकी कार्तिकेयानुप्रेक्षा, र्थियोंका यह कर्तव्य है कि वे अन्तःकरणपूर्वक पद्मनन्दिकी जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति, गोम्मटसार, त्रिलोइस भाषाका अध्ययन करना स्वीकार करें और कसार, द्रव्यसंग्रह, परमात्मप्रकाश आदि प्रधान जैन धनिकोंको चाहिए कि वे इस कार्य में विशेष प्राकृतग्रन्थ इस समय भी सर्वत्र विख्यात हैं। आचार्य उत्तेजन देवें और उन्हें हर तरह सहायता पहुँचावें। पूज्यपाद, भट्टाकलंकदेव, विद्यानन्द, प्रभाचन्द्र मैंने सना है कि एके जैनसंस्था जैनधर्मके विद्या- आदिके महान ग्रन्थोंमें जब हम जगह जगह प्राकृर्थियोंको जो जो सहायतायें अपेक्षित हों वे तके उद्धरण और 'उक्तंच' श्लोक आदि देखते हैं, देनेके लिए तैयार है, इसलिए हमें आशा है तब अनुमान होता है कि उनके समयमें भी प्रधान कि इस विषयके उत्साही विद्यार्थी आगे आगे मा सा माननीय ग्रन्थ प्रायः प्राकृतके ही थे। इस समय बीसों संस्कत ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं जो प्राकत और इस महान कार्य के प्रथम फल थोड़े ही समयमें बा - परसेही संस्कृतमें अनुवाद किये गये हैं और जनताके सामने उपस्थित करनेमें न चूकेंगे। "* मूडविद्रीके सुप्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ-जो हम १-इसमें जो कुछ लिखा गया है वह श्वेता- लोगोंके आलस्यसे कईसौ वर्षेसे एक ही जगह म्बर सम्प्रदायके सूत्रग्रन्थोंको लक्ष्य करके लिखा कैद हो रहे हैं-तथा दिन पर दिन नष्ट होते जा गया है जो कि अर्ध मागधी भाषामें हैं और रहे हैं-प्रायः प्राक्रतमें ही हैं। इन्द्रनन्दिके जिन्होंने श्वेताम्बर साहित्यके एक बहुत बड़े श्रुतावतारमें जो उनका संक्षिप्त परिचय मिलता भागको रोक रक्खा है । यद्यपि इस समय दिगम्बर है, उससे तो मालूम होता है कि वे सब सम्प्रदायका जितना साहित्य उपलब्ध और परि- ग्रन्थ दिगम्बर सम्प्रदायके सर्वस्व है और उनकी चित है, उसका अधिकांश संस्कृतमें है और इस श्लोकसंख्या कई लाख है ! हमारा अनुकारण हमारे समाजके बडे बडे विद्वानोंतकका मान है कि श्वेताम्बरसाहित्यमें जो स्थान यह खयाल हो गया है कि हमारी प्रधान धार्मिक आगम या सूत्रग्रन्थोंका है वही दिगम्बरसाहित्यमें भाषा संस्कृत है। परन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं : उक्त सिद्धान्तग्रन्थोंका है । हमारे एक मित्रने नागौरका पुस्तकभण्डार देखा है । वे कहते हैं है । बहुत कुछ नष्ट होजाने पर भी-अब भी कि इस भण्डारमें भी ऐसे सैकड़ों प्राकृत भाषाके __ * यह लेख बडौदा-कालेजके गत फरवरीके ग्रन्थ हैं जो अन्य दिगम्बर सम्प्रदायके पस्तकामेगजीनमें 'दि स्टेडी आफ जैनिज्म' नामसे अंग- लयोंमें नहीं मिलते । ऐसी दशामें कोई कारण रेजीमें प्रकाशित हुआ था। यह उक्त कालेजके पाली नहीं मालूम होता कि हम लोग भी प्रो० राज. भाषाके प्रोफेसर श्रीयुक्त सी० बी० राजबाड़े एम० बाड़ेके कथनानुसार जैनधर्मके अध्ययन करने९०, बी० एस सी० का लिखा हुआ है। हम अपने वालोंके लिए अपने प्राकृतग्रन्थोंको नई संशोधन दिगम्बर समाजका ध्यान इस आर आकर्षित करनेके पद्धतिके अनुसार प्रकाशित करने का प्रयत्न लिए इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करते हैं। न करें । हमें यह भी चाहिए कि अपने For Personal & Private Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैर्षा [भाग १४ धार्मिक विद्यालयोंमें संस्कृतके साथ साथ प्राकृतके चाहिए । अब हमें चाहिए कि इस ढंगको बदलें अध्ययनका भी खास प्रयत्न करें और कुछ और ग्रन्थप्रकाशनके कार्यको बहुत सावधानीके विद्यार्थियोंको प्राकृतका विशेषज्ञ बनावें जिनके साथ नई पद्धतिके अनुसार करें। द्वारा आगे प्राकृतग्रन्थांके सम्पादनका कार्य ३-प्रो. राजवाडेने अपने लेखम जो ग्रन्थकराया जा सके। यह तो कहनेकी आवश्यकता प्रकाशिनी संस्थाओंका उल्लेख किया है, वह ही नहीं है कि हमें सबसे पहले अपने बचे भी प्रधानतः श्वेताम्बर सम्प्रदायकी संस्थाओंको खुचे साहित्यके संग्रह करनेका, उसे सबके लिए लक्ष्य करके किया है । श्वेताम्बर सम्प्रदायमें सुलभ कर देनेका और सिद्धान्त ग्रन्थोंके प्राण कई बड़ी बड़ी ग्रन्थप्रकाशिनी संस्थायें हैं और बचानेका उद्योग करना चाहिए। उनके द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों ग्रन्थ प्रकाशित होते २-प्राचीन ग्रन्थोंका सम्पादन किस ढंगसे हैं। दिगम्बर समाजका दुर्भाग्य है कि उसमें होना चाहिए, इस विषयमें प्रो० राजबाड़ेने जो एक तो ऐसी संस्थायें ही बहुत कम हैं और जो कुछ लिखा है उस पर हमारे समाजके ग्रन्थ- एक दो हैं भी, वे सुश्किलसे सालभरमें दस पाँच प्रकाशकों और सम्पादकोंको खास तौरसे ध्यान छोटे मोटे ग्रन्थ प्रकाशित करती हैं । दुनिया देना चाहिए । जिस समय हम यूरोपीय और कहींसे चलकर कहीं पहुँच गई, परन्तु हम सुशिक्षित भारतीय विद्वानोंके द्वारा सम्पादित लोगोंके मस्तकमें इस समय भी कुछ न कुछ प्राचीन ग्रन्थ देखते हैं उस समय सचमुच ही अंशमें यह गतानुगतिकताका भूत डेरा जमाये हुए यह खयाल होता है कि हम लोग अपने पाण्डि- है कि धर्मग्रन्थ छपानेमें पाप है। यही कारण त्यकी चाहे जितनी डींग मारें, परन्त अभी तक है कि छपे जैनग्रन्थोंका घरं घर प्रचार हो जानेहमको यह ग्रंथसम्पादनका कार्य आता ही पर भी अभी तक हमारी महासभा या प्रान्तिक नहीं है । हमारे ग्रन्थ इतने अशुद्ध और अप्रा- सभायें प्रकाश्यरूपसे स्वयं अपने द्वारा ग्रन्थप्रमाणिक पद्धतिसे छपते हैं कि किसी विषयका काशनका कार्य करानेमें डरती हैं। महासभ'का निर्णय करते समय उन पर विश्वास करनेको मुखपत्र जैनगजट तो छपे हुए जैनग्रन्थोंके जी ही नहीं चाहता। न तोमहीनों परिश्रम किये विज्ञापन प्रकाश करनेमें भी पाप समझता है ! बिना उनसे यह पता लग सकता है कि अमुक हमारी समझमें अब ये मूर्खताके ढंग बदल दिये ग्रन्थमें उक्तंच श्लोक आदि कितने हैं, कहाँ जाने चाहिये और दिगम्बर साहित्यके प्रकाशित कहाँ पर आये हैं और किन किन ग्रन्थोंके हैं करनेके लिए एक अच्छी संस्था स्थापित की और न कोई श्लोक ही ढूँढ़नेसे सहज ही उसमें जानी चाहिए। इसके बिना हमारा साहित्य मिल सकता है। पाठान्तर तो बहत ही कम दिन पर दिन नष्ट होता जा रहा है और इसका दिये जाते हैं । जिन ग्रन्थोंकी प्रयत्न करनेसे पाप हमारे ही सिर चढ़ रहा है ! अनेक प्रतियाँ मिल सकती हैं, उनके ४-बाम्बे यूनीवर्सिटीने अपने कोर्समें जो भी पाठान्तर नहीं दिये जाते हैं । कोई मागधीको स्थान दिया है, उससे भी हमें लांभे कोई सम्पादक महाशय तो यहाँ तक कृपा उठाना चाहिए। हमारी ओरसे भी मागधी पढनेकरते हैं कि ग्रन्थमें जहाँ कहीं ठीक समझमें। वाले विद्यार्थियों को सहायता देनेका प्रबन्ध नहीं आता है वहाँ अपनी बुद्धिके अनुसार होना चाहिए। मूल पाठको भी ठीक ( ? ) कर देते हैं और यह भी लिखने का कष्ट नहीं उठाते कि यहाँ पर मूल -नाथूराम प्रेमी। म तो ऐसा है, परन्तु हमारी समझमें ऐसा होन। For Personal & Private Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] नयचक्र और श्रीदेवसेनसूरि। '३०५ नयचक्र और श्रीदेवसेनसरि । नेकी सिफारिश करते । इसके सिवाय जैसा, आगे चलकर बतलाया जायगा, देवसेनसूरि विद्यानन्द स्वामीके पीछेके ग्रन्थकर्ता हैं । अतः [ लेखक-श्रीयुत नाथूराम प्रेमी।] श्लोकवार्तिकमें जिस नयचक्रका उल्लेख है, वह कोई दूसरा ही नयचक्र होगा। नयचक्र। - श्वेताम्बरसंप्रदायमें ' मल्लवादि' नामके एक आचार्य विद्यानन्दने अपने श्लोकवातिक बडे भारी तार्किक हो गये हैं । आचार्यहरिभ( तत्त्वार्थसूत्रटीका ) के नयविवरण नामक द्रने अपने ‘अनेकांत-जयपताका' नामक प्रकरणके अन्तमें लिखा है: ग्रंथमें वादिमुख्य मल्लवादिकृत 'सम्मति-टीका के संक्षेपेण नयास्तावव्याख्याताः सूत्रसूचिताः। कई अवतरण दिये हैं और श्रद्धेय मुनि जिनवितद्विशेषाः प्रपञ्चेन संचिंत्त्या नयचक्रतः ॥ जयजीने अनेकानेक प्रमाणोंसे हरिभद्रसूरिका समय अर्थात् तत्त्वार्थसूत्र में जिन नयोंका उल्लेख वि० सं०७५७ से ८२७ तक सिद्ध किया है। अतः है, उनका हमने संक्षेपमें व्याख्यान कर दिया। आचार्य मल्लवादि विक्रमकी आठवीं शताब्दिके यदि उनका विस्तारसे और विशेषपूर्वक स्वरूप पहलेके विद्वान् हैं, यह निश्चय है । और विद्याजाननेकी इच्छा हो के ' नयचक्र' से जानना। नन्दस्वामी विक्रमकी ९ वीं शताब्दिमें हुए हैं। इस उल्लेखसे मालूम होता है कि विद्यानन्द यह भी प्रायः निश्चित हो चका है। स्वामीसे पहले 'नयचक ' नामका कोई ग्रन्थ उक्त मल्लवादिका भी एक नयचक्र' नाथा जिसमें नयोंका स्वरूप खूब विस्तारके साथ मका ग्रंथ है जिसका परा नाम 'द्वादशारदिया गया है । परन्तु वह नयचक्र यही देवसेन- नयचक । है । जिसतरह चक्रमें आरे होते सृरिका नयचक्र था, ऐसा नहीं जान पड़ता । हैं, उसी तरह इसमें बारह आरे अर्थात् क्योंकि यह बिलकुल ही छोटा है । इसमें कुल अध्याय हैं। यह ग्रंथ बहुत बड़ा है । इसपर ८७ गाथायें हैं और माइल्ल धवलके बृहत् नय- आचार्य यशोभद्रजीकी बनाई हुई एक टीका चक्रमें भी नयसम्बन्धी गाथाओंकी संख्या इससे है जिसकी श्लोकसंख्या १८००० है । यह 'अधिक नहीं है। इन दोनों ही ग्रन्थोंमें नयोंका अनेक श्वेताम्बर पुस्तकालयोंमें उपलब्ध है। स्वरूप बहुत संक्षेपमें लिखा गया है । इनसे संभव है कि विद्यानन्दस्वामीने इसी नयचक्रको अधिक तो स्वामी विद्यानन्दने ही नयविवरणमें लक्ष्य करके पूर्वोक्त सूचना की हो । जिस तरह लिख दिया है। नयविवरणकी श्लोकसंख्या ११८ हरिवंशपुराण और आदिपुराणके कर्त्ता दिगंहै और उनमें नयोंका स्वरूप बहुत ही उत्तम बर जैनाचार्योंने सिद्धसेनसूरिकी प्रशंसा की रीतिसे नयचक्रकी भी अपेक्षा स्पष्टतासे-लिखा है-जो कि श्वेताम्बराचार्य समझे जाते हैंहै। ऐसी दशामें यह संभव नहीं कि श्लोक- उसी तरह विद्यानन्दस्वामीने भी श्वेतांबराचार्य वार्तिकके कर्ता अपने पाठकोंसे देवसेनसूरिके - १ अहमदाबादमें सेठ मनसुखभाई भग्गूभाईके द्वारा नयचक्रपरसे विस्तारपूर्वक नयोंका स्वरूप जान छप चुका है । २ यह आचार्य सिद्धसेनसूरिके * माणिकचन्दजैनग्रन्थमालाके १६ वें ग्रन्थ 'सम्मतितर्क' नामक ग्रंथकी टीका है। ३ देखो. 'नयचक्र-संग्रह ' की भूमिकाके लिए यह लेख लिखा जैनसाहित्यसंशोधक अंक १। ४ देखो जैनहितैषी गया था और वहींसे यहाँ उद्धृत किया जाता है। वर्ष ९ अंक ९ । For Personal & Private Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ___३०६ जैनहितैषी [भाग १४ मल्लवादिके ग्रंथको पढ़नेकी सिफारिश की हो, 'पूनामें इस ग्रन्थकी एक प्रति है, उसके अन्तमें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । जिस तरह प्रतिलेखकने लिखा है-" इति सुखबोधार्थमालासिद्धसेनसूरि तार्किक थे उसी तरह मल्लवादि पपद्धतिः श्रीदेवसेनविरचिता समाप्ता । इति भी थे और दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदायके श्रीनयचक्र सम्पूर्णम् ॥” उक्त पुस्तकालयकी * तार्किक सिद्धांतोंमें विशेष महत्त्वका मतभेद भी सूचीमें भी यह नयचक्र नामसे ही दर्ज है। नहीं है । तब नयसंबंधी एक श्वेतांबर तर्कग्र- बासोदाके भंडारकी सुचीमें भी-जो बम्बईके न्थका उल्लेख एक दिगम्बराचार्य द्वारा किया दिगम्बर जैनमन्दिरके सरस्वतीभण्डारमें मौजूद जाना हमें तो असंभव नहीं मालूम होता। है-इसे नयचक्र संस्कृत गद्यके नामसे दर्ज अनेक श्वेतांबर ग्रन्थकर्ताओंने भी इसी तरह किया है । पं० शिवजीलालकृत दर्शनसारदिगंबर ग्रन्थकारोंकी प्रशंसा की है और उनके वचनिकामें देवसेनके संस्कृत नयचक्रका जो ग्रन्थोंके हवाले दिये हैं। . उल्लेख है, वह भी जान पड़ता है, इसी आलायह भी संभव है कि देवसेनके अतिरिक्त पपद्धतिको लक्ष्य करके किया गया है । यद्यपि .. अन्य किसी दिगम्बराचार्यका भी कोई नयचक्र आलापपद्धतिमें नयचक्रका ही गद्यरूप सारांश हो और विद्यानन्दस्वामीने उसका उल्लेख किया है और वह नयचक्रके ऊपर ही की गई है, इस हो । माइल्लधवलके बृहत् नयचक्रके अंतकी लिए कुछ लोगों द्वारा दिया गया उसका यह एक गाथा-जो केवल बम्बईवाली प्रतिमें है, 'नयचक्र' नाम एक सीमातक क्षम्य भी हो मोरेनाकी प्रतिमें नहीं है-यदि ठीक हो तो सकता है। परन्तु वास्तवमें इसका नाम · आलाउससे इस बातकी पुष्टि होती है । वह गाथा पपद्धति' ही है-नयचक्र नहीं। इस प्रकार है: __आलापपद्धतिके प्रारंभमें ही लिखा हैदुसमीरणेण पोयं पेरियसंतं जहा ति (चि) रं न। “आलापपद्धतिर्वचनरचनानुक्रमेण नयचक्रस्योसिरिदेवसेन मुणिणा तह णयचक्कं पुणो रइयं ॥ परि उच्यते ।" इससे मालूम होता है कि आलाप. इसका अभिप्राय यह है कि दुःषमकालरूपी पद्धति नयचक्रपर ही प्रश्नोत्तररूप संस्कृतमें आँधीसे पोत (जहाज ) के समान जो नयचक्र लिखी गई है । आलाप अर्थात् बोलचालकी चिरकालसे नष्ट हो गया था उसे देवसेन मुनिने पद्धतिपर अथवा वचनरचनाके ढंगपर यह फिरसे रचा । इससे मालूम होता है कि देवसेनके 'सुखबोधार्थ' या सरलतासे समझमें आनेके नयचक्रसे पहले भी कोई नयचक्र था जो नष्ट हो लिए बनाई गई है । इसकी प्रत्येक प्रतिमें इसे गया था और बहुत संभव है कि देवसेनने यह 'देवसेनकृता' लिखा भी मिलता है, इससे उसीका संक्षिप्त उद्धार किया हो। यह निश्चय हो जाता है कि यह नयचक्रके उपलब्ध ग्रंथों में नयचक नामके तीन ग्रन्थ कर्ता देवसेनकी ही रची हुई है-अन्य प्रसिद्ध हैं-१ आलापपद्धति, २ लघनयचक्र. और किसीकी नहीं। ३ बृहत् नयचक्र । इनमेंसे पहला ग्रन्थ आलाप- २ लघु नयचक्र । श्रीदेवसेनसूरिका वास्तपद्धति संस्कृतमें है और शेष दो प्राकृतमें। विक नयचक्र यही है । इसके साथ जो ‘लघु ' १ आलापपद्धति । इसके कर्ता भी देव- * सन् १८८४-८६ की रिपोर्ट के ५१९ वें नम्ब. सेन ही हैं । डा० भाण्डारकर रिसर्च इन्स्टिट्यूट रका ग्रन्थ देखो । For Personal & Private Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] नयचक्र और श्रीदेवसेनसूरि । ३०७ विशेषण लगाया गया है वह इसके दूसरे ग्रन्थको नाम दिये हैं उनमें प्राकृत नयचक्र भी है। बड़ा देखकर लगा दिया गया है। परंतु वास्त- अर्थात् उनके मतसे भी यह देवसेनकी ही वमें उसका नाम ' द्रव्यस्वभावप्रकाश' है और कृति है । उसके कर्ता 'माइल्ल धवल' हैं जैसा कि आगे सिद्ध किया गया है । इसलिये इसका नयचक्रके. ___ यह नयचक्र ( लघु ) बृहत् नयचक्र ( द्रव्यस्वभावप्रकाश ) मेंसे छाँटकर जुदा ही नामसे उल्लेख किया जाना चाहिए। निकाला हुआ नहीं है। यह बात इस ग्रंथको ___ श्वेतांबराचार्य यशोविजयजी उपाध्यायने आदिसे अंततक अच्छी तरह बाँच लेनेसे ही अपने 'द्रव्यगुणपर्यय रासा' (गुजराती) में ध्यानमें आ जाती है । यह संपूर्ण ग्रन्थ है और देवसेनके नयचक्रका कई जगह उल्लेख किया है स्वतंत्र है । यह इसकी रचना-पद्धतिसे ही और उक्त रासके आधारसे ही लिखे हुए 'द्रव्या- मालम हो जाता है। नयोंको छोडकर इसमें नुयोगतर्कणा' नामक संस्कृत ग्रन्थमें भी उक्त अन्य विषयोंका विचार भी नहीं किया गया है। उल्लेखोंका अनुवाद किया है । एक उल्लेख इसके अंतकी नं० ८६ और ८७ की गाथाओंसे इस प्रकार है: (पृष्ठ १९-२०) यह भी स्पष्ट हो जाता है " नयश्चोपनयाश्चैते तथा मूलनयावपि। कि इसका नाम नयचक्र ही है-उसके साथ इत्यमेव समादिष्टा नयचक्रेऽपि तत्कृता ॥ ८॥ कोई ‘लघ' आदि विशेषण नहीं है। एते नया उक्तलक्षणाश्च पुनरुपनयास्तथैव द्वौ मलनयावपि निश्चयेनेत्थममुना प्रकारेणैव नय- ३ बृहत् नयचक्र । इसका वास्तविक नाम चक्रेऽपि दिगम्बरदेवसेनकृते शास्त्रे नयचक्रेपि 'दव्वसहावपयास' ( द्रव्यस्वभाव-प्रकाश ). तत्कृता तस्य नयचक्रस्य कृता उत्पादकेन समा- यह 'द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र ' है । .. दिष्टं कथितं । एतावता दिगम्बरमतानगतनयचक्र ग्रंथकतोने स्वयं इस नामको ग्रंथके प्रारंभमें और ग्रन्थपाठपठितनयोपनयमलनयादिकं सर्वमपि अंतमें कई जगह व्यक्त किया है । नयचक्र तो सर्वज्ञप्रणीतसदागमोक्तयक्तियोजनासमानतंत्रत्वमे- इसका नाम हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वास्ते न किमपि विसंवादितयास्तीति ।" . नयोंके अतिरिक्त द्रव्य, गुण, पर्याय, दर्शन, ज्ञान, उक्त तर्कणा' में जो नयोंका स्वरूप दिया .... चारित्र आदि अन्य अनेक विषयोंका इसमें वर्णन , है, वह बिलकुल. नयचक्र' का अनुवाद है किया गया है । यह एक संग्रहग्रन्थ है ।। और इसे स्वयं ग्रन्थकर्ता भोजसागरने स्वीकार जिस तरह इसमें भगवत्कुंदकंदाचार्यकृत पंचाकिया है । इससे निश्चय हो जाता है कि उपा स्तिकाय प्रवचनसार आदिकी गाथाओंको और ध्याय यशोविजयजी और तर्कणाके कर्ता भोज उनके अभिप्रायोंको संग्रह किया गया है, उसी-. सागर इसी नयचक्रको देवसेनका रचा हुआ . तरह लग भग पूरे नयचक्रको भी इसमें शामिल कर लिया गया है। यहाँतक कि मंगलाचरणकी समझते थे। और अंतकी नयचक्रकी प्रशंसासूचक गाथायें दर्शनसारकी वचनिकाके कर्ता पं० शिवजी भी नहीं छोड़ी हैं। जान . पड़ता है कि नयचलालजीने देवसेनसूरिके बनाये जिन सब ग्रन्थोंके । क्रकी उक्त प्रशंसासुचक गाथाओंके कारण ही * देखो रायचंद्रशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित 'द्रव्या- लोगोंको भ्रम हो गया है और वे इसे 'बृहत् नुयोगतर्कणा' अध्याय ८ श्लोक ८ पृष्ठ ११५। न यचक्र' कहने लगे हैं। For Personal & Private Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १. ३०८ - जैनहितैषी [ भाग १४ ___ इसके प्रारंभकी उत्थानिकामें लिखा है:- धवलका देवसेनसूरिसे कुछ निकटका गुरुशिष्य "श्रीकुंदकुंदाचार्यकृतशास्त्राणां सारार्थ परिगृह्य संबंध होगा । बम्बईवाली प्रतिकी गाथा माइल्ल स्वपरोपकाराय द्रव्यस्वभावप्रकाशकं नयचक्रं धवलसे कोई संबंध नहीं रखती है-वह नयमोक्षमार्ग कुर्वन गाथाकर्ता '...इष्टदेवता- चक्र और देवसेनसूरिकी प्रशंसावाचक अन्य विशेषं नमस्कुर्खन्नाह-।" यहाँ द्रव्यस्वभाव- तीन चार गाथाओंके समान एक जुदी ही प्रकाशक नयचक्रका विशेषण है। संग्रहकर्ताका प्रशस्ति-गाथा है । इससे यह अभिप्राय भी हो सकता है कि यह . नीचे लिखी गाथामें कहा है कि दोहा छंदमें - नयचक्रयुक्त द्रव्यस्वभावप्रकाशक ग्रंथ है। रचे हुए 'द्रव्य-स्वभाव-प्रकाश'को सुनकर सुहं अब हमें यह देखना चाहिए कि इस 'द्रव्य- कर या शुभंकर नामके कोई सज्जन-जो संभवतः - स्वभावप्रकाश' के कर्ता कौन हैं। माइल्ल धवलके मित्र होंगे-हँसकर बोले कि दोहादव्वसहावपयासं दोहयबंधेण आसि जं दिद। ओंमें यह अच्छा नहीं लगता; इसे गाथाबद्ध तं गाहाबंधेण य रइयं माइलधवलेण ॥ . कर दोः'दुसमीर-पोयमि ( नि ) वाय पा ( या) ता (णं). सुणिऊण दोहरत्थं सिग्धं हसिऊण मुहकरो भणइ । सिरिदेवसेणजोईणं । एत्थ ण सोहइ अत्थो गाहाबंधेण त भणह ॥ तेसिं पायपसाए उवलद्धं समणतच्चेण ॥ इससे भी यही मालूम होता है कि 'दव्वसपहली गाथाका अर्थ यह है कि 'दव्वसहा- हावपयास ' पहले दोहाबद्ध था और उसे माइल्ल वपयास' नामका एक ग्रन्थ था जो दोहा- धवलने गाथाबद्ध किया है। माइल्ल धवल ‘गाथाछंदोंमें बनाया हुआ था। उसीको माइल धव कर्ता' ही हैं, इसका खुलासा इस ग्रन्थकी उत्थालने गाथाओंमें रचा। निकासे भी हो जाता है जहाँ लिखा है कि ___ दूसरी गाथा बहुत कुछ अस्पष्ट है। फिर भी गाथाकर्ता (ग्रन्थकर्ता नहीं ) इष्टदेवताको उसका अभिप्राय लगभग यह है कि श्रीदेवसेन नमस्कार करते हुए कहते हैं। योगाके चरणोंके प्रसादसे यह ग्रंथ बनाया गया। नीचे लिखी गाथाओंसे भी यह प्रकट होता ___ यह गाथा बम्बईकी प्रतिमें नहीं है, मोरे- है कि इस ग्रन्थके कर्ता देवसेनसरि नहीं किंतु नाकी प्रतिमें है । बम्बईकी प्रतिमें इसके बदले माइल्ल धवल हैं:- 'दुसमीरणेण पोयं पेरियसंतं' आदि गाथा है- दारियदुण्णयदणुयं परअप्पपरिक्खतिक्खखरधारं । जो ऊपर एक जगह उद्धृत की जा चुकी है। सव्वण्हुविण्हुचिण्डं सुदंसणं णमह णयचक्कं ॥ और जिसमें यह बतलाया गया है कि देवसेन सुयकेवलीहिं कहियं सुअसमुद्दअमुदमयमाणं । बहुभंगभंगुराविय विराजियं णमह णयचक्कं ॥ - मुनिने पुराने नष्ट हुए नयचक्रको फिरसे बनाया। सियसद्दसुणयदुण्णयदणुदेहविदारणेक्कवरवीरं । मोरनावाला प्रातका गाथा याद ठाक ह ता तं देवसेणदेवं णयचक्कयरं गुरुं णमह ॥ उसस केवल यहा मालूम हाता है कि माइल इनमेंसे पहली दो गाथाओंमें नयचक्रकी __ १ बम्बईवाली प्राचीन प्रतिमें यहाँ 'गाथाकर्ता' ही प्रशंसा करके कहा है कि ऐसे विशेषणों युक्त पाठ है, जब कि मोरेनाकीमें 'ग्रन्थकर्ता' है । वास्तवमें नयचक्रको नमस्कार करो और तीसरी गाथामें गाथाकर्ता ही होना चाहिए । यही पाठ छपना भी कहा है कि दुर्नयरूपी राक्षसको विदारण करचाहिए था। नेवाले श्रेष्ठ बीर गुरु देवसेनको जो नयचक्रके For Personal & Private Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww.. अङ्क १०-११] नयचक्र और श्रीदेवसेनसूरि। ३०९ कर्ता हैं-नमस्कार करो । यदि इस ग्रंथके पुवायरियकयाहं गाहाई संचिऊण एयत्थ । कर्ता स्वयं देवसेन होते तो वे अपने सिरिदेवसेणगणिणा धाराए संवसंतेण ॥ ४९॥ लिये गुरु आदि शब्दोंका प्रयोग न करने और रइओ दंसणसारो हारो भब्वाण णवसए नवए। न यही कहते कि तुम उन देवसेनको और सिरिपासणाहगेहे सुविसुद्धे माहसुद्धदसमीए ॥५०॥.. उनके नयचक्रको नमस्कार करो । अर्थात् पूर्वाचार्योंकी रची हुई गाथाओंको एक जगह संचित करके श्रीदेवसेन गणिने धारा___ इन सब बातोंसे सिद्ध है कि छोटे नयचक्रके नगरीमें निवास करते हुए पार्श्वनाथके मंदिरमें कर्ता ही देवसेन हैं और माइल्लधवल उन्हींको माघ सुदी दशवीं विक्रम संवत् ९९० को लक्ष्य करके उक्त प्रशंसा करते हैं । माइल्लधवलने यह दर्शनसार नामक ग्रन्थ रचा । इससे देवसेनसूरिके पूरे नयचक्रको अपने इस ग्रन्थमें निश्चय हो जाता है कि उनका अस्तित्वकाल. अन्तर्भित कर लिया है, ऐसी दशामें उनका विक्रमकी दशवीं शताब्दि है । अपने अन्य इतना गुणगान करना आवश्यक भी हो गया है। किसी ग्रन्थमें उन्होंने ग्रंथ-रचनाका समय नहीं, ___ माइल्लधवलने इसके सिवाय और भी कोई दिया है। ग्रंथ बनाये हैं या नहीं और ये कब कहाँ हुए यद्यपि इनके किसी ग्रन्थमें इस विषयकाहैं, इसका हम कोई पता नहीं लगा सके। उल्लेख नहीं है कि वे किस संघके आचार्यआश्चर्य नहीं जो वे देवसेनके ही शिष्योंमें हों, थे; परन्तु दर्शनसारके पढ़नेसे यह बात स्पष्ट जैसा कि मोरेनाकी प्रतिकी अंतिम गाथासे और हो जाती है कि वे मूलसंघके आचार्य थे। देवसेनके लिए श्रेष्ठ गुरु शब्दका प्रयोग देखनेसे दर्शनसारमें उन्होंने काष्ठासंघ, द्रविडसंघ, माथुजान पड़ता है। -रसंघ और यापनीयसंघ आदि सभी दिगम्बरदेवसेनसूरि । संघोंकी उत्पत्ति बतलाई है और उन्हें मिथ्याती ___ कहा है; परन्तु मूलसंघके विषयमें कुछ नहीं कहा? नयचक्रके संबंधमें इतनी आलोचना करके है। अर्थात् उनके विश्वासके अनुसार यही मूल-: अब हम संक्षेपमें इसके कर्ता देवसेनसूरिका परि- से चला आया हुआ असली संघ है। चय देना चाहते हैं । इनका बनाया हुआ एक दर्शनसारकी ४३ वी गाथामें लिखा है 'भावसंग्रह ' नामका ग्रन्थ है। उसमें वे अपने कि यदि आचार्य पद्मनन्दि ( कुन्दकुन्द ) विषयमें इस प्रकार कहते हैं: १-पूर्वाचार्यकृता गाथाः संचयित्वा एकत्र।। सिरिविमलसेणगणहरसिस्सो श्रीदेवसेनगणिना धारायां संवसता ॥ ४९ ॥ णामेण देवसेणुत्ति। २-रचितो दर्शनसारोहारो भव्यानां नवशते नवती। अबुहजणबोहणत्थं तेणेयं विरइयं सुत्तं ॥ श्रीपाश्वनाथगेहे सुविशुद्ध माघशुद्धदशम्याम् ॥५०॥ इससे मालूम होता है कि इनके गुरुका नाम ३-दर्शनसारकी अन्य गाथाओंमें जहाँ जहाँ संव-. श्रीविमलसेन गणधर (गणी) था । दर्शनसार त्का उल्लेख किया है, वहाँ वहाँ 'विक्कमरायस्स मरणपनामक ग्रन्थके अंतमें वे अपना परिचय देते हुए तस्स' पद देकर विक्रम संवत् ही प्रकट किया है। लिखते हैं: इसके सिवाय धारा (मालवा ) में प्रायः विक्रम संवत ही प्रचलित रहा है। १-श्रीविमलसेनगणधरशिष्यः नामेन देवसेन इति । ४ जइ पउमणंदिणाहो सीमंधरसामिदिव्वणाणेण । अबुधजनबोधनार्थे तेनेदं विरचितं सूत्रं ॥ ण विवोहइ तो समणा कहं सुमग्गं पयाणंति ॥ For Personal & Private Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३१० - जैनहितैषी [भाग १४ सीमन्धर स्वामीद्वारा प्राप्त दिव्यज्ञानके द्वारा बोध देख रही थी स्वप्नमें, भोजन मुझको मिल गया । न देते तो मुनिजन सच्चे मार्गको कैसे जानते ? यद्यपि भूख मिटी नहीं, तो भी था मन खिल गया। इससे यह भी निश्चय हो जाता है कि वे श्रीकु आहा बासी भात ! रोटियाँ जिनपर घी था: न्दकुन्दाचार्यकी आम्नायमें थे। चौलाईका साग! मिष्ट सुस्वाद सभी था। __ भावसंग्रह ( प्राकृत ) में जगह जगह ज्योंकी त्यों थी भूख खुब था यद्यपि खाय दर्शनसारकी अनेक गाथायें उद्धत की गई हैं पानी पीकर एक ओरको पैर बढ़ाया। और उनका उपयोग उन्होंने स्वनिर्मित गाथा- देखा, ओहो सामने, चले श्वसुरजी जा रहे । ओंकी भाँति किया है। इससे इस विषय में कोई उनके पीछे जेठजी धीरे धीरे आ रहे ॥ (४) संदेह नहीं रहता कि दर्शनसार और भावसंग्रह जेठानी भी एक हाथ सासका पकड़ेदोनों के कर्ता एक ही देवसेन हैं। और एकसे प्रिय कृष्णाके करको जकड़ेइनके सिवाय आराधनासार और तत्त्वसार । उनके पीछे चली आ रही हैं इतरातीनामके ग्रंथ भी इन्हीं देवसेनके बनाये हुए हैं। मुसका करके किसी विषय पर कुछ बतराती । पं. शिवजीलालने इनके 'धर्मसंग्रह' नामके। सबकी नजरें थीं पड़ी, चढ़ी सभीकी भृकुटियाँ हा कपाल ! हैं बन गई, मुझसे क्या क्या कुत्रुटियाँ । "एक और ग्रंथका उल्लेख किया है; परंतु वह अभीतक हमारे देखनेमें नहीं आया है। याद तुम्हारी आजाने पर जी मसोस कर मैं थी रोने लगी भाग्यको कोसकोस कर;स्वप्न-सर्वस्व । वे सुख, वे आनन्द और वे प्यारी बातें वे गहने, वे वस्त्र और वे रसमय घातें-- (ले०-भगवन्त गणपति गोइलीय।) क्या हो गई पता नहीं, कहाँ गया सुख साज सब एक तुम्हारे ही बिना नरक हुआ जग आज सब क्यों आये थे निठुर इस तरह मुझे जलाने ? मुझ दुखिनीके लिए सदयता यों दिखलाने । ऐसा कह कह जभी प्रभो ! मैं विलप रही थी; ... शान्तिप्रदा वह नींद लगी थी कुछ कुछ आने । इस अभाग्य पर फूट फूट रो-कलप रही थी। और कष्टसे उठा शान्तिसुखमें पहुँचाने। परम दीप्ति-संयुक्त निकट, तुम मेरे आए; सच कहती हूँ उससमय, मुझे न कुछ भी ध्यान था। झपक गए दृग तुम्हें भली विधि देख न पाए। कहाँ पड़ी हूँ ? कौन हूँ ? तनिक न इसका भान था ॥ तुमने ठोड़ी पकड़कर कहा-"प्रिये क्यों रो रही? मैं हूँ तेरे सामने, बिकल भला क्यों हो रही?" वर्षा थी हो रही रात थी सूब अँधेरी; टपटप थी चू रही कोठरी सारी मेरी। चौंक उठी फिर वदन तुम्हारा तनिक निहारा; इस कथरीपर फटी खौरको मैं सिमटाए इतनेमें बह चली तीव्र लोचन-जल-धारा । जितना जितना यत्न रोकनेका करती थी; - सोती थी, यह एक हाथ उपधान बनाए । उतना उतना तावेगसे वह झरती थी; १ भावसंग्रह 'माणिकचंद-ग्रंथमाला में शीघ्र ही पिघल गया था हृदय या वर्षाका नव-ढंग था ! "छपनेवाला है। प्रेसमें दिया जा चुका है। घनों दृगोंकी होड़का अथवा विकट प्रसंग था ! २ माणिकचंद ग्रंथमालाका छठा ग्रंथ-श्रीरत्ननन्दि (८) आचार्यकृत टोकासहित छपा है। तुमने भरकर अंक कहा-अब रो न प्रिये तू; ३ मा० . मालाके १३ वें अंकमें यह छप चुका है। तुझे तनँगा नहीं विकल अब हो न प्रिये तू। For Personal & Private Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११) दुष्प्राप्य और अलभ्य जैनग्रंथ। __३११२ दुष्प्राप्य और अलभ्य जैनग्रंथ । सदा रस्गा साथ धैर्य अब खो न प्रिये तू; आगेको यों कष्ट बीज अब बो न प्रिये तू । तुमसे इसके बादमें, हाय न कुछ बोला गया; . दुखोद्रेकसे तनिक भी हृदय म फिर खोला गया । २१ सत्यशासन-परीक्षा । तबतक मैं चेतना-हीन हो गई प्रेमधन ! जैनसिद्धान्तभवन आराकी सूचीपरसे मालूम रही चेतना-रहित न जाने में कितने क्षण । पर सचेत हो उठी शीघ्र ही जब घबरा कर हुआ कि 'सत्यशासनपरीक्षा' नामका भी कोई और गिर पड़ी पुनः भीतसे मैं टकरा कर । जैनग्रंथ है । नामपरसे यह ग्रंथ अश्रुतपूर्व मालूम आँखें मेरी खुल गई, सपना सपना हो गया। होता था और ऐसा खयाल होता था कि शायद प्रलय हुआ पलमात्रमें, सरवस अपना खो गया ॥ विद्यानंदस्वामीका बनाया हुआ हो । अतः देखपूर्व दिशा थी लोहेत चिड़ियाँ चहक रही थी; नेकी उत्कंठा उत्पन्न हुई और भवनके मंत्री कलियाँ खुल खुल डुल डुल कर सब महक रहीं थीं। साहबको उसके भेजनेके लिये लिखा गया । तरुओं पर मृदु ललित लताएँ लहक रही थीं; परंतु भवनमें ग्रंथकी एक ही प्रति होने आदिके प्रातः पवनें खेल खेलमें बहक रही थी। __कारण मंत्रीसाहबने उसके न भेजनेके लिये यों वे मेरे घावपर, नमक सभी थी डालती, अथवा 'हा-ही स्वप्न पर, थीं दुष्टाएँ घालती ॥ मजबूरी जाहिर की और यह लिखा कि लेखकका प्रबंध करके उसकी कापी करा दी _ क्या करती कुछ जोर नहीं था, बस रो आया; जावेगी । भवनमें एक विद्वान् कर्कके आजाने मर जाऊँ अविलम्ब यही मनमें हो आया। कहा प्राणसे--प्राण ! कहाँ लों कष्ट सहोगे ? पर हालमें; उक्त ग्रंथका जो परिचय मँगाया तन-पंजरके संग कहाँलों और रहोगे? गया उससे मालूम हुआ कि यह विद्यानंद करती हूँ मैं प्रार्थना-तनका मोह विसार दो।। स्वामीका बनाया हुआ एक न्यायका ग्रंथ है। और दुःख-दावाग्निसे कृपया अब निस्तार दो ॥ इसका मंगलाचरण इस प्रकार है:. • पर सुन लो अब जन्म न तुम नारीका लेना; विद्यानन्दाधिपः स्वामिर्विद्व-देवो जिनेश्वरः। लेना तो मत भूल पैर भारतमें देना। यो लोकैकहितस्तस्मै नमस्तात्स्वात्मलब्धये ॥१॥ देना हो जो पड़े कभी तो जैन न होना;-- क्या जानें जो पड़े पुनः ऐसा ही रोना । ग्रंथके अन्तमें प्रशस्ति आदि कुछ नहीं है, कर दे तुमको जैन ही, वह अदृष्ट यदि अदय हो। बाल्क वह अपूर्ण और अधूरा मालूम होता है। जन्म उधर लेना जिधर, विजयित नय हो हृदय हो॥ उसका अन्तिम भाग इस प्रकार है:(१३) "न हि भिन्नदेशासु व्यक्तिषु सामान्यमेकं यथा स्थूणादिषु हे अदृष्ट तुम घोर नरकके दुख दिखलाओ; वंशादिरितिप्रतीयते यतो भिन्नदेशस्वाधारवृतित्वे सत्येकत्वं पर, नारीको, हाय ! कभी विधवा न बनाओ। तस्य सिद्धयत् स्वाधारान्तरालेऽस्तित्वं साधयेदिति और बनाओ ही तो इतनी दया दिखाओ:- . तदेवमनेकबाधकसद्भावात् भाप्राभाकरैरिटम ।" उसकी आँखें और हृदय यों गढ़ो गढ़ाओ ।जो कि देखते हुए भी, देखे वह कुछ भी नहीं। ग्रंथके शुरूमं परीक्षाके लिये जिन शासनोंका और जानते हुए भी, जाने वह कुछ भी नहीं ॥ नामोल्लेख किया गया है उनका द्योतक वाक्य इस प्रकार है: For Personal & Private Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ '३१२ जैनहितैषी - [ भाग १४ इस वाक्यमें जिनशासनों का उल्लेख है ग्रंथ में 6 उनका क्रमशः भाट्ट प्राभाकर' तक कथन " इह हि पुरुषाद्वैत-शब्दाद्वैत-विज्ञानाद्वैत-चित्राद्वैत- है, जिसे उक्त ग्रंथमाला में श्रीनागसेन आचाशासनानि चार्वाक-बौद्ध-सेश्वर-निरीश्वर-सांख्यनैय्या र्यका बनाया हुआ प्रकट किया है। वह श्रीनागयिक-वैशेषिक-भाट्ट-प्राभाकरशासनानि तत्त्वोपप्लुतशास सेन आचार्यका बनाया हुआ है या कि नहीं, नमेकान्तशासनं चेति अनेकशासनानि प्रवर्तन्ते । " इस विषयका विचार हमने एक अलग नोटद्वारा उपस्थित किया है । परंतु यहाँ हम सिर्फ इतना बतलाना चाहते हैं कि उक्त तत्त्वानुशासन से भिन्न एक और तत्त्वानुशासनका भी पता चलता है । दिगम्बर जैन ग्रन्थकर्ता और उनके ग्रंथ ' नामकी सूचीमें समन्तभद्र के ग्रंथों में ' तत्त्वानुशासन' का भी एक नाम है ? श्वेताम्बर कान्फरेंसद्वारा प्रकाशित 'जैनग्रन्थावली' में भी तत्त्वानुशासनको समन्तभद्रका बनाया हुआ लिखा है और साथ ही यह भी प्रकट किया है कि उसका उल्लेख सूरतके उन सेठ भगवानदास कल्याणदासजीकी प्राइवेट रिपोर्ट में है जो कि पिटर्सन साहबकी नौकरी में थे । और भी कुछ विद्वानोंने समंतभद्रका परिचय देते हुए उनके ग्रंथोंमें ' तत्त्वानुशासन' का भी नाम प्रगट किया है । परन्तु अनेक प्रसिद्ध भंडारों की सूचियाँ देखने पर भी अभीतक हमको यह मालूम नहीं हुआ कि स्वामी समन्तभद्र बनाया हुआ तत्त्वानुशासन ग्रंथ किस जगह मौजूद है और यह भी अभीतक पूरी तौर से निश्चय नहीं हुआ कि उक्त आचार्य महोदय वास्तवमें तत्त्वानुशासन नामका कोई ग्रंथ बनाया है या कि नहीं । परन्तु खोज करनेसे इतना पता जरूर चला है कि तत्त्वानुशासन नामका कोई दूसरा ग्रंथ भी बना है, जिसका एक पद्य नियमसारकी टीका में पद्मप्रभमलधारिदेवने 'तथाचोक्तं तत्त्वानुशासने इस वाक्यके साथ, उद्धृत किया है । वह पय इस प्रकार है : किया गया है, और ऐसा ऊपर उद्धृत किये अन्तिम भागसे भी प्रकट है। और इसलिये तत्त्वोप्लुतादि शासनों की परीक्षाका भाग उक्त प्रतिमें नहीं है । संभव है कि भाट्ट प्राभाकर शासनोंकी परीक्षाका भी कुछ भाग रह गया हो । अतः दूसरे शास्त्रभंडारों में इस ग्रंथरत्नकी पूरी प्रतिकी खोज होने की बहुत बड़ी जरूरत है, जिससे इस पूरे ग्रंथका उद्धार हो सके । यदि दूसरे भंडारोंमें भी इस ग्रंथका इतना ही भाग उपलब्ध हो तो यह समझना होगा कि विद्यानंद स्वामी इसे पूरा नहीं कर सके हैं और यह उनका अन्तिम ग्रंथ है । परन्तु भवनमें इस ग्रंथकी प्रति देवनागरी लिपिमें है और सूची में उसकी लिपिका संवत् १९६० दिया है । इससे मालूम होता है कि यह प्रति किसी दूसरी प्रति - परसे अभी कुछ ही वर्ष हुए कराई गई है । बहुत संभव है कि मीलान के लिये वह मूल्य प्रति भी अभी मिल सके । अतः इसके लिये जरूर प्रयत्न होना चाहिये । इस ग्रंथ में बहुत जगह 'उक्तं च भट्टाकलंकदेवैः ’ ' उक्तं च स्वाभिसमन्तभद्रा - चार्यैः' ऐसे वाक्य पाये जाते हैं । विद्यानंद स्वामीका ग्रन्थ होनेसे यह निःसन्देह एक महत्त्व का ग्रंथ है और इसका शीघ्र उद्धार होना चाहिये । २२ तत्त्वानुशासन (द्वितीय) । एक ' तत्त्वानुशासन' नामका ग्रंथ 'माणिकचंद - दिगम्बर जैनग्रन्थमाला' में प्रकाशित हो चुका For Personal & Private Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११ ] 'उत्स कार्यकर्माणि भावं च भवकारणं । स्वात्मावस्थानमव्यग्रं कायोत्सर्गः स उच्यते ॥ " दुष्प्राप्य और अलभ्य जैन ग्रंथ । यह पय मणिकचंदग्रन्थमालाद्वारा प्रकाशित उक्त तत्त्वानुशासनमें नहीं है । और इस लिये यह किसी दूसरे ही तत्त्वानुशासनका पद्य है, ऐसा कहने में कुछ भी संकोच नहीं होता । पद्यपरसे ग्रंथ कुछ कम महत्त्वका मालूम नहीं होता । संभव है कि जिस तत्त्वानुशासनका उक्त पय है वह स्वामी समंतभद्राचार्यका ही बनाया हुआ हो । यदि ऐसा हो और वह ग्रंथ उपलब्ध हो जाय तो उसे जैनियोंका महाभाग्य समझना चाहिये; क्योंकि स्वामी समंतभद्रके ग्रंथ प्रायः बड़े ही महत्त्वशाली और अद्वितीय होते हैं । हमारे खयालसे, समंतभद्रके दूसरे मूल ग्रंथों की तरह यह ग्रंथ भी आकार में छोटा होगा । और किसी गुटके आदिमें तलाश करनेसे मिलेगा । जिनवाणी के भक्तोंको चाहिये कि वे अपने अपने यहाँ के शास्त्रभंडारोंमें इस ग्रंथरत्नकी जरूर तलाश करें और कुछ परोपकारी भाइयोंको समन्तभद्रके तत्वानुशासन पर पारितोषिक भी निकालना चाहिये । एक तत्वानुशासन नागचंद्र मुनिका भी बनाया हुआ कहा जाता है और जैनग्रन्थावली में उसकी श्लोकसंख्या पाँच हजार दी है । मालूम नहीं यह कहाँके भंडारमें मौजूद है, इसकी भी तलाश होनी चाहिये । ( क्रमशः ) तत्त्वानुशासन के कर्ता । जो हुआ मुनि ४ माणिकचंद - दिगम्बर जैन ग्रंथमाला में तत्वानुशासन ' नामका ग्रंथ प्रकाशित है उसमें उसके कर्ताका नाम ' नागसेन दिया है | और ग्रंथके परिचय में वीरचंद्रदेव, शुभचंद्रदेव तथा महेंद्रदेवको नागसेन के विद्यागुरु और विजयदेवको दीक्षागुरु प्रकट किया है । ३१३ यह सब जिस आधारपर प्रकट किया गया वह ग्रंथकी प्रशस्तिके निम्नलिखित दो पद्य हैं:श्रीवीरचंद्रशुभदेवमहेंद्रदेवाः शास्त्राय यस्य गुरवो विजयामरश्च । दीक्षागुरुः पुनरजायत पुण्यमूर्तिः श्रीनागसेन मुनिरुद्यचरित्रकीर्तिः ॥ २५६ ॥ तेन प्रवृद्धधिषणेन गुरूपदेशमासाद्य सिद्धिसुखसंपदुपायभूतं । तत्त्वानुशासनमिदं जगतो हिताय श्रीनागसेनविदुषा व्यरचि स्फुटार्थे ॥ २५७ ॥ बम्बई के मंदिर की जिस एक मात्र प्रतिपरसे यह ग्रंथ छपाया गया है संभव है कि उसमें ये दोनों पय इसी प्रकारसे दिये हों । परंतु जयपुर से हमने एक प्राचीन शुद्ध प्रति मँगाकर उसपरसें इस ग्रंथका जो मीलान किया तो मालूम हुआ कि उसमें प्रशस्तिके दूसरे पयके अन्तिम चरण में ' नागसेन ' के स्थान में ' रामसेन पाठ दिया है। आरके जैन सिद्धान्तभवनका यही तत्त्वानुशासन, जिसे सूचीमें गलतीसे ‘श्रीरामेश्वर का बनाया हुआ लिखा है और जिस C कारण हमें बहुत कुछ लिखा पढ़ी करनेका कष्ट उठाना पड़ा, इस समय कलकत्ते में है । कुमार देवेंद्रप्रसादजीने उस परसे जो एक नकल उतरवाकर हमारे पास भेजी है उसमें भी, इस चरण में, नागसेनकी जगह रामसेन ही पाठ दिया है । इस पाठके अनुसार दोनों पद्योंका अर्थ यह होता है कि - ' श्रीवीरचंद्र, शुभदेव, महेंद्रदेव और विजयदेव ये चारों जिसके शास्त्रगुरु अर्थात् विद्यागुरु थे और फिर पुण्यमूर्ति तथा उद्यचरित्रकीर्ति ऐसे श्रीनागसेन नामके मुनि जिसके दीक्षागुरु हुए उस प्रबुद्धबुद्धि श्रीरामसेन नामके विद्वानने गुरूपदेशको पाकर, यह सिद्धसुखसंपदाका उपायभूत और स्फुट अर्थको लिए हुए तत्त्वानुशासन नाम For Personal & Private Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ का ग्रंथ जगतके हितके लिये रचा है।' जहाँ- वैसा लिख दिया हो तो इसमें कुछ भी आश्चर्य तक हम समझते हैं यह अर्थ दोनों पयोंकी नहीं है । और यह भी संभव है कि पहले पद्यमें शब्दरचना परसे बहुत कुछ सीधा, सुसंगत और जो नागसेन लिखा था उसीके खयाल तथा प्राकृतिक मालूम होता है । विपरीत इसके, संस्कारसे दूसरे पद्यमें भी नागसेन लिखा गया छपे हुए पाठको ज्योंका त्यों रखनेकी हो और इस तरह पर लेखकसे भूल हुई हो। हालतमें, ' नागसेनकी पुनरावृत्ति बहुत खटकती तत्त्वानुशासनकी इस छपी हुई प्रतिमें वैसे भी है । ' सः ' आदि शब्दोंको ऊपरसे लगाकर पचासों अशुद्धियाँ पाई जाती हैं। यदि बम्बईके पहले पद्यका अर्थ करना होता है और विजय, मंदिरकी वह प्रति बिलकुल इसीके मुताबिक है देवको खींच-खाँचकर नागसेन मुनिका दीक्षागुरु तो कहना होगा कि वह प्रति बहुत कुछ अशुद्ध बनाना पड़ता है। इस लिये हमारी रायमें जय- है और उसमें ऐसी भूलका हो जाना कोई बड़ी पुरादिकी प्रतियोंका उपर्युक्त पाठ बहुत कुछ ठीक बात नहीं है । विद्वानोंको चाहिये कि वे दूसरे मालूम होता है और उसके अनुसार यह ग्रंथ स्थानोंकी और भी प्रतियोंसे इस बातको अच्छी 'श्रीनागसेनमुनिका बनाया हुआ न होकर तरह जाँच लेवें और उसे सर्वसाधारण पर प्रकट उनके दीक्षित शिष्य श्रीरामसेन विद्वानका कर देवें, जिससे एक विद्वानकी कृति व्यर्थ ही बनाया हुआ जान पड़ता है । पं० आशाधरजी दसरे विद्वानकी कृति न समझ ली जाय । यदि भी अपने अनगारधर्मामृतके ९ वें अध्यायमें, वे भी इस ग्रंथको श्रीरामसेनका ही बनाया हुआ इस ग्रंथका एक पद्य ' रामसेन' के नामसे उद्- निश्चित करें तो उन्हें साथमें यह भी खोज धृत करते हैं । वह उद्धरण इस प्रकार है- करनी चाहिये कि ये रामसेन नामके विद्वान "तथा 'श्रीमद्रामसेन पूज्यैरप्यवाचि विक्रमकी १३ वीं शताब्दीसे कितने पहले हुए स्वाध्यायाध्यानमध्यास्तां ध्यानात्स्वाध्यायमामनत् । हैं, इनका विशेष परिचय क्या है, और इनका ध्यानस्वाध्याय संपत्त्यापामात्मा प्रकाशते ॥ ८१ ॥ उल्लेख और किस किस ग्रंथमें पाया जाता है। इससे यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है पं० आशाधरजीने इनके लिये बहुवचनान्त कि यह ग्रंथ नागसेनका नहीं, किंतु 'रामसेन' 'पूज्य' शब्दका प्रयोग किया है जिससे ये कोई का बनाया हुआ है। 'नाग' और 'राम' बड़े आचार्य मालूम होते हैं । तत्त्वानुशासन ये दोनों शब्द लिखनेमें बहुत कुछ मिलते जुल- नामकी कृति भी अच्छे महत्त्वको लिये हुए है। तेसे मालम होते हैं। हस्तलिखित ग्रंथोंके पत्र संभव है कि ये वही रामसेन आचार्य हों वर्षा आदिके कारण अक्सर चिपट जाया करते जिनको 'दर्शनसार' में माथुरसंघका उत्पादक हैं और उनको छुड़ाने में किसी किसी अक्षरका लिखा है और जिनका समय वि० सं० ९५३ कुछ भाग उड़कर उसकी आकृति भी बदल दिया है । विद्वानोंको इस विषयकी खोज जाया करती है। ऐसी हालतमें यदि किसी करनी चाहिये। लेखकने 'राम' के स्थानमें 'नाग' पढ़कर For Personal & Private Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] शास्त्रीय-चर्चा । ... ३१५ शास्त्रीय-चर्चा। - टीका--यद्भवत्यवीज निजि निर्वर्तिमं निर्गत मध्यसार प्रासुकं कृतं चैव ज्ञात्वाऽशनीय तद्भेक्ष्य N EKK मुनयः प्रतीच्छंति ॥ १-क्या मुनि कंदमूल खा सकते है। इन दोनों गाथाओंमेंसे पहली गाथामें मुनिके ऊपरका प्रश्न हमारे बहुतसे पाठकोंको एक- लिये ‘अभक्ष्य क्या है' और दूसरीमें 'भक्ष्य दम खटकेगा और वे उत्तरमें सहसा 'नहीं' क्या है, ' इसका कुछ विधान किया है । शब्द कहना चाहेंगे। परंतु शास्त्रीय चर्चा में इस पहली गाथामें लिखा है कि जो फल, कंद, ।' प्रकारके जबानी उत्तरोंका कुछ भी मूल्य नहीं मूल तथा बीज अग्निसे पके हुए नहीं हैं और है। इसमें केवल वही उत्तर ग्राह्य हो सकते हैं और भी जो कुछ कच्चे पदार्थ हैं उन सबको जो शास्त्रप्रमाणको लिये हुए हों। अतः उक्त अनशनीय (अभक्ष्य ) समझकर वे धीरमुनि प्रश्नका समाधान करने के लिये शास्त्रीय प्रमाणोंके भोजनके लिये ग्रहण नहीं करते हैं। दूसरी अनुसंधानकी जरूरत है। हम भी इस विषयमें गाथामें यह बतलाया है कि जो बीजरहित हैं, आन कुछ यत्न करते हैं। जिनका मध्यसार (जलभाग ? ) निकल गया है दिगम्बर सम्प्रदायमें 'मूलाचार' नामका एक अथवा जो प्रासक किये गये हैं ऐसे सब खानेके अतिशय प्राचीन और प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसे पदार्थोंको भक्ष्य समझकर मुनि लोग भिक्षामें श्रीवट्टकेर आचार्यने बनाया है। श्वेताम्बरोंमें ग्रहण करते हैं। 'आचारांगसूत्र' को जो पद प्राप्त है दिगम्बरोंमें मूलाचारको उससे कम पद प्राप्त नहीं है। दिग- मूलाचारके इस संपूर्ण कथनसे यह बिलकुल म्बर सम्प्रदायमें यह एक बड़ा ही पूज्य और स्पष्ट है और अनशनीय कंद-मूलोंका 'अनमिपक्क' माननीय ग्रंथ समझा जाता है। श्रीवसुनन्दी सैद्धा- विशेषण इस बातको साफ बतला रहा है कि न्तिकने इस पर 'आचारवृत्ति' नामकी एक जैन मुनि कच्चे कंद मूल नहीं खाते परंतु संस्कृत टीका भी लिखी है जो सर्वत्र प्रसिद्ध अनिमें पकाकर शाक-भाजी आदिके रूपमें है और बड़े गौरवके साथ देखी जाती है । इस प्रस्तत किये हए कंद-मल वे जरूर खा सकते ग्रंथकी निम्नलिखित दो गाथाओं और उनकी , का हैं। दूसरी गाथामें प्रासुक किये हुए पदार्थीको संस्कृतटीका परसे उक्त प्रश्नका अच्छा समा- . भी मोजनमें ग्रहणकर लेनेका उनके लिये विधान धान हो जाता है, इसीसे हम उन्हें नीचे उद्धृत करते हैं: किया गया है । यद्यपि अग्निपक्क भी प्रासुक होते फलकंदमूलवायं अणग्गिपकं तु आमयं किंचि। हैं, परंतु प्रासुककी सीमा उससे कहीं अधिक पच्चा असणीयं णवि य पडिच्छंति ते धीरा ॥९.५९॥ टीका-फलानि कंदमूलानि वीजानि चाग्निप- मिलाए और यंत्रादिकसे छिन्न भिन्न किये हुए क्वानि न भवंति यानि अन्यदपि आमकं यत्किचिदन. शनीयं ज्ञात्वा नैव प्रतीच्छंति नाभ्युपगच्छति ते धीरा निम्न लिखित शास्त्रप्रसिद्ध गाथासे प्रकट है।इति । यदशनीयं तदाहःजं हवदि अणबीयं णिवटिम फासुयं कयं चेव । सुकं पक्कं तत्तं अंबिल लवणेहि मिस्सियं दव्वं ।। "पाऊग एसणीयं तं भिक्खं मुणी पडिच्छंति ॥९-६०॥ जं जंतेण य छिण्णं तं सवं फासुय भाणियं. For Personal & Private Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३१६ जैनहितैषी [भाग १४ प्रासकके इस लक्षणानुसार जैन मुनि अग्नि- त्यागसे भी बढ़ा हुआ है ! मुनि तो अग्निद्वारा पक्कके अतिरिक्त दूसरी अवस्थाओं द्वारा प्रासुक पके हुए कंद मलोंको खासकते हैं परन्त वे हए कंद मलोंको भी खा सकते हैं, ऐसा आता गृहस्थ जो छठी प्रतिमा तो क्या पहली प्रतिमाके है। परंतु पहली गाथामें साफ तौरसे उन कंद भी धारक नहीं हैं उनके खानेसे इनकार करते मलोंको अभक्ष्य ठहराया है जो अग्निद्वारा पके हैं, इतना ही नहीं बल्कि उनका खाना शास्त्रहा नहीं हैं और इससे सूखने, तपने, आदि विहित नहीं समझते ! यह सब अज्ञान और दूसरी अवस्थाओं द्वारा प्रासुक हुए कंद मूल रूढिका माहात्म्य है!! मनियोंके लिये अभक्ष्य ठहरते हैं । अतः या तो २-क्या सभी कंदमूल अनंतपहली गाथामें कहे हुए 'अनग्निपक्क ' विशेषणको काय होते हैं ? उपलक्षण मानना चाहिये जिससे सूखे, तपे आदि सभी प्रकारके प्रासुक कंद-मूलोंका ग्रहण हो सके आमतौर पर जैनियोंमें यह माना जाता है और नहीं तो यह मानना पडेगा कि मानिलोग कि कंदमूल सब अनंतकाय होते हैं-उनमें फलों तथा बीजोंको भी अग्निपककेसिवाय दसरी एक एक शरीरके आश्रित अनंते जीव विद्यमान अवस्थाद्वारा प्रासुक होनेपर ग्रहण नहीं कर . हैं- इस लिये हमारे बहुतसे पाठकोंको यह सकते; क्योंकि गाथामें 'फलमूलकंदवीयं ' ऐसा प्रश्न भी कुछ नया सा मालूम होगा। परन्तु पाठ है, जिसका 'अनग्गिपक्क' विशेषण दिया गया नया हो या पुराना, प्रश्न अच्छा है और इसका है परंतु जहाँ तक हम समझते हैं उक्त अनग्निपक्क निर्णय भी शास्त्राधारसे ही होना चाहिए । हम विशेषणको उपलक्षणरूपसे मानना ज्यादह भी ऐसा ही यत्न करते हैं:- , अच्छा होगा और उससे सब कथनोंकी संगति गोम्मटसारके जीवकांडमें, प्रत्येक और अनंतभी ठीक बैठ जावेगी । अस्तु; उक्त विशेषण कायकी पहिचान बतलाते हुए, विशेष नियमके उपलक्षणरूपसे हो या न हो परंतु इसमें तो कोई तौर पर एक गाथा इस प्रकारसे दी है :संदेह नहीं रहता कि दिगम्बर मुनि अग्निद्वारा मूले कंदे छल्ली पवालसालदलकुसुमफलवीजे। पके हुए-शाक भाजी आदिके रूपमें प्रस्तुत समभंगे सदिणंता असमे सदि होति पत्तेया॥ १८७ ॥ किये हुए कंद मूल जरूर खा सकते हैं । हाँ, इसमें यह बतलाया है कि जिस किसी कंदकच्चे कंद-मूल वे नहीं खा सकते । छठी प्रतिमा- मूलादिकके तोड़ने पर समभंग हो जायँ उसे धारक गृहस्थोंके लिये भी उन्हींका निषेध किया अनंतकाय और जिसके समभंग न हों-बीचमें गया है जैसा कि श्रीसमंतभद्रके निम्नवाक्यसे . तंतु रहें, ऊँचा नीचा टूटे-उसे प्रत्येक समझना प्रकट है: चाहिये । इससे स्पष्ट है कि कंदमूल भी दो प्रकामूलफलशाकशाखाकरीरकंदप्रसूनबीजानि । रके होते हैं, एक प्रत्येक और दूसरे अनंतकाय । नामानि योऽत्ति सोऽयं सचित्तविरतो दयामूर्तिः ॥ उक्त गाथाके अनन्तर एक दूसरे विशेष नियम परन्तु आजकलके श्रावकोंका त्यागभाव की प्रतिपादक गाथा इस प्रकार है:बड़ा ही विलक्षण मालूम होता है, वह मुनियोंके कंदस्सव मूलस्सव सालाखंदस्स वाविबहुलतरी । छल्ली साणंतजिया पत्तेयजिया तु तणुकदी॥१८८॥ १ यथा. शुष्कपक्रध्वस्ताम्ललवणसंमिश्रदग्धादिद्रव्यं प्रासुकं । इति. १ आदिक शब्दसे छाल, कोपल, शाखा, पत्र, पुष्प, -गोम्मटसारटीकायां। फल र २ २ । For Personal & Private Use Only Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११ j इस गाथामें कंदमूलादिककी छाल (त्वचा) के सम्बंध में एक विशेष नियम दिया है और यह बतलाया है कि जो छाल ज्यादह मोटी होती है उसे अनंतकाय और जो ज्यादह पतली होती है उस छालको प्रत्येक जानना चाहिए । इससे यह पाया जाता है कि कंदमूलादिक अपने सर्वांगरूपसे अनंतकाय अथवा प्रत्येक नहीं होते, उनमें उनकी छालसे विशेष रहता है - अर्थात्, कोई कंदमूलादिक ऐसे होते हैं जिनकी छाल अनंतकाय होती है. परंतु वे स्वयंभीतर से अनंतकाय नहीं होते और कोई कोई ऐसे भी होते हैं जो खुद भीतरसे तो अनंतकाय होते हैं परंतु उनकी छाल अनंतकाय नहीं होती, वह प्रत्येक ही रहती है । शास्त्रीय चर्चा | इसके बाद गोम्मटसार में एक अपवाद नियम और भी दिया है और वह यह है कि ये कंदमूलादिक ( 'आदि' शब्दसे प्रथम गाथोक्त छाल, कोंपल, शाखा, पत्र, पुष्प, फल और बीज • सभी ग्रहण करने चाहियें ) अपनी प्रथमावस्था में प्रत्येक होते हैं । यथाः— जेविय मूलादीया ते पत्तेया पढमदाए ॥ यह नियम इस बातको सूचित करता है कि कंदमूलादिक-चाहे वे समभंग हों या न हों, उनकी छाल मोटी हो अथवा पतली-अपनी प्रथमावस्थामें सब प्रत्येक होते हैं । उत्तरकी अवस्थाओंमें वे प्रत्येक भी होते हैं और अनंतकाय भी और उनकी खास पहिचान ऊपर बतलाई गई है । नतीजा इस सारे कथनका यह निकलता है कि सभी कंदमूल अनंतकाय नहीं होते, न सर्वागरूपसे ही अनंतकाय होते और न अपनी सारी अवस्थाओं में अनंतकाय रहते हैं । बल्कि वे प्रत्येक और अनंतकाय ( साधारण ) दोनों प्रकारके होते हैं; किसीकी छाल ही अनंतकाय होती है, भीतरका भाग नहीं और किसीका भीतरी भाग अनंतकाय होता है तो छाल अनंतकाय नहीं होती; कोई बाहर भीतर सर्वांगरूप से अनंतकाय होता है और कोई इससे बिलकुल विपरीत कतई अनंतकाय नहीं ३१७ होता; इसी तरह एक अवस्थामें जो प्रत्येक है वह दूसरी अवस्थामें अनंतकाय हो जाता है और जो अनंतकाय होता है वह प्रत्येक बन जाता है । प्रायः यही दशा दूसरी प्रकारकी वनस्पतियोंकी भी है। वे भी प्रत्येक और अनंतकाय दोनों प्रकारकी होती हैं--आगममें उनके लिये भी इन दोनों भेदोंका विधान किया गया है-जैसा कि ऊपर के वाक्योंसे ध्वनित है और मूलाचारकी निम्नगाथाओंसे भी प्रकट है, जिनमें पहली गाथा गोम्मटसारमें भी नं० १८५ पर दी है: मूलग्गपोरवाजा कंदा तह खंधबीजबीजरुहा । समुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणांतकाया य ॥२१३॥ कंदा मूला छल्ली खंधं पत्तं पवालपुप्फफलं । गुच्छा गुम्मा वल्ली तणाणि तह पव्वकायाय २१४ ऐसी हालत में कंद-मूलों और दूसरी वनस्पतियोंमें अनंतकायकी दृष्टिसे आमतौर पर कोई विशेष भेद नहीं रहता । अतः जो लोगअनंतकायकी दृष्टिसे कच्चे कंदमूलोंका त्याग करते हैं। उन्हें इस विषय में बहुत कुछ सावधान होने की जरूरत है। उनका संपूर्णत्याग विवेकको लिये हुए होना चाहिये । अविवेकपूर्वक जो त्याग किया जाता है वह कायकष्टके सिवाय प्रायः किसी विशेष फलका दाता नहीं होता । उन्हें कंदमूलों के नाम पर ही भूलकर सबको एकदम बातकी जाँच करनी चाहिये कि कौन कौन अनंतकाय न समझ लेना चाहिये; बल्कि इस कंदमूल अनंतकाय हैं और कौन कौन अनंतका नहीं हैं. किस कंदमूलका कौनसा अवयव अनंतकाय है और कौनसा अनंतकाय नहीं हैं, साथ ही यह भी कि किस किस अवस्थामें वे अनंतकाय होते हैं और किस किसमें अनंतकाय नहीं रहते । अनेक वनस्पतियाँ भिन्न भिन्न देशोंकी अपेक्षा जुदा जुदा रंग, रूप, आकार, प्रकार और गुण-स्वभावको लिये हुए होती हैं । बहुतों में वैज्ञानिक रीतिसे अनेक प्रकारके परिवर्तन कर दिये जाते हैं । नाम-साम्यकी वजहसे उन सबको एक ही लाठीसे नहीं हाँका जा सकता । संभव है कि एक देशमें जो वनस्पति For Personal & Private Use Only Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२८ 'जैनहितैषी [भाग १४ अनंतकाय हो दूसरे देशमें वह अनंतकाय न हमारी शिक्षा-संस्थाएँ। हो, अथवा उसका एक भेद अनंतकाय हो और दूसरा अनंतकाय न हो। इन सब बातोंकी विद्वानोंको अच्छी तरह जाँच करनी चाहिये और जाँचके द्वारा जैनागमका स्पष्ट व्यवहार (लेखक, श्रीयुक्त बाबूलालजी मास्टर।) लोगोंको बतलाना चाहिये। इस बातके बतलानेकी जरूरत नहीं कि जैन... ___ ऊपरकी कसौटीसे दो एक कंदमूलोंकी जो समाजने शिक्षाको अपनी उन्नतिका साधन समझ सरसरी जाँच की गई है उसे भी हम आज अपने उसके प्रचारकी ओर ध्यान दिया है, जिसके पाठकोंके सामने रखते हैं और आशा करते फलस्वरूप अकेले दिगम्बर सम्प्रदायकी ही हैं कि विद्वान् लोग उन पर विचार करके २०-२५ वर्षमें अनेक शिक्षासंस्थाएँ नजर आने : अपनी सम्मति प्रकट करेंगेः१-हमारे इधर अदरक बहुत तंतुविशिष्ट लगी हैं । इन संस्थाओंसे प्रतिवर्ष अनेक शास्त्री, होता है। तोड़ने पर वह समभंग रूपसे नहीं टूटता, तीर्थ, विशारद तैयार हो रहे हैं, संस्कृत न्याय ऊँचा नीचा रहता है और बीचमें तंतु खड़े रहते व्याकरण साहित्य और धर्मशास्त्रोंके विद्वानोंकी हैं । छाल भी उसकी मोटी नहीं होती। ऐसी संख्या सैकड़ोंपर पहुंच चुकी है और अब वह हालतम वह अनंतकाय नहीं ठहरता । बम्बईकी समय दूर नहीं है कि जब, हमारे कतिपय तरफका अदरक हमने नहीं देखा, परंत उसकी विद्वान् नेताओंकी इच्छापूर्तिस्वरूप, जैनसं-- जो सोंठ इधर आती है वह 'मैदा सोंठ' कहलाती स्थाओंमें संस्कृत व्याकरणादि पढ़ानेके लिये . है और उसके मध्यमें प्रायः वैसे तंतु नहीं होते, अजैन विद्वानोंको न ढूँढ़ना पड़ेगा । परंतु यह इस लिये संभव है कि वह अनंतकाय हो। सब होते हुए भी समाजको शिक्षाविषयक वास्त___२-गाजर भी अक्सर तोड़ने पर समभंग रूपसे विक संतोष नहीं हुआ, और यदि इन संस्थानहीं टूटती और न उसकी छाल मोटी होती है। इस लिये वह भी अनंतकाय मालम नहीं होती। ऑकी कार्यप्रणाली ऐसी ही बनी रही तो भविष्य____३-मूलीकी छाल मोटी होती है और इस में भी उक्त संतोषकी आशा करना व्यर्थ है। लिये उसे अनंतकाय कहना चाहिये । परंतु थोडा भी समय विचार करनेमें लगानेसे छालको उतार डालने पर मूलीका जो भीतरका विदित हो जायगा कि समाजने शिक्षाकी साधनभाग प्रकट होता है उसकी शिराएँ, रग रेशे रश स्वरूप संस्थाओंको स्थापित कर उनमें लक्षावधि अच्छी तरहसे दिखाई देने लगते हैं, तोड़ने पर । रुपया खर्च करके जो शिक्षाप्रचारका कार्य वह समभंग रूपसे भी नहीं टूटता। ऐसी हालतमें। संभव है कि मूलीका भीतरी भाग अनंतकाय न हो । । । किया है वह औरोंकी अपेक्षा बहुत ही कम है, . ४-आलूका ऊपरका छिलका बहुत पतला इतना ही नहीं, किंतु इन संस्थाओंद्वारा जो पंडित होता है। अतः वह अनंतकाय न होना चाहिये। तय्यार हुए हैं वे प्रायः वर्तमान समयसे हजार विद्वानोंको चाहिये कि वे भी इसी तरह आठौ वर्ष पहलेके युगमें विचरण करनेवाले कंद-मूलादिककी जाच करें और फिर उसके व्यक्ति हैं । इन विचारोंको, अन्य देशोंकी कौन नतीजेसे हमें सचित करनेकी कृपा करें। हम कहे, स्वदेशके ही हुए और होनेवाले परिवर्तनोंका भी इनकी विशेष जाँच करेंगे और साथ ही ज्ञान नहीं, उनके हृदयकमलमें इतिहास, गणित, दूसरे कंदमूलोंकी भी जाँचका यत्न करेंगे। विज्ञान, समाजनीति, अर्थनीति, स्वास्थ्य आदि आवश्यकीय विषयोंकी वायु भी नहीं लगी। For Personal & Private Use Only Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] हमारी शिक्षा-संस्थाएँ। यदि वे कोई काम करना भी सीखे हैं तो वह संतानको पारसी महाराष्ट्र आदि अपने देशभाप्रायः अध्यापकी और उपदेशकी करना है। इयोंके समान तो अवश्य शिक्षित बना सके। ___ और देशोंकी बातको न लेकर जब हम अपने जैनसमाजने विद्याप्रेमियोंके कहनेसे लाखों देशवासियोंकी ओर देखते हैं तब हमें चकित रुपये शिक्षा प्रचारमें खर्च कर दिये और कर होना पड़ता है । अल्पवयस्क आर्यसमाजने रहा है, इसके एक नहीं अनेक विद्यालय खुल थोड़े ही दिनोंमें अपने तथा औरोंके हजारों चुके हैं जिनमें सैकड़ों समर्थ और असमर्थ छात्र बालकोंको प्राचीन तथा अर्वाचीन जगत्की शिक्षा पा रहे हैं । अनेक छात्रालय भी जारी हो बातोंका ज्ञाता बना दिया है। उनके कालेजों, चुके हैं । इतना होनेपर चाहिये तो यह था कि विद्यालयों तथा गुरुकुलोंमें बालक बालिका- समाज अपने कृत्यपर प्रसन्न होता और इस पर ओंको धार्मिक और जीवन में काम आनेवाले मोपयोगी कार्यमें अधिक भाग लेता । परंतु अनेक विषयोंकी अच्छी शिक्षा दी जाती है। ऐसा नहीं हुआ। वह दिनोंदिन उदास होता इन संस्थाओंसे निकले हुए छात्र प्रायः स्वाभि- जाता है । जहाँ पाठशालाओंकी चर्चा छिड़ी मानी, निर्भीक, देशसेवक और स्वावलम्बी होते कि लोगोंके चेहरेपर उदासी झलकी । चंदेकी हैं। यह सब श्रेय उक्त समाजकी शिक्षापद्धति बात उठी कि खिसकनेका नंबर जारी हुआ। और संस्थाओंकी शासनप्रणालीको प्राप्त है। बड़ी कठिनाईसे रुपयेके देनेवाले आने दो दो उसके यहाँ सामाजिक संस्थाओंमें काम करने- आने चिट्रेपर चढ़ाते हैं । पाठशालाओंसे लोग वालोंकी कमी नहीं है । विपरीत इसके जैन- इतना क्यों चिढ़ते हैं ? सहायता देनेमें क्यों संस्थाओंमें इस बातका अकाल रहता है । हमें आगा पीछा करते हैं ? यदि ऐसा कहा जावे बराबर अपनी जैनसंस्थाओंके कार्यकर्ताओंसे कि वे अपने बालकोंको पढ़ाना नहीं चाहते, " पाठशालामें लड़के ही नहीं आते, पंच ध्यान अथवा उनके मनमें कृपणता बहुत बढ़ गई है, ही नहीं देते, सहायकों पर चंदा बकाया पडा है, तो यह ठीक नहीं जचता । कारण कि,ऐसे बहुवेतन थोड़ा है" इत्यादि बातोंका दुखड़ा सुनना तसे जैनी अपने लड़के लड़कियोंको, शिक्षा पड़ता है । और हजारों लाखोंका ध्रुवफंड रहते दिलानेके लिये, सरकारी पाठशालाओंमें भेजते भी संस्थासे संतोषप्रद फल नहीं निकलता। हैं और उनकी रुचि विद्याभ्यासमें बढ़ाने के लिये यद्यपि हम इन संस्थाओंमें बरबाद होनेवाले उन्हें प्रतिदिन मिठाई, फल, पैसा आदि देते रुपया पर समय समय पछतावा करते रहते हैं, रहते हैं। प्रतिवर्ष रथ चलाने, मंदिर बनवाने. तथापि पंचमकालके माथे सम्पूर्ण दोष मढ़ शिक्षा जीर्णोद्धार करने, औषधालय स्थापित करने और प्रबंधकी पद्धतिसे अपरिचित होनेके कारण और जीवदयाका प्रचार करने आदि धर्मकायही सोचकर खर्चकी धारा बहाये चले जाते ?में भी जैनी बहुत कुछ धन खर्च करते हैं, हैं कि शालाके रहनेसे भ्रमण करते हुए आने- इससे उनमें विद्याप्रेमका अभाव अथवा दानशी• वाले पंडित या धनी जन हमें कृपण तो न लताकी कमी कहना भारी भूल करना है। कहेंगे । हमारी पंचमकाल महाराजसे विनय है जैनियोंकी उदासीनताका कारण क्या है, कि आप इस शिक्षाविहीन जैन जातिपरसे इसकी खोज करनेकी ओर अभी समाजने अपनी शनि दृष्टि उठानेकी शीघ्र कृपा कीजिये, ध्यान नहीं दिया । समाजमें विद्वानोंके दो प्रधान ताकि यह जाति अधिक नहीं तो, अपनी ही दल हैं एक पंडितदल दूसरा बाबूदल । ये For Personal & Private Use Only Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२० . जैनहितैर्षा [भाग १४ दोनों दल अपनी ही धुनमें मस्त हैं । जब बिना व्यापार किये अथवा हिसाब-किताब लिखे सुनो तब इनसे यही सुननेको मिलता है कि काम नहीं चलता, अतएव हमारे लिये व्यापाअभी विद्यालय थोड़े हैं, लोग अपने लड़कोंको रिक शिक्षा परम आवश्यक है और यही कारण पड़नेके लिये नहीं भेजते । बाबुओंको बिना है कि अपनी शिक्षासंस्थाओंमें इसका अभाव दस बीस जैन हाईस्कूल और चार छै जैन- देखकर हम लोग उनसे उदासीन होते जाते हैं। कालेज खुले समाजकी उदासीनता घटनेकी हम लोग अपने लड़कोंको पढ़ानेमें लाभ तो आशा नहीं दिखती । उनको रात दिन यही समझते हैं परंतु उच्च शिक्षा दिलानेमें प्रमादी धुन रहती है कि समाजमें ग्रेज्युएटोंकी संख्या हैं। अपनी निजी शालाओंमें व्यावहारिक विषखूब बढ़ाई जावे और यह तभी हो सकेगा जब योंकी शिक्षाकी कमी देख वहाँ बालकोंको भेजजैन हाईस्कूल और कालेज काफी संख्यामें नेमें विशेष लाभ नहीं समझते । जब कोई हमसे खुलेंगे । शिक्षाप्रचारक विद्यालय, कालेज कहता है कि लड़का मिडिल पास हो गया आदिकी वृद्धि और स्थापनासे लाभ तो अवश्य है इसे अब हाईस्कूलमें क्यों नहीं भेजते, तो हमहोगा परंतु इन दोनों दलवालोंने अभीतक इसका से यही कहते बनता है कि क्या हमें उससे नहीं किया है कि उस लाभसे समाजकी नौकरी कराना है ? कामलायक उसने पढ़ ही क्षाविषयक उदासीनतामें कितनी कमी लिया है, अब दुकानमें बैठाल कर व्यापार होगी। हमारी उदासीनता वास्तवमें उस समय सिखायँगे । यद्यपि हम उच्च शिक्षासे अनभिज्ञ स समय हमारी संतानको उपयुक्त हैं तथापि हमाग उपर्युक्त कथन सारहीन नहीं व्यावहारिक शिक्षा देनेवाली संस्थाओंकी स्थापना है। हम प्रतिवर्ष देखते हैं कि हमारे यहाँ हाईहोकर उनका परिचालन भलीभाँति होने लगेगा। स्कूलों और कालेजोंकी परीक्षाओंमें बैठे हुए हम बणिक् हैं, हमारी जीविकाका द्वार छात्र निर्वाहके लिये नौकरी ढूँढ़ने में घोर परिबाणिज्य है, जिन्दगीमें पद पद पर काम पड़ने- श्रम करते हैं, नौकरी चाहे वह कितने ही परिवाले (जीवोंके ग्यारहवें प्राण) धनकी प्राप्तिका श्रमकी क्यों न हो परंतु हो ऐसी जिसमें कुरहमारा प्रतिष्ठित और सुखसाध्य मार्ग व्यापार ही सीपर बैठना और टेबिल पर कागज रखकर है। व्यापारियोंका ही हमारे यहाँ अधिक मान है। लिखनेको मिले। ये विचारे वैसे भी इतने कमअपरिचित व्यक्तिके पारचयके लिये हम उसके जोर और साहसहीन हो जाते हैं कि यदि शास्त्रज्ञानकी विशेष पूँछताछ न करके प्रायः कहीं परीक्षामें फेल हो गये तो महीनों रोते रहते उसके व्यवसायको ही पूँछा करते हैं। अपरिमित हैं और कई एक तो विद्याभ्यासको ही तिलांजलि साहित्यका ज्ञाता और अतुलनीय बलशाली दे बैठते हैं। शिक्षाविभागने पठनक्रममें साहित्य जैनी यदि व्यापारमें पटु नहीं है तो हम उसका गणित भूगोल आदिकी भरमार तो कर दी है परंतु प्रायः उतना मान नहीं करते जितना कि इन पढ़नेके पश्चात्, हमें ही नहीं किंतु अन्य व्यवसायदोनों गुणोंसे शून्य व्यापारकुशल व्यक्तिका वालोंको भी उनसे कितनी कम सहायता मिलती करते हैं। पैतृक सम्पत्ति पानेवाले धनिक जैन है उसे सभी जानते हैं । अपने घरमें लाखोंका भले ही व्यापार न करें, अपने कारोबारका व्यापार होते हुए भी, एक सिंघईजीको बी. ए. सम्हालना और हिसाब किताबका लिखना वे तक पढ़नेके बाद साधारण वेतन पर स्कूल भले ही न जाने; परंतु साधारण स्थितिवालोंका मास्टरका कार्य करते देख हमने अपनी उपर्युक्त For Personal & Private Use Only Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२१ अङ्क १०-११) हमारी शिक्षा-संस्थाएँ। कल्पनाको यदि ठीक समझ लिया तो इसमें धार्मिक कृत्योंको मिहनताना लेकर करनेवाले हमारा दोष ही क्या है ? यथार्थमें हम उच्चशिक्षाके सजातीय भाईयोंको घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं। विरोधी नहीं हैं, विरोधी हैं तो केवल आजकलकी हमारे यहाँ तो प्रायः मुनि और गृहत्यागी शिक्षाप्रणालीके । क्यों कि उसके द्वारा शिक्षा प्राप्त श्रावक ही गृहस्थोंसे भोजन, शास्त्र तथा पिच्छी आदि ग्रहण करनेके अधिकारी हैं। यही कारण करनेमें हमें जितना अर्थव्यय करना और कष्ट _ है कि ब्राह्मणोंकी पद्धतिका अनुकरण करनेवाले उठाना पड़ता है उतना लाभ नहीं होता । इसीसे हमारे पंडितजन इन संस्थाओंसे समाजको संतोहम उच्च शिक्षा प्राप्त करानेमें प्रमादी बन रहे हैं षित करनेमें विफल हुए हैं। परंतु अब इन लोऔर यही कारण है कि हम, अपनी उदासीनताके गोंको अपने कामकी समालोचना करने में इस वास्तविक कारणको ठीक तौर पर न जतला प्रमादी न होना चाहिये, अब भी कुछ नहीं सकनेकी वजहसे, शिक्षाकी चर्चा छिड़ते ही बिगडा है। 'मौनी बाबा' बन जाते हैं। कला बहत्तर पुरुषकी, तामें दो सरदार । जिस समय शिक्षाका अभाव कह कर ___एक जीवकी जीविका, दूजी जीव उद्धार ।। समाजमें शिक्षाप्रचारके लिये आन्दोलन जारी जबतक नीतिके इस दोहेपर ध्यान देकर काम न किया गया था उस समय लोगोंको यही सूझी किया जायगा तबतक जातिमें शिक्षाका प्रचार होना थी कि जहाँ तहाँ संस्थाएँ खुलनेसे शिक्षाका प्रचार हो जायगा । उनकी इस भोली समझने असम्भव है । उसे आजकलके विद्यालयोंमें धार्मिक ही उन्हें आज इस परमोपकारी कार्यसे उदासीन शिक्षाके साथ व्यावहारिक शिक्षाका प्रबंध करना बना दिया है । वे बेचारे तो संस्थाओंकी पठन- होगा और अपनी ज्ञानप्रसार चाहनेवाली इच्छाको प्रणाली रचने और उनके प्रबंध करनेका भार पूर्ण करने के लिये ऐसे मिडिलस्कूल (पाठशाला), पंडितोंपर रखकर इस आशासे निश्चिन्त हो हाईस्कूल ( विद्यालय), कालेज (महाविद्यागये कि ये लोग हमारी आवश्यकताओंको लय ) खोलने पड़ेंगे जिनमें जीविकाके साधनों अवश्य दूर करेंगे, परंतु उनकी वह आशा की शिक्षा प्रधानतः देशभाषामें दी जाय । प्राचीन सफलीभूत नहीं हुई । पंडितोंने जिस पाठ्यप्र जैनसाहित्यके जाननेके लिये प्राकृत, संस्कृतादि णालीका आश्रय लिया वह उस समाजकी थी जिसके यहाँ पठन, पाठन, यज्ञ, हवन आदि भाषाएँ और शासकों तथा विदेशीव्यापारियोंसे धार्मिक कृत्य करने तथा वादविवादमें पांडित्य व्यवहार करनक ालय अग व्यवहार करनेके लिये अँगरेजीभाषा सीखने की प्रकट करने योग्य ज्ञान प्राप्त कर लेनेसे ही जीवकी भी आवश्यकता है परंतु वह उतने ही अंशमें, जीविका चलती और अंतमें जीवका उद्धार जितनेसे दूसरेके भाव समझ सकें और अपने होना माना जाता है । साथ ही, इन कृत्योंके कर- दूसरों पर प्रकट कर सकें। नेपर ही उस समाजके व्यक्तियोंकी प्रतिष्ठा होती वर्तमानमें जैनियोंकी जितनी शिक्षा संस्थाएँ - है। परंतु हमारी समाजमें यह बात नहीं है। हम हैं वे सब स्वतंत्र हैं और अपनी अपनी ढफली लोग भगवानकी पूजा स्वयं करते हैं, भगवानके अपना अपना राग आलापने में मस्त है। उनके प्रबंनिकट अपनी प्रार्थना किसी दूसरे व्यक्तिके धक और कार्यकर्ता अपनी अपनी संस्थाकी द्वारा पहुँचाना अच्छा नहीं समझते, बल्कि पढ़ाई और व्यवस्थाकी सदैव प्रशंसा ही किया For Personal & Private Use Only Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ करते हैं। यदि कभी किसीके कहनेसे उन्हें माननवालाक मुँहसे यही उपदेश सुननेको संस्थामें किसी प्रकारकी त्रुटि स्वीकार मिलते हैं कि “भाई मिथ्यात्विंयोकी बातोंमें करनी पड़ती है तो उसका कारण वे धनामाव क्या धरा है, अपनेसे जो बने सो करो, इस पंचम बतलाकर दोषमुक्त हो जाते हैं। इन संस्था- कालमें उन्नतिकी आशा करना व्यर्थ है।" आदि ओंमें पारस्परिक सम्बन्ध न होनेसे एक बड़ी हानि अपने गरुओंके ऐसे वचनामृतोंसे हमारी हार्दिक यह हो रही है कि इनमें काम करनेके लिये योग्य संकीर्णता सदैव बलवती बनी रहती है । अभी बहुत व्यक्ति व पढ़ने के लिये योग्य छात्र नहीं मिलते। जिन । दिन नहीं हुए कि एक पाठशालामें व्यापारिक कहीं कहीं तो साल भरमें तीन तीन चार AST चार शिक्षा दिलाने के पक्षपाती अजैन पंचकी सम्मति चार पाठकोंका परिवर्तन हो जाता है । पाठ्य मानकर कार्य करनेकी तैयारी देख हमारे एक ग्रन्थोंका यह हाल है कि शालाके प्रारम्भसे जारी बाबाजीको यह चिंता हो गई थी कि कहीं हुए ग्रंथ हानिलाभ पर ध्यान दिये बिना अबतक ऐसा न हो कि ऐसी सलाह देनेवाले महाशयके पढ़ाये जा रहे हैं और कहीं कहीं सालमें एक ही फेरमें पड़कर गरीबिनी पाठशालाके माथे जैनविषयके तीन तीन ग्रंथोंका परिवर्तन हो जाता है। पाठशालाके बदले महाजनी पाठशालाके कुनाप्रबंधका विचित्र ही हाल है । शुद्धाम्नायियोंकी मका धब्बा लग जावे । इसी आशंकासे विशुद्ध संस्थाओंकी.प्रबंधकारिणी सभाओं में अजै- शंकित हो आपने खूब उछल कूद मचाई, जिससे नौका चुनाव ही नहीं होता; यदि भलसे किसी फल वही हुआ जो हाना चाहिये था, अर्थात् अभागिनी संस्था में हो भी जावे तो लोग उसकी अजैन पंचोंने उस पाठशालाके काममें योग सम्मतिमात्र सुनते हैं, उसके अनकल कार्य करने- देना बंद कर दिया और पाठशाला उनकी में उन्हें सदैव संस्थाके मिथ्यत्विनी बननेका संगतिसे बढ़नेवाले परिग्रहके पापसे बच गई ! डर लगा रहता है। अजैन पंचने पाठ्य ग्रंथ, हमारी रायमें समाजको अब अपने इन कुप्रबंध, पाठककी नियुक्ति, पृथक्त्व आदिके विष- संस्कारोंको दूर कर देना चाहिये। यमें कितनी ही अच्छी सलाह क्यों न दी हो, उसे अपने धनिक भाईयोंकी सम्पत्तिक वह अपनी सम्मतिके अनुकूल नि.स्वार्थ भावसे रक्षणार्थ और निर्धनोंकी सुखसाध्य जीविका काम करनेको कितना ही तैयार क्यों न हो जावे, बनानेके लिये व्यापारिक विद्यालय खोलने में परंतु अजैनोंको मिथ्यात्वकी ही मूर्ति समझने- बिलम्ब न करना चाहिये । देशमें निर्धनताकी वाले हमारे जैनीभाई अपने इस पंचकी बात बाढ़ जोरों पर है, महँगाई मुँह फाड़े गरीबोंकी पर चलनेका साहस नहीं कर सकते। “समय ओर बढ़ रही है, जैनसमाजमें गरीबोंकी संख्या क्या बतला रहा है, हमारे पड़ोसी अपनी अपनी भी कम नहीं है, इससे अब शिक्षाकार्यको उन्नतिके लिये क्या क्या कर रहे हैं, उन्नतिपथमें बड़ी सावधानताके साथ चलानेका समय है। दूसरी जातियों तथा धर्मोंवाले हमसे कितने दुःखकी बात है कि अपने धनिक भाईयोंके आगे बढ़ रहे हैं" इन बातोंको अब्बल तो, सबे- यहाँ मुनीम मुख्तारगारीके सैकड़ों स्थान रेसे आधी राततक व्यापार धंधों में फंस रहनेके खाली होने पर भी इन पदों पर काम काम करनेकी कारण, हमें जाननेकी फुरसत ही नहीं मिलती, योग्यता न रखनेसे तथा नाना प्रकारके व्यापारोंदूसरे हमें सदैव अपनेको साधुओंके स्थानापन्न को देखते हुए भी उद्योगधंधोंके ज्ञानसे शून्य For Personal & Private Use Only Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] हमारी शिक्षा संस्थाएँ। ३२३ होनेके कारण हजारों जैनी बंजी और मजदूरी और प्रान्तोंकी अपेक्षा बुंदेलखंड और मध्य-- सरीखे घोर परिश्रमसाध्य पेशोंको कर रहे हैं; परंतु प्रांत शिक्षामें बहुत पीछे हैं । यहाँ अक्षर और तो भी इनका “ नौ खाये तेरहकी भूख" से अंक ज्ञानवाले जैनी भाई सैकड़े पीछे २०-२५ नाता नहीं टूटता । ये समाजके तीन चौथाई MS भले ही मिल जावें, परंतु जिन्हें सभ्य समाज शिक्षित कह सके ऐसे व्यक्ति सैकड़ेमें एक दो ही. भागको दबाये बैठे हैं। इनकी उन्नतिसे ही समाज मिलेंगे। इन्हीं दोनों प्रांतोंमें परवार, गोलापूरव, की उन्नति है। धनिक भागसे इनका घनिष्ठ गोलालारे भाइयोंका बहुतायतसे निवास है। सम्बंध है, इस कारण डर है कि कहीं द्रव्योपा इससे परवार महासभा अथवा मध्यप्रांत बुंदेलजनके साधनों और शक्तिके अभावमें ये गरीब खंड प्रांतिक सभाको अधिक नहीं तो, एक ऐसे शाखामग बने रहकर अपने धनी सम्बन्धियोंके विद्यालयकी स्थापना अवश्य करनी चाहिये जिससे सम्पत्ति-बागको चट न कर जावें । कहावत है पाठशालाओं और विद्यालयोंमें काम करनेके . कि “ सूखा ईंधन गीलेको लेकर जल जाता लिये अध्यापक तैयार होवें, तथा व्यापारी और है।" धनिक कहाँ तक हाथ सिकोड़ेंगे ? देने व्यापारियोंके यहाँ काम करनेवाले मुनीम मु. की इच्छा तथा सामर्थ्य न होते भी दया और ख्तार भी तैयार होवें । यद्यपि ऐसे विद्यालयको लोकलाजके दबावसे दबने पर कुछ न कुछ स्थापित करना और उससे इच्छित फल पानेके देना ही पड़ेगा। इससे श्रीमानोंको चाहिये कि लिये उसे भली भाँति चलाना कष्टसाध्य कार्य है, शीघ्र समयोपयोगी शिक्षासंस्थाएँ स्थापित करें तथापि वह असाध्य नहीं है । हमारे धनिक बंधुऔर विद्वानोंको चाहिये कि शास्त्री और ग्रेजु- ओंके दिलमें यदि आ जाय तो वे आर्थिक सहायता' एटोंके बनानेकी धुनको कम करके इन गरीबों- मजदी में इसे स्थापित कर सकते हैं और को व्यापारिक (औद्योगिक) शिक्षा देनेका विद्वान् भाई अपने मित्र अजैन विद्वानोंकी सहाशीघ प्रबंध करें। यता लेकर उसे सहजमें चला सकते हैं । अब संस्थाओंसे सम्यक् फल प्राप्त करनेके लिये समय बदल गया है। लोग धार्मिक उत्सवोंमें उनकी व्यवस्था और पाठ्यप्रणालीको सम्यक् भिन्नधर्मावलम्बियोंको, मिथ्यात्वी नास्तिक बनाना आवश्यक है। व्यवस्थाके लिये शिक्षा- आदि कहकर, बुलाने और सम्मति लेनेके पद्धतिके ज्ञाता, चतुर, उद्योगी और समया. विरोधी भाइयोंको तुच्छ दृष्टि से देखने लगे हैं। - फिर शिक्षा सरीखे व्यावहारिक और आवश्यकीय... नुकूल व्यवहार करनेवाले अध्यापकोंकी खोज ___ कार्यमें अपने अनुभवी, शिक्षातत्त्वज्ञ अजैन बंधुहोनी चाहिये, और संस्थाको ऐसे पंचोंके हाथोंमें ओंकी सम्मति और सहायतासे वंचित रहना यह सौंपनेकी जरूरत है जो उन. अध्यापकोंके कौनसी अक्लमंदी है ! अतः इस प्रस्तावित औकार्योंका भले प्रकार निरीक्षण करने और उन्हें योमिक विद्यालयकी प्रबंधकारिणी सभामें ऐसे समय समय पर निर्दिष्ट तथा यथोचित ही व्यक्तियोंको नियत करना चाहिये जो समा--- सहायता देनके लिये तैय्यार हों । विना जकी स्थिति और सामायक बातोंके. जानकार ऐसा किये अब काम नहीं चलेगा । आवश्य- होनेके सिवाय उद्योगी और शिक्षातत्त्वज्ञ हो... कीय विषयोंका निर्धार कर उनपर विद्वानोंद्वारा चाहे वे जैन हों या अजैन। ग्रंथ लिखवानेसे ग्रंथोंका अभाव दूर हो सकता है। For Personal & Private Use Only Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२४ जैनहितैषी - पुस्तकालयोंकी सहायता । ( ले० - गुलाबचंद जैन वैद्य, अमरावती । ) " सार्वजनिक पुस्तकालय जनसमुदायके विश्वविद्यालय हैं । " वास्तव में देखा जाय तो जितना लाभ पुस्तकालयों द्वारा हो सकता है, उतना अन्य संस्थाओं द्वारा नहीं हो सकता । अन्य विद्यासंस्था ओंसे शिक्षा केवल विद्यार्थियों को ही मिलती दूसरोंको नहीं । परंतु पुस्तकालयोंसे समाजकी प्रायः सभी व्यक्तियोंको शिक्षा मिला करती है । पुस्तकालय के द्वारा बच्चोंसे लगाकर वृद्ध अवस्था तक के सभी स्त्री पुरुष समरूपमें अपनी इच्छानुसार ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । संसारमें ज्ञानप्राप्तिका सर्वश्रेष्ठ और सहज उपाय पुस्तकालय ही है । पुस्तकालयों के समान उदारतापूर्वक ज्ञानामृतकी वर्षा करनेवाला दूसरा कोई भी उपाय इस समय नहीं है । जिस देश, समाज और जातिमें पुस्तकालयोंका आदर है, जहाँपर असंख्य पुस्तकालय विद्यमान हैं • और जहाँके कार्नेगी सरीखे महा धनकुबेर अपनी अटूट संपत्तिको रूढ़ियोंके प्रवाह में न बहाकर समयोपयोगी आवश्यकीय कार्यों में दान करते हैं, वह अमेरिका देश, वहाँका समाज और जाति कैसे अज्ञ और धनहीन रह सकती है ? नहीं कदापि नहीं । ' सार्वजनिक पुस्तका - लय मनुष्यसमाज के धर्ममंदिरोंसे बढ़कर हैं, ' ' सार्वजनिक पुस्तकालय मानव समुदायके वि श्वविद्यालय हैं,' ऐसी जहाँके देशवासियोंकी मनोभावनाएँ हैं, फिर वह देश कला, कौशल्य, विज्ञानादिका महान् केंद्र तथा धनवैभवसंपन्न रहा, तो इसमें क्या आश्चर्य है । जिस समय हमारे भारतवर्ष में तथा हमारे जैनसमाजमें इसी [ भाग १४ प्रकारकी उच्च भावनाएँ थीं उससमय हमारे धार्मिक और लौकिक वैभवको देखकर अन्य धर्म और देश मारे लज्जाके नतमस्तक दिखाई देते थे । लेकिन दुःखकी बात है, कि कुछ शताब्दियोंसे हमारा जैन समाज ग्रंथालयोंके महत्त्वको बिलकुल भूल गया । इसीसे ऐसी हीन और शोचनीय दशा हो गई । हमारे प्राचीन जैन महर्षियोंने दशधर्म के स्वरूपमें चार प्रकारका त्याग ( दान ) बतलाया है, उसमें शास्त्रदान भी है । इस शास्त्रदानमें तीनों ( आहार, औषध और अभय ) दान गर्भित हो जाते हैं । अनेक विद्वान् शास्त्रदानको विद्यादानमें गर्भित कर विद्यादानकी ही महिमा गाते हैं । समाजमें विद्याका अभाव देखकर उनका आलाप एक प्रकार से उचित भी है । किन्तु वास्तवमें शास्त्रदानका अर्थ शास्त्रालयोंका निर्माण करना है । ग्रंथालयों के द्वारा धर्मका प्रचार और सामाजिक उन्नति बहुत कुछ हो सकती है । इसी लिए हमारे पूर्वज जिनमंदिरों के साथ साथ ग्रंथसंग्रहालय ( शास्त्रडार ) स्थापित करते आए हैं । परन्तु खेद है कि हमारे ही जैनसमाज पर विशेष कर परिवार जाति पर रूढ़ियोंका, भेड़ियाधसान बुद्धि के अंधेरका और मानकषायका इतना आक्रमण हुआ है कि उसके द्वारा समाजका सत्त्व नष्ट हो गया। रूढ़ियोंने उसे अपना दास बना लिया, भेड़ियाधसान बुद्धिने समाजमें अपना आडंबर फैलाया और इसी आडंबर के द्वारा मानकषाय प्रज्वलित हो गई । इन त्रिकूटोंके एकत्र होने से धड़ाधड़ मंदिरोंपर मंदिर बनने लगे । फिर किसीका लक्ष्य शास्त्रोद्धारकी तरफ नहीं गया । इन त्रिकूटों के आक्रमणसे मंदिर बनवाने और रथ चलानेका उद्देश भ्रष्ट होता गया । यहाँ कि जहाँपर अनेक मंदिर होने के कारण नये मंदिरोंकी किंचित भी आवश्यकता नहीं थी For Personal & Private Use Only Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुस्तकालयों की सहायता । अङ्क १०-११ ] वहाँपर अनेक और भी नये नये मंदिर तैयार हो गये, जिनमें पूजा तक नहीं होती । तीर्थोके अतिरिक्त कहीं कहीं पर इतने मंदिर हैं जितने कि वहाँपर जैनियों के घर भी नहीं हैं । इतने पर भी प्रत्येक मंदिरमें बहुसंख्यक प्रतिमाएँ हैं जिनकी सँभालतक नहीं होती । पुराने जीर्ण. शीर्ण मंदिर नष्ट भले ही हो जावें, पर हमारी जाति के धनिक सज्जन, और पंचायतियोंके मुखिया अपने द्रव्यका व्यय घरके कार्यों में अर्थात् संतानों की ब्याह सगाई में, वेश्याओंके नाच मुजरोंमें करते हैं और या धार्मिक दृष्टिसे नये मंदिर बनवाकर रथप्रतिष्ठा आदिमें करते हैं । रूढ़ि, भेडियाधसान बुद्धि और मानकषाय इन त्रिकूटोंके कारण पदवियोंके लिये, अथवा बुढ़ापेमें ब्याह शादी करके संतानोत्पाइनके लिये हमारे धनिक और मुखिया लोग इतने लालायित रहते हैं, कि मेरे पास उसके लिखनेके लिये शब्द नहीं हैं। सिंघई बनना मानों इंद्रका सिंहासन प्राप्त करना है । जो विशेष श्रीमान् हैं उनकी इच्छा केवल सिंघई पदवीसे ही तृप्त नहीं होती, किन्तु वे उत्तरोत्तर और भी विशेष पदवियोंकी आकांक्षा रखते हुए सिंघईसे सवाईसिंघई, सेठ, सवाई सेठ, श्रीमंत सेठ और महा महा श्रीमंत सेठ बनने के लिये लालायित रहते हैं । इन्हीं मंदिरोंकी अधिकताको देखकर ब-हाड़ - शालापत्रक ' के संपादकने जैन पंथाची माहिती ” शीर्षक लेखमें इधर उधर की बातें लिख कर जैनियोंके कार्यकी विवेचना करते हुए मंदिरोंके निर्माणरूपी एक बभारी कार्यका दिग्दर्शन कराया है। उन्होंने लिखा है " जैनियों का आज तकका कर्त्तव्य • कर्म मंदिरोंके निर्माण करने का ही रहा है । " आप लोगोंको शायद इस परसे स्वाभिमान उत्पन्न हो, पर स्वाभिमानकी बात नहीं, यह हृदयभेदक कटाक्ष है। कटाक्ष न भी हो तो " CL ३२५ क्या यही हमारे कर्त्तव्यकी परम सीमा है ? हमको लज्जा आनी चाहिए कि अन्य लोग हमारा कार्य केवल मंदिर निर्माण करनेका ही बतलाते हैं ! हमारे पास इसका उत्तर भी क्या है ? यदि हमने कोई अन्य आर्थिक महत्कार्य किया होता, सार्वजनिक हितका कार्य स्थापित किया होता, या किसी सार्वजनिक कार्योंमें योग दिया होता तो आज हमें यह आक्षेप न सुनना पड़ता । हमारी कौमके मुखिया और धनिक लोगोंकी दातृत्वलालसाका श्रेय इन त्रिकृटोंको ही मिलना चाहिये । इसी लिये ये लोग न तो समयकी आवश्यकताको जानते . है और न द्रव्यका उपयोग करना ही इन्हें आता है। ये तो केवल इन त्रिकूटोंके शिकार बन गये हैं । ये बातें कुछ वर्ष पहलेकी हैं । वर्तमानसमयका प्रवाह पहले के समान जोरों पर नहीं है, तब भी प्रतिवर्ष दो चार नये मंदिरोंके निर्माणके साथ साथ रथप्रतिष्ठाएँ भी होती ही रहती हैं । अब भी हम लोग नहीं चेतते । यद्यपि नये मंदिर बनाना कम हो गया है, तथापि उसके बदले में लोग मंदिरोंकी मीनाकारी आदि अनेक सजावटके कार्योंमें बेहद रुपया खर्च करते रहते हैं । इन्हीं कार्योंके सबबसे हमारी वर्तमान संस्थाएँ जर्जरित अवस्थामें अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं । हमारी परंपरागत रूढ़ियों, भेड़ियाधसान बुद्धि और मान कषायके कुसंस्कार जैनसमाजके धनिकोंको अपने कर्तव्यपथ पर आरूढ़ नहीं होने देते । यदि ऐसी ही अवस्था बराबर बनी रही तो भविष्यत् में वर्तमानकी अनेक संस्थाएँ मृत्युमुखमें पतित हुए बिना न रहेंगी और समाजको उन्नति के बदलेमें हानि ही उठानी होगी । वर्तमान में जितनी प्रसिद्ध जैनसंस्थाएँ हैं उनका उद्देश विद्यार्थियोंको धार्मिक और लौकिक शिक्षा देनेका है । वे अपने उद्देश्य की पूर्ति For Personal & Private Use Only Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - जैनहितैषी [भाग १४ अनेक अंशोंमें कर भी रही हैं, परन्तु जबतक उसने एककी भी न मानी और उपर्युक्त नाना --समाजमें बच्चोंसे लगाकर वृद्ध अवस्थातकके प्रकारकी शंकाओंसे परिपूर्ण एक पत्र न्यूयार्कसभी स्त्रीपुरुष शिक्षित न होंगे तब तक उन्नति पुस्तकालयविभागको लिखा और पूछा होना एक बड़ा ही विकट कार्य है । अभी हमारे कि पुस्तकालयको दान करना कहाँतक समाजमें ऐसे बहुसंख्यक स्त्रीपुरुष विद्यमान हैं आवश्यक और उपयुक्त है ? उसके पत्रका जिन्हें एक अक्षर भी पढ़ना लिखना नहीं आता। समाधानकारक उत्तर 'न्यूयार्क लायब्रेरीज' अब बतलाइये, ऐसी अवस्थामें, वे कहाँतक नामके मासिकपत्रके संपादकने पुस्तकालयअपनी संतानोंको शिक्षित बनानेके विचार विभागकी तरफसे निम्न प्रकार दिया है। इसी रखते होंगे । हमारे हुल्लड़ मचानेसे भले ही कुछ प्रकारके संदेह अनेक लोगोंके मनमें बारबार - बालक स्कूलोंकी प्रवेश कक्षाओंतक पढ़ा लिये उठा करते हैं । यह जानकर संपादक महोदयने जायँ, पर इतनेसे ही विद्यार्थी शिक्षित नहीं हो इस उत्तरको सर्वसाधारणरूप दिया है और • सकते । शिक्षाके लिये योग्य आचरण और यह संपूर्ण उत्तर पाठकोंके लिये 'लायब्रेरी बुद्धिके विकासकी आवश्यकता है और इसकी मिसेलेनी' से यहाँ उद्धृत किया जाता है,पति विना मातापिताके सुशिक्षित हुए कदापि संपादक महोदय लिखते हैं, कि किस प्रकाहो नहीं सकती । इन सब त्रुटियोंको दूर , र रके सार्वजनिक कार्यको सहायता करना चाहिए; करने और समाजके प्रत्येक स्त्रीपुरुषको शिक्षित इसका दृढ निश्चय करनेके लिये प्रत्येक कार्यके बनानेके लिये ग्राम ग्राम तथा नगर नगरमें भले बुरे स्वरूपका भलीभाँति अवलोकन करनेका । नूतन ढंगके सार्वजनिक जैन पुस्तकालयों हक्क दातारोंको है । उसमें अन्य लोगोंको अपने की और प्रान्तप्रान्तमें एक बृहत् ऐति स्वयं स्थिर किये मत बिलकुल सत्य हैं ऐसा हासिक ग्रंथसंग्रहालयकी बहुत बड़ी आवश्यकता है। कहनेका यद्यपि अधिकार नहीं है, तथापि “पुस्तकालयकी ही सहायता करें" यह जो अमेरिकाके एक श्रीमानकी इच्छा कोई भारी " हम आग्रह करते हैं, उसमें जितनी उपयुक्तता है - रकम अपने निवासस्थानके पुस्तकालयको दान वही दिखानेका हमारा विचार है । वह युक्ति• करनेकी हुई । उसके सलाहकारोंने उसके दिलमें अनेक संशय पैदा कर दिये। उन्होंने अनेक संस्थाएँ वाद इस प्रकार हैबतलाई । किसीने कहा अस्पतालमें दान करो- १--प्रथम यह ध्यानमें रखना चाहिए कि अर्थात् औषधदान दो, किसीने कहा देवालय पुस्तकोंके द्वारा मनके भीतर जो विचार, जितनी : बनवा दो; कोई कहने लगा अनाथालयको क्यों जितनी भावनाएँ और जिस जिस प्रकारके ध्येय • नहीं देते जिसमें आहार और अभयदानादि होते हैं, उनके योगसे मनुष्यजीवनमें परिवर्तन अनेक लोकोपकारी कार्य शामिल हैं, कुछ होते हुए, एक प्रकारकी जीवनशक्तिका संचार और लोगोंने पूछा कि यंगमेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन मानव-जीवनका जो विकास होता है वैसा प्रत्यक्ष आदि अनेक दानपात्र संस्थाओंके होने पर भी और स्थिर रहनेवाला परिणाम अन्य किसी कार्यके केवल पुस्तकालयको आप क्यों दान देते द्वारा नहीं होता । प्रत्यक्ष धर्मोका अस्तित्व हो ! इसप्रकारके अनेक प्रश्न उसके मित्र और भी वायबल, कुराण, वेद आदि धार्मिक ग्रंथों सलाहकार करते थे और उसे समझाते थे। परन्तु द्वारा ही है । मनुष्य जीवनका जितना भला या For Personal & Private Use Only Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] पुस्तकालयोंकी सहायता। ३२७ बुरा संचालन होना संभव है वह ग्रंथों द्वारा चढ़ते समय इसबातका ज्ञान प्राप्त करना होता जितना सहजसाध्य होता है उतना अन्य किसी है कि अपने इस जीवनको अच्छा किसप्रकारसे द्वारा नहीं बन सकता । जीवित और स्फूर्तिदा- बनाया जाय " यह बिलकुल सत्य है। यक ग्रंथसंग्रहालयमें जैसी शक्ति और सामर्थ्य है ३–'सार्वजनिक पुस्तकालय' समाजकी वैसी भला अन्य किस संस्थामें है ? ऐसी एक ही संस्था है कि जिसका द्वार सदा ___ २–'धर्मादाय' विभागमें आनेवाली जितनी मुफ्त रहता है और जो लोगोंको सर्व समयोंमें -संस्थाएँ हैं उनमें पुस्तकालयही एक ऐसी संस्था कुछ न कुछ देती ही है । हृष्टपुष्ट और निर्बलको, है जिसके सम्बंधमें मि० कार्नेगी सरीखे श्रीमानों तथा गरीबोंको, वृद्धों और युवकोंको, महा दानवीर पुरुषने कहा है “ यह किसीको जगतकी आवश्यकताओंको खोज करनेवालों कुछ भी मुफ्त नहीं देती और न भिखारी बनाती और जगत्के बन्धनोंसे मुक्त होनेवालोंको समान है।" दान करना एक बड़ा बिकट और धोखेका. भावसे देखनेवाली ऐसी पुस्तकालय ही एक कार्य है । किसीका भी सांपत्तिक कल्याण किया संस्था है । संपूर्ण समाजको समृद्ध बनानेवाले जाता है तो उसकी स्वतंत्रता, आत्मविश्वास, केवल पुस्तकालय ही हैं । अन्य धार्मिक संस्थाउपकार बुद्धि आदि गुण कुछ कुछ परिमाणम तो ओंके उद्देश कछ ही लोगोंको लाभ पहुँचानेवाले अवश्य ही हुए विना नहीं रहते; और इन होते हैं, परन्तु पुस्तकालय बहुतों क्या, सभी सब गुणोंका मूल्य मिले हुए दानकी अपेक्षा लोगोंको लाभ पहुँचाते हैं। बहुत अधिक होनेके कारण वे गुण उससे न ४-किसी भी नगर या ग्राममें एकता और , छुड़ाकर उसका कल्याण करना महा विकटसे प्रेम बढ़ानेवाला सार्वजनिक पुस्तकालयके समान विकट है । अस्पताल, यंगमेन्स क्रिश्चियन एसो सिएशन, अनाथालय आदि संस्थाओंके कारण अन्य दूसरा प्रबल साधन नहीं है । दूसरी ऐसे गुणोंके अपहरण होनेका बारबार भय रहता संस्थाओंके कारण समाजमें भेद और पंथ उप स्थित होते हैं, अनेक समाजों तथा जातियोंमें है । पर सार्वजनिक पुस्तकालय लोगोंको जो कुछ अमूल्य निधि अर्पण करता है उसकी तड़ (धड़े) पड़ जाते हैं। समाजमें एकमत और प्राप्तिके लिये लोगोंको जितनी मानसिक शक्ति - एक विचार होनेके मार्गमें वे संस्थाएँ बाधक हो बैठती हैं । पर सार्वजनिक पुस्तकालय पर समाजऔर शारीरिक श्रमका व्यय करना पड़ता है, की सर्व जातियोंका चाहे उनमें परस्परमें कितउसीके मानसे वह निधि उनको श्रीमान बनाती " ना ही मतभेद, आदि क्यों न हो, समान है । पुस्तकालय अपना भंडार ऐसे ही व्यक्तियोंको । प्रेम रहता है । किसी भी समाजमें सामाजिक खोलकर देता है जो उसे अपनानेका परिश्रम केन्द्र बननके लिए सार्वजनिक पुस्तकालय करते हैं । इस लिये सब धार्मिक दानोंमें पुस्तकालय (शास्त्रदान ) का हक अद्वितीय और नामकी संस्था सब प्रकारसे योग्य है। अशंकनीय है, ऐसा ही कहना उचित है । कार्ने- ५-सार्वजनिक पुस्तकालयोंमें जो खर्च गीने जो कहा है कि “ सब लोगोंके लिये मुफ्त होता है वह उनके द्वारा प्राप्त हुए नैतिक, खुले हुए सार्वजनिक पुस्तकालय मुफ्त कुछ भी बौद्धिक और सामाजिक हितके कारण ही नहीं नहीं देते, किन्तु प्रत्येक वाचक वृंदको स्वयं किन्तु उनके द्वारा होनेवाले प्रत्यक्ष सांपत्तिक अपने ज्ञानसोपान पर चढ़ना पड़ता है और लाभोंके कारण भी उचित समझा जाना चाहिये। For Personal & Private Use Only Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२८ जैनहितैषी - अन्य धार्मिक संस्थाओं द्वारा यद्यपि नैतिक और सामाजिक लाभ होते हैं, तथापि आर्थिक दृष्टिसे सांपत्तिक हानि ही होती है। सार्वजनिक पुस्तकालय द्वारा नैतिक और उसी प्रकार सांपत्तिक भी लाभ होता है; क्योंकि जिन जिन लोगोंको पुस्तकोंकी, खबरोंकी, या अन्य किसी वस्तुके प्राप्तिस्थलके ज्ञानकी आवश्यकता होती है तो वे सब पुस्तकें या जरूरी बातें मुफ्त में मिलने के कारण उन लोगों के उतने पैसे बचते हैं और . उन पैसोंको वे लोग अपने घर के जरूरी कामोंमें खर्च कर सकते हैं । ६ - सर्व साधनों से युक्त और सुव्यवस्थित रूपसे चलनेवाले पुस्तकालय सब जगह होनेसे अन्य प्रकारकी धार्मिक संस्थाओंकी जरूरत बहुत कम हो जाती है । जिस समाजको किसी भी प्रकारके धर्मादायकी जरूरत नहीं वही समाज आदर्शभूत है । जिस समाजमें सार्वजनिक धर्मादाय प्रचलित रहते हैं उस समाजकी रचनायें अनेक त्रुटियाँ हैं, ऐसा पर्याय से कुबूल करना पड़ता है और उन त्रुटियों को दूर करनेके लिये ही धर्मादायोंका ( दान करनेका ) अस्तित्व हुआ । पुस्तकालयों के द्वारा जो अच्छे विचार, जो बौद्धिक स्फूर्ति, उद्योग व्यापारादिमें जो प्रवीता वगैरह प्राप्त होती हैं उनके द्वारा मनुष्यजीवन ऐसा समृद्धिवान होता है, कि लोगोंको सामुदायिक धर्मादाय पर ( आहार, औषध और अभयादि दानोंपर ) अवलंबित रहनेका प्रसंग दिन पर दिन कम होता जाता है । कुछ परिमाणसे यह कार्य सचमुच ही सार्वजनिक पुस्तकालय कर रहे हैं । लॉर्ड अॅव्हबरीने एक जगह कहा है कि “ किसी भी समाजको पुस्तकालयों पर जो खर्च करना पड़ता है, वह दरिद्रता और उसके द्वारा होनेवाले अपराधोंका परिमाण कम होनेसे समाजको व्याजसहित वापिस मिल जाता है । " [ भाग १४ ७ -- अंतमें समाजकी अन्य संस्थाओंके सुव्यवस्थित रूपसे चलने और उनके द्वारा ष्ट लाभकी प्राप्ति के लिये पुस्तकालयोंकी बड़ीभारी आवश्यकता हुआ करती है। कोई भी पाठशाला, विद्यालय, महाविद्यालय, औद्योगिक संस्था, देवालय, समाजसेवासंघ अर्थात् सभा सुसाइटियाँ मंडल वगैरह अंतर्राष्ट्रीय धर्मादाय कार्य इन सबको अपने अपने उद्देशकी योग्य रीतसे पूर्ति करनेके लिये और उसमें कौशल्य तथा प्रवीणता संपादन करनेके लिये अच्छे अच्छे ग्रंथसंग्रहालयोंकी ही सहायता लेनी पड़ती है । विना ग्रंथसंग्रहालयकी सहायता के अन्य संस्थाओंका कार्य भली भाँति परिपूर्ण नहीं होने पाता । इस युक्तिवादको पढ़ने से प्रत्येक मनुष्यक विश्वास हो जायगा कि पुस्तकालय स्थापन करने और उनकी सहायता करनेसे अन्य सब सब धार्मिक कार्योंमें नूतन सामर्थ्य और कर्तृत्व पैदा करनेके समान समाजकी प्रत्येक अच्छी संस्थाको अधिक अच्छी और अधिक संपन्न करना है । क्या हमारी जैनकौमके नेता, श्रीमान और समाजकी सभा सुसाइटियोंके सदस्य जैन पुस्तकालय स्थापित करेंगे ? बन्धुओ, अब इन रूढ़ि आदि त्रिकुटों का सत्यानाश करो जिन्होंने तुम्हारे सत्य धर्मके प्रचारमें रोड़ा अटका रक्खा है और सामाजिक उन्नति के मार्गसे तुम्हें नीचे ढकेल दिया है । प्रत्येक नगर और ग्राममें अपने पुस्तकालय खोल दो और सबके लिये उनका द्वार मुक्त कर दो। उन्हीं पुस्तकालयों में एक एक रात्रिशालाका भी विभागः रख दो जिसमें लोगोंको पुस्तकें पढ़ने को दी जायँ और साधारण लिखना पढ़ना सिखलाया जाय । बड़े बड़े नगरों में पुस्तकालय के साथ साथ एक ऐसा औद्योगिक विभाग भी होना चाहिये,, जिसमें समाजके नव युवक शिक्षा प्राप्त कर अपनी आजीविकासे वंचित न रह सकें । For Personal & Private Use Only Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ vva अङ्क १०-११] .. तामिल भाषामें जैनग्रंथ । सबसे पहले एक विराट् पुस्तकालय हो तामिल भाषामें जैवग्रंथ । जिसमें प्राचीन हस्तलिखित शास्त्रोंका संग्रहविभाग, छपे हुए शास्त्रोंका और अन्यान्य हिन्दी DR. तथा प्रांतिक भाषाओंके उत्तमोत्तम साहित्यका (अनु०-कुमार देवेंद्रप्रसादजी, आरा।). संग्रह-विभाग, ऐतिहासिक खोज और उसका प्रायः सभी पाश्चात्य विद्वानोंका यह मत है संग्रह विभाग, स्त्रीशिक्षा और बालशिक्षोपयोगी कि ईसाकी ९ वीं शताब्दीके पहले तामिल पुस्तक-विभाग, औद्योगिक और वैद्यकोपयोगी साहित्य ही नहीं था । पर वास्तव में बात यह ग्रंथसंग्रह-विभाग वगैरह रहें, तथा प्रसिद्ध प्रसिद्ध मालूम होती है कि तामिल साहित्यमें जो कुछ दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, द्वैमा- भी मौलिक और अत्युत्तम है वह सब नवीं सिक और त्रैमासिक आदि पत्र आते रहें। (९ वीं) शताब्दीके पहले ही लिखा गया था इसी पुस्तकालयका एक ऐसा विभाग रहे जिसके और इसके बाद जो कुछ लिखा गया है वह द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्ति इसके सभासद अधिकतर या तो संस्कृत ग्रंथोंका केवल अनुकरण बनकर अपने अपने स्थलों पर इस पुस्तकालयसे है और या उनका अनुवाद मात्र है । प्राचीन पुस्तकें मँगाकर नियत समय तक पढ़ सकें और तामिल काव्योंका ध्यानपूर्वक अनुशीलन करनेसे पढ़ने के बाद वापिस भेज दें। इसके लिये चाहे यह बात आसानीसे समझमें आ जाती है कि डिपाजिट और पोष्ट-खर्च सभासदोंसे ले लिया तामिल साहित्यके कुछ प्राचीनतम ग्रंथ दो जावे । दूसरे एक ऐसा विभाग रक्खा जाय कि हजार वर्षसे भी पहले रचे गये थे और उसी प्रत्येक सभाके उपदेशक जो जगह जगह घूमते समय तामिल लोगोंने अरब, ग्रीस ( यूनान ), हैं उन्हें उपयुक्त पुस्तकोंका एक एक बक्स तैयार रोम और जावा जैसी विदेशी जातियोंके साथ करके दे दिया जाय । जहाँ वे जावें वहाँके व्यापारसम्बंध स्थापित करके प्रचुर धन और लोगोंको पुस्तकें बिना किसी अपेक्षाके नियत सभ्यताको प्राप्त किया था। सांसारिक उन्नतिके . समयके नियमानुसार पढ़ने के लिये दिया करें। साथ साथ उनकी साहित्यिक उन्नतिका भी दूसरी जगह जानेपर वे पुस्तकें पढ़नेवालोंसे प्रारंभ हुआ । ईसाकी पहली शताब्दी तामिल माँगकर पुस्तकालयकी सहायताके लिये अपील साहित्यकी उन्नतिका सर्वोत्तम काल है और इसी करें। इस प्रकारसे अभी थोड़ा बहुत काम चल समय मदुरामें तामिल राजा उग्रपांड्यकी राजसकता है । कुछ दिन बाद समाजके अधिकांश सभामें कवियोंका अन्तिम सम्मेलन हुआ था। व्यक्ति स्वयं ही पुस्तकालयकी उपयोगिता जान इस कालके उन कवियोंकी संख्या जिनके ग्रंथ जायँगे और तब अपने अपने स्थलोंमें खुद हम लोगोंको उपलब्ध हैं पचाससे कम नहीं है। पुस्तकालय खोल लेंगे। ये कविलोग भिन्न भिन्न जातियों, मतों और तामिल देशके भिन्न भिन्न प्रांतोंके रहनेवाले थे। - आशा है कि इन बातों पर जैनसमाजका इनमें से कुछ जैन, कुछ बौद्ध और कुछ वैदिक ध्यान आकर्षित होगा । इसके द्वारा यदि एक मतानुयायी थे। भी नया पुस्तकालय खुल गया तो मैं अपने नीचेकी पंक्तियोंमें, तामिल साहित्यमें निग्रंथों परिश्रमको सफल समझूगा । (जैनियों) द्वारा लिखे हुए ग्रंथोंकी आलोचना करने और यह दिखलानेकी चेष्टा की गई है कि For Personal & Private Use Only Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ जैनियोंकी प्रतिभाने चोल और पांड्य राज्योंकी काव्य उत्तरकालीन तामिल कवियोंके लिये मार्गराजभाषाओंकी उन्नति. करनेमें कितना योग दर्शक और इस बातको बतलानेके लिये ज्वलन्त दिया है। जैनियोंके लिखे हुए असंख्य तामिल आदर्श है कि जीवनकी भिन्न भिन्न दशाओं ग्रंथोंमेंसे अनेकों ग्रंथ भिन्न भिन्न कारणोंसे नष्ट और प्रकृतिके भिन्न भिन्न सौंदर्योंका हृदयहारी हो गये हैं-कितने अग्नि और वर्षा आदि नैस- वर्णन कैसे किया जा सकता है। र्गिक कारणोंसे नष्ट हो गये हैं, कितनोंका काम इस काव्यमें बहुतसी शिक्षाकी बातें भरी हुई चूहों तथा दीमकोंने तमाम किया है और कित- है, जिनमेसें कुछ इस प्रकार हैं:-(१) कोई नोंको जैनमतके शत्रुओंने नाश कर डाला है। काम करनेके पहले राजाको चाहिये कि अपने जो इने गिने ग्रंथ रह गये हैं उनमेंसे आधेसे मंत्रियोंसे कई बार परामर्श करे; (२) जो अधिक ताड़के पत्तोंपर लिखे हुए अंधे तहखानोंमें मनुष्य स्त्रीकी इच्छाके अधीन है उसे अनेक प्रच्छन्न हैं। कष्टोंका सामना करना होगा; (३) मनुष्यको ___ तामिल साहित्यमें जैनियोंके लिखे हुए ग्रंथ हमेशा अपने गुरुकी आज्ञाके अनुसार काम महाकाव्य, नीतिकाव्य, व्याकरण, कोश और करना चाहिये; (४) शत्रुओंको वशमें करनेके फलितज्योतिष इन पाँच भागोंमें विभाजित किये लिये मनुष्यको धैर्यपूर्वक सुअवसरकी प्रतीक्षा जा सकते हैं। करनी चाहिये; (५) मनुष्यको चाहिये कि यदि किसी जीवको दुःखमें देखे तो उसे दुःखसे महाकाव्य । छुड़ाकर उसकी रक्षा करे; (६) प्रत्येक १ जीवक-चिन्तामणि । इस महाकाव्यके व्यक्तिको अपने मातापिताकी आज्ञाका सदा रचयिता थिरुथ्थक देवर ( Tniruththaka पालन करना चाहिये; (७) जिस व्यक्तिका devar) हैं । इसको बने हुए लगभग १०२० साथी बुद्धिमान और दयालु होता है वह जिस वर्ष हुए हैं और यह ९०० ईसवीसे बादका बना कामको चाहे कर सकता है; (८) सुख और हुआ मालम नहीं होता। इसमें भगवान महावी- दुःखमें मनुष्यको अपना चित्त हमेशा समभाव रके समकालीन राजा जीवककी जीवनकथा रूपसे स्थिर रखना चाहिये और यह समझना है, जो कि हेमांगदमें राज्य करते थे । कथा १३ चाहिये कि जीवनकी प्रत्येक घटना उसके डों और ३१४५ पद्योंमें वर्णित है । वर्णन- कर्मोंका नतीजा है; (९) दान उन्हींको देना सौंदर्य और अत्युत्तम लेखनशैलीके कारण तामिल चाहिये जो अच्छे भले आदमी, धर्मात्मा तथा साहित्यमें जीवक-चिन्तामणिको प्रथम स्थान पात्र हों; (१०) जो लोग ठीक रास्तेपर नहीं हैं दिया गया है । तामिल साहित्यके पाँच महा उनके साथ सहानुभूति रखनी चाहिये और काव्योंमें यह सबसे प्रधान काव्य है । इसमें उन्हें मुक्तिके यथार्थ मार्गपर लानेका यत्न करना राजा जीवकके साहसिक जीवनका मनोरंजक चाहिये और (११) जिन्होंने अपने ऊपर वर्णन देनेके साथ साथ लोगोंके रहन-सहन, उनके उपकार किया है अथवा जो अपने सहायक रहे सामाजिक रीति-रिवाजों और व्यापार, धन तथा है उन्हें कभी न भूलना चाहिये। वैभवका भी सजीव वर्णन दिया है । २ सीलप्पथिहरम् (Silppathiharam)। संस्कृतमें प्रसिद्ध वाल्मीकि रामायणके सदृश इसका नम्बर पाँचों महाकाव्योंमें दूसरा है । इसे अनुपम काव्य-सौन्दर्यको लिये हुए, चिन्तामाण भी पहले महाकाव्यकी तरह अतिशय प्राचीन For Personal & Private Use Only Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] तामिल भाषामें जैनग्रंथ । और अत्युत्तम होनेका मान प्राप्त है । बड़े बड़े हैं। काव्यकी शैली मनोहारिणी है और जिन टीकाकार अक्सर प्रामाणिक ग्रंथके तौर पर शब्दोंका इसमें प्रयोग किया गया है वे 'अजेय' इसमेंसे अनेक वाक्योंको अपनी टीकाओंमें कहे जाते हैं। प्राचीन तामिल विद्वान जब उदधृत किया करते हैं । यह पुस्तक लंकाके ता- इस काव्यको पढ़ा करते थे तब इसके रचयिमिल लोगोंके बड़े कामकी है; क्योंकि यही एक ताका नाम मालूम न होनेके कारण इसके प्राचीन पुस्तक है जिसमें रावणके समयके बाद कर्ताको 'थोलमोलिथेवर ! ( Tholamoli लंकाका वर्णन पाया जाता है और जिसमें, स्वयं thewar) अर्थात् " शब्दाजेयके ” तौर पर ग्रंथकर्ताके कथनानुसार, उस टापूमें बहुत पूजी पुकारा करते थे । तभीसे यह ग्रंथ शब्दाजेजानेवाली काव्यकी नायिका पट्टिनी कन्निका यका बनाया हुआ कहा जाता है। इसमें ( Pattini Kannika ) का जीवनवृत्तांत २१३१ पद्य और १२ परिच्छेद हैं जिनमें जैनदिया हुआ है । यद्यपि इस काव्यकी कथा पुराणोक्त नौ वासुदेवोंमेंसे “प्पृष्ट ' (त्रिपृष्ठ ) पूर्णरूपसे जैनकथा नहीं है तथापि इसके वासुदेव और उसके शत्रु 'अयकृव' प्रथिरचयिताके जैन होने में संदेह नहीं है। क्योंकि (प्रति ) वासुदेवकी कथा लिखी हुई है। यह परलोकवासी वी. कनकसबाई पिल्ले जो तामिल- कथा गुणभद्राचार्यके उत्तरपुराणसे ली गई के एक बड़े भारी विद्वान थे, अपनी किताब है (?) इस काव्यका रचनाकाल अभी तक " The Tamils Eighteen hundred ठीक तौरसे मालूम नहीं हुआ, परंतु चूलामणिके years ago" में लिखते हैं:-"सबसे अन्तिम स्वसंपादित संस्करणकी भूमिकामें, तामिलके चेर राजा ( इमायवर्मा Imayavarmau) नामी विद्वान् मिस्टर सी० वी० थामोधरं पिल्ले का एक छाटा भाइ इल्लकाआडगल लिखते हैं कि चलामणि कमसे कम १५०० ( Illam-koadigal ) था जो जैनमतका साधु वर्षxसे कमका बना हुआ नहीं है। हो गया था। यह इल्लंकोआडिगल् 'चीलप्पथिकरं २ यशोधरकाव्यके रचयिता एक जैनी . ( Chilappathikaram ) नामक एक बड़े हैं जिनके नामका पता नहीं लगा । इस ग्रंथमें काव्यका रचयिता था।" इस ग्रंथका रचना- ३२० पद्य और चार सर्ग हैं, जिनमें पौरा- . काल ईसाकी पहली शताब्दी मालूम किया गया णिक राजा 'यशोधर' की कथा है। अच्छे । है। शेष तीन महाकाव्योंमें वलयपति और और बुरे कर्मोंका फल कैसा होता है, यह कुंडलकेसी ये दो ग्रंथ दूसरे दो जैन विद्वानोंके इस कथामें दिखलाया गया है। साथ ही, उदा- । बनाये हुए बतलाये जाते हैं । इनमेंसे कुंडलके. हरण द्वारा यह भी बतलाया गया है कि जो सीका कुछ पता ही नहीं चलता, पर दूसरेके सिर्फ कोई किसी जीवको कष्ट पहुँचाता है उसे कुछ खंड समय समय पर प्रकाशित हुए हैं। नरकयातना सहनी पड़ती है और अपनी इच्छाके विरुद्ध पशुपक्षियों तथा कीड़ोंमकोड़ोंमें ____ पाँच महाकाव्योंके सदृश पाँच छोटे काव्य जन्म लेना पड़ता है। भी हैं जिनके नाम हैं चूलामणि, यशोधरकाव्य, - हमारी रायमें, जब यह ग्रंथ गुणभद्राचार्यके उदयनकुमारकाव्य, नागकुमारकाव्य और नील उत्तरपुराणके आधार पर बनाया गया है तब इतना केसी । इन काव्योंकी रचनाका क्रम ज्ञात नही पुराना नहीं हो सकता; क्योंकि गुणभद्राचार्यका समय १ इन काव्योंमें. चूलामणि सबसे बड़ा है। विक्रमकी १० वीं शताब्दी है और उनका उक्त पुराण -इसमें काव्यसौन्दर्य और उत्तम भाव भरे पड़े शक संवत् ८२० में बनकर समाप्त हुआ था। For Personal & Private Use Only Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३२ जैनहितैषी - ३ उदयनकुमारकाव्यमें . वत्स देशके राजा उदयनकी कथा है । इसके रचियता भी एक अज्ञातनामा जैन हैं । यह काव्य छह समें है और अब प्रकाशित किया जा रहा है। ४ नागकुमार काव्य अभी हस्तलिपिके रूपमें है, और एक छोटा किन्तु रोचक काव्य है । ५ नीलकेसीके रचयिताका नाम ज्ञात नहीं, पर यह भी एक जैन थे । यह ग्रंथ दस सर्गों में है और इसमें जैनधर्मके तथ्यों का वर्णन है । इस पर 'श्रीसमयदिवाकर वामन मुनिकी एक अच्छी टीका है । नीतिकाव्य | १ थिरुक्कुरल् ( Thirukkural) | यह वास्तव में एक ऊँचे दर्जेका तामिलग्रंथ और एक जैनाचार्यकी अमरकृति है, जिन्हें उनकी अधिक प्रसिद्धिके कारण हिन्दू लोग भी अपनाने की चेष्टा कर सकते हैं, पर इस विषयके अकाट्य प्रमाण उपलब्ध हैं कि वे जैनी थे । इस पुस्त - कमें धर्म, धन और प्रेमका वर्णन १३३ परिच्छेदोंमें किया गया है और प्रत्येक परिच्छेद में १० दोहे ( Couplets ) हैं । यह पुस्तक • अपने ढंग की ऐसी सार्वभौमिक है कि विभिन्नमतोंके अच्छे अच्छे लेखक प्रमाणके तौरपर इसमें से अवतरण दिया करते हैं और इसका अनुवाद योरुपकी चारसे अधिक भाषाओं में हो गया है । यह पुस्तक ईसाकी दूसरी शताब्दी के बादकी बनी हुई मालूम नहीं होती । ( जैनहितैषीमें इसका अनुवाद प्रकाशित हो रहा है । ) २ नालडियार ( Naladiyar ) । यह एक काव्यसंग्रह है, जिसके ४० परिच्छेदोंमें ४०० चतुष्पदी ( Quartrasin ) हैं । इसमें धन, सांसारिक यश, शारीरिक सुन्दरता और यौवनकी क्षणभंगुरता तथा धर्म, सत्य और साधुताके गुणोंकी महत्ता और स्थिरशीलताका वर्णन है । [ भाग १४ इस ग्रंथके रचे जानेकी कथा इस प्रकार है:दो हजार वर्ष हुए जब कि उत्तर भारत में घोर दुर्भिक्षसे पीड़ित होकर आठहजार जैनमुनियोंने दक्षिण भारतको प्रस्थान किया और वे पांड्य देशमें पहुँचे, जहाँके पांड्यराजा उम्रपेरुवली ( Ugraperuvali ) ने उनका हृदयसे स्वागत किया । विद्वानोंकी संगतिसे राजाको बड़ा प्रेम था, इस लिये उसने मुनियोंपर बड़ा अनुग्रह रक्खा और उनका अच्छा आदर सत्कार किया । कुछ महीनों के बाद मुनियोंको मालूम हुआ कि अब उनके देश उत्तरभारत में अकाल नहीं है और वहाँकी दशा फिरसे अच्छी हो गई है । अतः उन लोगोंकी इच्छा स्वदेश लौटनेकी हुई और उन्होंने उग्रपेरुक्लीसे जानेकी इजाजत माँगी । राजाको उनका संग छूट जाना दुःखदायक जान पड़ता था और वह नहीं चा हता था कि वे लोग उसके राज्यसे चले जायँ, इसलिये उसने अपने ही देशमें अपनी रक्षातले रहनेके लिये उनसे विनय किया । पर मुनियोंको यह बात पसंद नहीं थी । राजासे दूसरी बार अनुमति माँगनेसे डरकर मुनियोंने एकदिन प्रातः काल अपने अपने आसन के नीचे तालपत्रके टुकड़ेपर एक एक श्लोक (पद्य) लिखकर रखदिया और वे वहाँसे चल दिये । जब राजाने सुना कि मुनिलोग चले गये तो वह उस विशाल भवनमें आया जहाँ वे लोग बैठते थे और आसन हटानेपर उसे तालपत्रके टुकड़े मिले । राजाने क्रोधवश अपने आदमियोंसे कहा कि इन टुकड़ों को 'वैगाइ ' नदीमें फेंक दो । नौकरोंने राजाकी आज्ञाके अनुसार काम किया । परंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि इनमें से लगभग चार सौ टुकड़े धाराके विरुद्ध तैरते हुए किनारेपर जा लगे, जहाँपर लोगोंने आश्चर्यके साथ उनको उठा लिया और राजाके पास जाकर इस आश्चर्यजनक घटनाको कह For Personal & Private Use Only www.jalnelibrary.org Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] तामिल भाषामें जैनग्रंथ। . .. ३३३ सनाया। राजाको सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ “जो चारसौ कहावतें इस ग्रंथमें प्रयुक्त और उसने साधुओंकी ऐसी उत्तम यादगार हुई हैं वे मदुराकी अन्तिम विद्वज्जन सभाके (स्मृतिचिह्न ) को फेंक देनेकी अपनी सहसा समयमें प्रचलित थीं । वे ग्रंथकर्ताकी प्रस्तावनामें आज्ञापर बहुत अफसोस किया, साथ ही सा- 'प्राचीन कहावतें' बतलाई गई हैं । अतः इस धुओंके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिये ग्रंथसे तामिल लोगोंकी प्राचीन सभ्यताका बहुउसने उन पद्योंको इकट्ठा करके नीतिकी एक मूल्य उल्लेख मिलता है । प्रायः हर एक पद्यकी पुस्तक बनाई और उसका नाम 'नालडियार' तीसरी पंक्तिमें ग्रंथकार. किसी राजा ( शायद रक्खा; क्योंकि उसके प्रत्येक पद्यमें ' नालडी' उस समयके पांड्य राजा ) को या किसी स्त्रीको अर्थात् चार पंक्तियाँ (चरण ) थीं। कुछ का- सम्बोधन करके लिखता है । पहली दो पंक्तिलके पश्चात् पद्मनर नामके एक तामिल विद्वा- . योंमें आम तौर पर वह विषय रक्खा गया है नने इस पर एक टीका लिखी और इसके पद्यों. जिसे ग्रंथकार सुझाना चाहता है और अन्तिम को ४० परिच्छेदोंमें विभाजित कर दिया । ... पंक्ति कहावतकी है । बहुतसे पद्योंमें विषय और ३पालमोलिननरु Palmolinanuru(चा- कहावतके बीचमें जो सादृश्य है वह प्रशंसनीय रसौ कहावतें )। यह एक पुस्तक है जिसमें ४०० है और कहीं कहीं पर बड़ा ही चमत्कारिक है, पद्य हैं और जिसे एक जैन राजाने बनाया है, यद्यपि कोई कोई सादृश्य कुछ कहावतोंके प्रचलित जो कि पांड्यदेशके - 'मुनरुराइ' भागपर न रहनेके कारण अब समझमें नहीं आता है । राज्य करता था। इस पर एक जैनकी लिखी कुछ पयोंमें कहावतें उपमाओंका काम देती हैं; हुई प्राचीन टीका है । मिस्टर टी० चेल्वकेस- दूसरे पयोंमें किसी कहावतकी यथार्थताका उवराय मुदालियर द्वारा संपादित 'पालमोलि- दाहरण किसी प्राचीन तथा प्रसिद्ध उल्लेखद्वारा ननरु' की भूमिकासे कुछ अवतरण यहाँ दिये दिया गया है।" जाते हैं जिनके पढ़नेसे पुस्तकके महत्त्वका “ यद्यपि साहित्यसम्बन्धी उत्तम प्रकारके - अच्छा परिचय मिल सकता है:- व्यवहारोंका इस पुस्तकमें, जहाँ तहाँ, प्रयोग " यह पुस्तक 'पालमोलिननरु ' इस वज- पाया जाता है, तो भी इसकी शब्दरचना हसे कही जाती है कि इसके प्रत्येक पद्यके 'नालडी' और 'कुरल' जैसी प्रासादअन्तमें एक पालमोलि ( कहावत ) लगी हुई गुणविशिष्ट नहीं है । लेखनशैली इसकी है । ये कहावतें छन्दकी आवश्यकतानुसार जहाँ तीक्ष्ण है और वह अर्थकी सुस्पष्टता, और त्यातहाँ बदल दी गई हैं।" ख्यानकी महत्त्वपूर्णताको लिये हुए है। ग्रंथकार___“ यद्यपि कुछ कहावतें समयके फेरसे इस की विद्वत्ता उसकी केवित्तशक्तिसे बढ़ी हुई है। समय प्रचलित नहीं हैं तो भी उनमेंसे बहुतसी इस ग्रंथमें जो कुछ मुग्धकारी गुण है वह उन , आजतक व्यवहारमें आती हैं । कहावतें. ग्रंथ- कहावतों द्वारा उत्पन्न है जो प्रत्येक पद्यमें वर्णित - मालाकी दूसरी बहुतसी पुस्तकोंमें भी पाई जाती बातों पर पाठकोंका ध्यान खींच लेती हैं।" हैं, पर प्राचीन अथवा मध्यमकालीन उच्च साहि- “ग्रंथकार जैनमतावलम्बी होने पर भी त्यके किसी भी दूसरे ग्रंथमें कहावतोंकी ऐसी कट्टर जैनी नहीं है । किसी किसी पद्यमें धार्मिक भरमार नहीं है। यही इस पुस्तककी सबसे तथ्यका वर्णन वह बिलकुल पक्षपातरहित हो अधिक विलक्षणता है।" कर करता नजर आता है ।" For Personal & Private Use Only Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३४ " ग्रंथमाला के अन्य ग्रंथोंकी भाँति यह ग्रंथ भी पुरुषार्थका वर्णन करनेवाला है । इसमें जीवनके अनुभवोंका संग्रह है, जिनमें से कोई कोई ऐसे बहुमूल्य और व्यावहारिक संकेतों तथा सूचनाओं को लिये हुए हैं जो कि नालडी और ' कुरल' मै भी उपलब्ध नहीं हैं । " ( " जैनहितैषी - ४ थिनैमलै (Thinaimalai) । इसके लेखक ' कनिमेधावियर ' हैं । इसमें १५० पय हैं और उनमें पाँच अंतरंग पदार्थोंका वर्णन है । ९८ यह करियासन्का बनाया हुआ या ग्रंथ है। इसके प्रत्येक पद्य में पाँच चीजों का वर्णन है और इसीसे 'पंच' शब्द साथमें जोड़ा गया है । ५ सिरुपंचमूलं (Siru-Panchamulam)। 'ब्दीका बना हुआ है । ६ येलाडी ( Yeladi ) । कनिमेधावियर - का लिखा हुआ यह ८० पयोंका ग्रंथ है और इसके प्रत्येक पद्यमें ६ शिक्षाएँ हैं । ये छहों पुस्तकें मदुराकी अन्तिम विद्वज्जनसभासे स्वीकृत होकर प्रसिद्ध १८ किलकनक्कुओं ( खंडकाव्यों) में परिगणित की गई थीं । ७ अरनेरिञ्चरं ( Aranorichcharam ) । यह पुस्तक मुनै पडियर ( Munaippadiar ) बनाई हुई है और इसमें जैनधर्म तथा नीतिविषयक २२२ पय हैं । व्याकरण | १ अहप्पोरुल्-इलक्कनम् ( Ahapporul - ilakkanam) । ' नक्कविराजनम्बियर ' विरचित यह तामिल व्याकरण पर लिखे हुए ' तोलहप्पियम् ' नामक एक अतिशय प्राचनि ग्रंथके तृतीय भागका सारांश है । २ यप्परुंगलम् | कनकसागर मुनिरचित यह अलंकार और छंदशास्त्र विषयका एक ग्रन्थ है। इसमें तीन परिच्छेदों में ९५ प हैं । [ भाग १४ ३ यप्परुंगलकारिकै । अमृतसागर मुनिकी बनाई हुई यह उपर्युक्त ग्रन्थकी टीका है! ४ वीरचोलियम । यह भी एक व्याकरण ग्रन्थ है, जो ' बुद्धमित्र ' नामके, सम्भवत: एक जैन व्यक्ति द्वारा रचा गया और वीरचोल राजा के नामसे अंकित किया गया है । इसमें १८९ पद्य हैं, और उन पर एक टीका है। ग्रंथ में अक्षर, शब्द, वाक्यरचना, छंद और अलंकारका वर्णन है और वह प्रायः ईसाकी १९ वीं शता ' पविनन्दि ५ नन्नुल । यह प्रसिद्ध मुनिकी रचना है, जिसने कुलोत्तुंग तृतीयके अधीनस्थ राजा चोलवंशीय अमराभरण सीप गंगकी प्रार्थना पर इस ग्रन्थको प्रायः १२ वीं शताब्दी के अन्तमें लिखा था; क्यों कि यह अच्छी तरह ज्ञात है कि कुलोत्तुंग तृतीय सन ११७८ ई० में राज्यसिंहासन पर बैठा था । इस ग्रन्थमें केवल अक्षरों और शब्दोंका वर्णन है, और आज कल यह सबसे अधिक प्रामाणिक ग्रन्थके तौर पर माना जाता है । प्रत्येक क्यूलेशन, एफ० ए० और बी० ए० की परीक्षावर्ष मद्रास विश्वविद्यालय के द्वारा, उसकी मैट्रीउपयोगी पाठ्य पुस्तकके तौर पर नियत की ओंमें, यह पुस्तक व्याकरणविषयकी एक मात्र जाती है । ६ नेमिनादम । गुणवीर पण्डितरचित । इस ग्रंथ में अक्षरों और शब्दोंका वर्णन ९६ पयोंमें दिया है और उन पर एक टीका भी है । ७ अञ्चनन्दिम । गुणवीर पण्डितरचित यह छंदः शास्त्रविषयक एक काव्य है । कोश | चूडामणि निघण्टु ! इसमें -१२ अध्याय हैं और इसके रचयिताका नाम मण्डलपुरुष है, : For Personal & Private Use Only Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] तामिल भाषामें जैनग्रंथ । जो अपनेको उत्तरपुराणके लेखक गुणभद्र किया है और उनमेंसे अनेकके साथमें अत्युत्तम आचार्यके शिष्य बतलाते हैं। यह भली भाँति टीकाएँ लगी हुई हैं। यह शोकका विषय है कि विदित है कि उत्तर पुराण ८९८ ई० में समाप्त दक्षिण भारतके जैन लोगोंने अपने सहधर्मी हुआ है। और लेखक उसमें राष्ट्रकूट-नृप अकाल- विद्वानों द्वारा रचे हुए दक्षिणी साहित्यके इन वर्ष कृष्णरायका उल्लेख करता है, जिसने ८७५ अमूल्य ग्रन्थोंको प्रकाशित करने अथवा उन और ९११ ई० के मध्यवर्ती समयमें राज्य किया । दूसरे पवित्रतम स्थिर किरणोंवाले ग्रन्थरत्नोंको प्रकाशमें लानेके लिये, जो कि बहुतसे पुराने है, इस लिए यह ग्रन्थ दसवीं शताब्दीके प्रथम घरानों और मठोंके अंधेरे एकांतस्थानों तथा पादका बना हुआ होना चाहिये। मैले-कुचैले शास्त्रभंडारोंमें दबे पड़े हैं, अब ज्योतिष। तक बहुत ही कम ध्यान दिया है । जब कि उनके उत्तरीय जैन-बन्ध जैनोन्नतिका विस्तार जिनेन्द्रमालै। तामिलमें फलित-ज्योतिष- करनेको बडे ही उत्साहके साथ अग्रसर हुए है-- का यह एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है । इसके रचयिता उन्होंने जैनियोंके लिए विद्यालय और छात्रालय सम्भवतः जिनेन्द्रव्याकरणके कर्ता (पूज्य खोल रक्खे हैं, संस्कृत प्राकृतके जैनपाद ) हैं। ग्रन्थोंको प्रकाशित कराया है, जैन-ग्रन्थोंके अन्य ग्रन्थ। पुस्तकालय खोल रक्खे हैं, जिनमें संस्कृत, १ मेरुमन्दरपुराणम् । वामनाचार्यरचित । बंगला, हिन्दी, मराठी, गुजराती, तामिल आदि इस ग्रन्यमें १३ सर्ग और १४०६ पद्य हैं। इसमें भाषाओंके ग्रन्थ हैं। वे अँगरेजी, हिन्दी, मराठी 'मेरु' और 'मन्दर ' नामके दो भाईयोंकी और गुजरातीमें जैनपत्र सम्पादन करते हैंकथा और जैन-सिद्धान्तोंकी व्याख्या है। और भी अनेक ऐसे कार्य करते हैं जोकि अपने २थीरुनुवान्धान्धि । यह अविरोध ना. उन सहधर्मीभाईयोंकी उन्नति तथा उत्थानमें सहाथका बनाया हुआ है। (देखो अँ जैनगजट यक हों जो कि सारे उत्तरभारतमें फैले हुए हैं। भाग ९, २, पृ० ११) ___ आशा है कि दक्षिणके जैन लोग भी अब शीघ्र ३ थीरुकलम्बकम् । उथीसे देवविरचित । जागेंगे और स्वसमाजके उत्थानके लिये अपनी इस ग्रन्थमें जैन-सिद्धान्तों (दर्शनशास्त्र ) की . जिम्मेदारीको समझते हुए अपने उत्तरीय भाईअच्छी व्याख्या है। योंका अनुकरण करेंगे।* इन ग्रन्थोंके अतिरिक्त भगवान अर्हतके गुणगानको लिए हुए सैकड़ों स्तोत्र हैं। ___ जैन-लेखकोंद्वारा लिखे हुए तामिलके इतने ही * यह लेख एक तामिल जैनद्वारा लिखे हुए ग्रन्थ अभीतक हमको मालूम हुए हैं। इनमेंसे 'जैनी और तामिल साहित्य' नामके अंगरेजी लेखका, अनेक ग्रन्थ मद्रास-विश्वविद्यालयकी साहित्य- जो कि अंगरेजी जैनगजटके कई अंकोंमें प्रकाशित हुआ परीक्षाओंमें नियत हो चुके हैं। बहुत ग्रन्थोंको है, भावानुवाद है। इसके लिये हम मूल लेखक तथा कुछ प्रतिभाशाली अजैन विद्वानोंने प्रकाशित संपादक जैनगजटके बहुत आभारी हैं ।-अनुवादक । For Personal & Private Use Only Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनहितैषी [भाग १४ विधवा-विवाह-खण्डन। समालोचनाका औचित्य सिद्ध करूँगा। तर्क तीर्थजी फरमाते हैं कि सिंह एक ही बार संभोग करता है, कदली ( केलं) एक ही बार फलती (ले०-श्रीयुत नाथूराम प्रेमी।) है, स्त्रीको एक ही बार तेल चढ़ता है अर्थात् वह श्रीयुत पं० झमनलालजी तर्कतीर्थने अभी एक ही बार परण सकती है और राणा हमीरकी कुछ ही समय पहले कलकत्तेके 'पद्मावती प्रतिज्ञा भी एक ही हो सकती है, और इस दलीपुरवाल' नामक मासिकपत्रमें 'विधवा-विवाह- लसे पण्डितजी यह सिद्धान्त गढ़ डालना खण्डन ' नामका एक लेख लिखा था। यह चाहते हैं कि कोई स्त्री दूसरी बार व्याही लेख पत्रसम्पादक लेखक और उनके अनु- ही नहीं जा सकती । सचमुच पण्डितजीकी यायियोंको इतना पसन्द आया कि उन्हें उसे तर्कतीर्थता बड़ी ही जबर्दस्त है ! यदि पण्डितजी विशेष रूपसे प्रचार करनेकी आवश्यकता प्रतीत विवाहित हैं तो मैं उनसे पूछता हूँ कि आप हुई और तदनुसार अब वह जुदा पुस्तकाकार अपने माने हुए सिंहके आदर्शके अनुसार सारे छपा लिया गया है । इसकी जो समालोचनायें जीवनमें एक ही बार संभोग करके सन्तुष्ट हो जैनमित्र आदि पत्रोंमें प्रकाशित हुई हैं, उन्हें गये हैं या नहीं ? यदि वे विवाहित हैं तो उन्हें तो पाठक भी पढ़ चुके होंगे और निबन्ध- इसका उत्तर नकारमें ही देना पड़ेगा । और लेखक भी; परन्तु इधर हमारे गुजराती सह- यदि विवाहित नहीं हैं तो उन्हें कहना पड़ेगा योगी जैनहितेच्छ (सितम्बर सन् १९२०) ने कि मेरे माने हुए नीतिधर्मके अनुयायी गृहस्थ इस पुस्तककी जो समालोचना की है, उसे जीवनमें एक ही बार स्त्रीसंभोग करके तृप्त शायद ही किसीने पढ़ा हो, अतएव हम यहाँ नहीं हो सकते। और यदि यह ठीक है तो हम उसका अनुवाद प्रकाशित कर देते हैं। हमें आशा पण्डितजीके ही न्यायसे कहेंगे कि स्वयं पण्डिहै कि जो लोग पूर्वोक्त मधुर समालोचनाओंका तजी और उनकी पसन्द की हुई उच्चनीतिके उपभोग कर चुके हैं उन्हें यह तीखी और माननेवाले गृहस्थ एक तिर्यचसे भी बदतर हैं, चटपटी समालोचना बहुत अरुचिकर न होगी। अतएव मनुष्यवर्गमेंसे उनका बहिष्कार कर डालना “विधवा-विवाहखण्डन । लेखक, पं० चाहिए। क्यों नहीं ? सिंह जो तिर्यच है वह झम्मनलालजी तर्कतीर्थ, कलकत्ता, मूल्य तीन तो सारी जिन्दगीमें एक ही बार संभोग करे आने । बेचारे पण्डितजी अभी तक सौ वर्ष पहले- और धर्मशास्त्री मनुष्य प्रतिदिन या प्रति महीने की पुरानी दलीलोंमें ही मस्त हैं। उन्हें खबर ही करे, यह तो तिर्यचसे भी बुरा काम है और इस . नहीं कि ये भद्दी दलीलें हजारों बार काटी गई लिए इन पण्डितजीको मनुष्यसमाजमेंसे क्यों न हैं और कभीकी साफ कर दी गई हैं। यदि अब खारिज किया जाय ? यह बात मैं मानता हूँ उनका कहीं भी अस्तित्व है तो केवल तर्कतीर्थ कि केलेका झाड़ एक ही बार फलला है, परन्तु पण्डितोंके मास्तष्कमें । हमें तो अब ये तर्कतीर्थ साथ ही तर्कतीर्थजीसे पूछता हूँ कि क्या पण्डित दुनियाके लिये भाररूप ही प्रतीत होते आपको यह खबर नहीं है कि दूसरे ऐसे भी हैं । इन बेचारोंमें जान पड़ता है कि सामान्य झाड़ हैं जो अनेक बार फलते हैं और फिर भी बुद्धि ( Common Sense ) का भी टोटा झाड़के वर्गमेंसे न उनका बहिष्कार ही किया है । एक उदाहरण देकर मैं अपनी इस कठोर जाता है और न वे वारंवार फलनेसे रोके ही For Personal & Private Use Only Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११ विधवा-विवाह-खण्डन । ३३७ जाते हैं ? राणा हमीरकी प्रतिज्ञा एक ही वार बारह वर्षकी उग्र तपस्या करके कैवल्य प्राप्त होती है, इस लिए सारी स्त्री जातिका वाग्दान करना ही चाहिए, नहीं तो उसका बहिष्कार किया भी एक ही वार होना चाहिए-इस तरहका जायगा; प्रत्येक पण्डित और तर्कतीर्थको शंकतर्क स्वीकार करनेके पहले पूछना पड़ेगा कि राचार्यके समान दिग्विजय करना ही चाहिए, .. सारी स्त्रीजातिका राणा हमीरके साथ क्या नहीं तो उसे देश निकालेकी सजा दी जानी चा. . सम्बन्ध है और यदि स्त्रीजातिके बिर पर राणा हिए,-समाज यदि इस तरहके नियम बना हमीर (जो एक पुरुष थे) का उदाहरण कानून- चुका हो, तभी वह यह नियम बनानेका अधिके रूप में लाद देना धर्म है तो राणा हमीरके कारी हो सकता है कि प्रत्येक विधवा सम्पूर्णसजातीय पुरुषसमूहके लिए तो यह उदाहरण तया कामको जीतनेवाली होनी चाहिए, नहीं तो खास तौरसे कानून बन जाना चाहिए। पण्डित- उसका बहिष्कार किया जायगा। जीको चाहिए कि पहले वे राणा हमीरके . आदर्श और व्यवहार, व्यक्तिगत धर्म और सजातीय पुरुषवर्गके लिए दूसरी सामाजिक नियम, फर्जियात ( बलात्पालनीय ) करनेका कायदा जारी करावें और तब स्त्री धर्म, और मर्जियात (स्वेच्छया पालनीय ) जाति पर अपना यह निरंकुश शासन चलानेके धर्म, इनके बीचमें क्या अन्तर है, इसका लिए बाहर निकलें । राणा हमीरके उदाहरणको 'विवेक' न कर सकनेके कारण ही ये धर्मके' जनसाधारणकी नीतिमें घुसेड़नेके लिए छटपटा- खिलौने विधवाविवाहके प्रश्नका रहस्य नहीं: नेवालों पर मुझे सचमुच ही बड़ी दया: आती समझ सकते । एक पाठशालामें सातवीं कक्षाके है ! मालूम नहीं इन बेचारे पोथा-पण्डितोंमें, विद्यार्थीको स्थान चाहिए और ' अ इ उ' इतनी सामान्य बुद्धि भी कब आयगी ! पढ़नेवालेके लिए भी स्थान चाहिए । पाठ. इन पढे लिखे बालकोंको इतना भी ज्ञान शालाके विवेकी संचालकका यह कर्तव्य होना नहीं है कि पृथ्वीके भषण राणा हमीर या राणा चाहिए कि वह 'अ इ उ' घोखनेवालोंको पहली प्रताप तो बिरले ही पैदा होते हैं, दनियाके सभी कक्षामें और उनके बाद दूसरोंको दूसरी तीसरी आदमी वैसे नहीं हो सकतेपोशा और सातवीं कक्षाओंमें बिठावे । शालामें केवल इस बातका विचार नहीं कर सकते कि किस उन्हाको स्थान न मिलना चाहिए जो 'अइउ) चीजको 'आदर्श' मानना चाहिए और पढ़ना भी पसन्द न करते हों और केवल आवश्यक-बलादाचरणीय--ठहराना चाहिए, इधर उधर भटकते फिरनेमें ही खुश हों। इसी और यही इनको सबसे बड़ी बीमारी है। तमाम मनष्य रह सकें ५) तरह समाजमें सब तरहके ऊँची नीची श्रेणीके और जी सकें, ऐसी मध्यम स्त्री-पुरुषोंका विकास हो, इस ओर समाजकी ढंगकी उसकी रचना होनी चाहिए-केवल दृष्टि रहना चाहिये और इस कारण हमीर, प्रताप,. आबारा-व्यभिचारी स्त्री-पुरुषोंको ही उसमें महावीर आदिके चरित्र लोगोंके आगे आदर्शके स्थान न मिलना चाहिए। एक बार क्यों इक्कीस रूपमें रखना चाहिए; परंतु इनके नियम सब बार भी पुनर्विवाह करनेवाला समाजसे दूर नहीं लोगोंके बलादाचरणीय नहीं ठहराये जा किया जा सकता; हाँ उसका दर्जा अवश्य ही सकते । यह तो शक्तिका प्रश्न है । नीचा गिना जाना चाहिए और शुद्ध सधवा प्रत्येक गृहस्थको कुबेरके समान धनी होना ही धर्म तथा विधवा धर्मको वीरतासे पालनेवाले चाहिए, नहीं तो उसका सिर काट डाला जायगा; स्त्री-पुरुष, खास करके सर्वथा विवाह ही न प्रत्येक साधुको भगवान महावीरके समान साढे करके आजन्म ब्रह्मचर्य पालनेवाले स्त्री-पुरुष ... For Personal & Private Use Only Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३८ - जैनहितैषी - [भाग १४ दर्जेमें बहुत ऊँचे गिने जाने चाहिए । हम विविध प्रसङ्ग । अपनी गृह-व्यवस्था भी क्या किया करते हैं ? आपने कभी कोई ऐसा गृहस्थ देखा है जो केवल :सोने और हीरे मोतियोंको ही घरमें रखता. १-जातिबहिष्कारके सम्बंधमें हो और लोहे पीतलकी चीजोंको पास भी न सोमदेवसूरिके विचार । आने देता हो ? यह ठीक है कि वह सोनेको तिजोरीमें रक्खेगा, चाँदीको आलमारीमें रक्खेगा. भारतकी उच्च जातियोंमें पंचायतोंकी हालत पीतल ताँबेको मँडवे पर रक्खेगा और लोहेकी प्रायः बड़ी ही शोचनीय है । वे अपने अविवेक तथा मिट्टीकी चीजोंको जहाँ तहाँ-जरूरत पड़ने और पक्षपातादि दूषणोंके कारण समाज परसे पर बाहरके आँगन तकमें-रख देगा: परन्त जरू- अपनी सत्ता-अपना प्रभुत्व-उठा चुकी हैं, उनका रत उसे इन सभी चीजोंकी पड़ेगी-इनके प्रभाव समाजके व्यक्तियों पर अब बहुत कम बिना वह अपना काम नहीं चल सकेगा । ऐसी अवशिष्ट है। यही वजह है कि देशमें दिन ऐसी सीधी सादी बातें भी ये धर्मशास्त्रोंके पन्ने पल- पर दिन मुकदमेबाजी बढ़ती चली जाती है टनेवाले नहीं समझते और इतने पर भी समाजके. और उससे उसकी बहुत कुछ पतन हो रहा है। नेता और शास्त्रोंके उपदेशक बनने चलते हैं। जैन पंचायतोंकी हालत और भी ज्यादह खराब हमारी समझमें तो शास्त्रोंके अर्थ भी इन लोगोंके है। जिसके जो जीने आता है-विना सोचे समझे. दो अंगलके मास्तिष्कोंमेंसे विकृत हो कर ही बाहर विना गहरा परामर्श किये और विना अपना निकलते होंगे और इस कारण ऐसे उपदेशकोंको सत्ताका विचार किये वह उसे सहसा कर डालती समाजके लिए सदा भयंकर ही समझने चाहिए।" है और फल पर कुछ भी दृष्टि नहीं रखती। नतीजा जिसका यही होता है कि या तो पंचा- ईश्वर उनकी मदद करता है जो अपनी मदद यतकी वह तजवीज कागजोंमें ही रक्खी रह आप करते हैं-God helps those who help themselves, यह जिस महात्माका वचन है उसे जाती है-उस पर कुछ भी अमल नहीं होताइस बातका अनुभव हो चुका था कि और या उसके द्वारा समाज तथा धर्मको बहुत वास्तवमें कोई एक ईश्वर या परमात्मा जगतका बड़ी हानि उठानी पडती है। इन दोनों ही बातोंकर्ता ही नहीं है । परंतु जिस वातावरणमें के बहुतसे उदाहरण दिये जा सकते हैं। परंतु वह साँस लेता था. जिन लोगोंमें उसे जीवन यहाँ पर हम पंचायतोंकी हालतको दिखलाने व्यतीत करना था और जिनका हित करना और उनके कार्याकार्य पर विवेचन करना नहीं उसे इष्ट था, उनकी परिस्थिति उस समय ऐसी चाहते; हमारा अभिप्राय इस समय सिर्फ इतना नहीं थी कि वह परमात्माके कर्ताहर्तापनके र ही बतलानेका है कि जैनपंचायतोंने जातिबहिविरुद्ध कुछ जबान खोले और उससे कोई लाभ ·ष्कार नामके तीक्ष्ण हथियारको जो खिलौनेकी उठाए । इसीलिये उसको लोगोंमें स्वावलम्बनका तरह अपने हाथमें ले रक्खा है और, विना उसका भाव पैदा करनेके लिये उपर्युक्त सूरत अख्तियार . करनी पड़ी थी-अपने उपदेशके साथमें एक र प्रयोग जाने तथा अपने बलादिकको समझे, ऐसा गरुमंत्र लगाना पडा था जिससे जनता - जहाँ तहाँ यद्वा तद्वा उसका व्यवहार किया केवल ईश्वरके भरोसेपर ही रहकर अकर्मण्य न जाता है वह धर्म और समाजके लिये बड़ा ही बन जाय । -खंडविचार। भयंकर तथा हानिकारक है । श्रीसोमदेव आचार्य अपने 'यशस्तिलक' ग्रंथमें लिखते हैं For Personal & Private Use Only Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] विविध प्रसङ्ग। " नवैः संदिग्धनिर्वाहैर्विदध्याद्गणवर्धनम्। किया है। मालूम नहीं जब उक्त पंचायत एकदोषकृते त्याज्यः प्राप्ततत्त्वः कथं नरः ॥ सेठीजीके कार्यको धर्मविरुद्ध नहीं समझती, यतः समयकार्यार्थी नानापंचजनाश्रयः । तो फिर वह कैसे उसके द्वारा अपनी जातिके अतः संबोध्य यो यत्र योग्यस्तं तत्र योजयेत् ॥ गौरवका नष्ट होना मानती है । हमारे खयाउपेक्षायां तु जायेत तत्त्वाद्दरतरो नरः। लमें तो जिस जातिमें धर्माविरुद्ध कार्य करनेततस्तस्य भवो दीर्घः समयोऽपि च हीयते ॥” वालोंको भी स्थान नहीं है वह जाति कुछ इन पद्योंका आशय इस प्रकार है: भी गौरवान्वित नहीं है । हम पूछते हैं ऐसे ऐसे नवीन मनुष्योंसे अपनी जातिकी कि जब जैनशास्त्रोंमें जाति तो जाति समूह वृद्धि करनी चाहिये जो संदिग्धनिर्वाह हैं भिन्नवर्ण तकके व्यक्तियोंमें परस्पर विवाह अर्थात्, जिनके विषयमें यह संदेह है कि वे संबंधके सैकड़ों उदाहरण पाये जाते हैं जातिके आचार विचारका यथेष्ट पालन कर- तब क्या बम्बईकी खंडेलवाल जैनपंचायत सकेंगे । ( और जब यह बात है तब ) किसी उन सभी ऐसे विवाह करनेवालोंको, जिनमें एक दोषके कारण कोई विद्वान जातिसे बहि- अच्छे अच्छे पज्य पुरुष भी शामिल हैं, घृणा कारके योग्य कैसे हो सकता है ? चूँकि धर्मका और तिरस्कारकी दृष्टिसे देखती है ? यदि नहीं प्रयोजन नाना पंचजनोंके आश्रित होता है, अतः देखती तो फिर सेठीजीके साथ ऐसा व्यवहार समझाकर जो जिस कामके योग्य हो उसको किये जानेमें कौनसा विशेष कारण है । उसकी उसमें लगाना चाहिये-जातिसे पृथक् न करना इस कार्रवाईसे तो ऐसा मालूम होता है कि चाहिये। यदि किसी दोषके कारण एक व्य- वह अपने वर्तमान रीतिरिवाजोंके मुकाबलेमें क्तिकी-खासकर विद्वानकी-उपेक्षा की जाती है, जैनशास्त्रोंकी आज्ञाओं और उसके विधिविधा. उसे जातिसे पृथक् किया जाता है तो उस उपे- नोंको कोई चीज नहीं समझती और न सोमदेवक्षासे वह मनुष्य तत्त्वसे बहुत दूर जा पड़ता है। सूरि आदिके उन वाक्योंको मानती है जिनमें तस्वसे दूर जा पड़नेके कारण उसका संसार बढ़ लिखा है कि ' जैनियोंको वे सर्वलौकिक जाता है और धर्मकी भी क्षति होती है, अर्थात् विधियाँ प्रमाण हैं जिनसे सम्यक्त्वको हानि नहीं समांजके साथ साथ धर्मको भी हानि उठानी पहुँचती और न व्रतोंमें कोई दषण आता है *।'" पड़ती है। क्या सेठीजीके इस विवाहकार्यसे सम्यक्त्वमें कोई ___ आचार्य महोदयने अपने इन वाक्यों द्वारा बाधा आती है और श्रावकीय व्रतोंमें कोई दूषण जैन जातियों और जैन पंचायतोंको जो गहरा लगता है ? यदि ऐसा नहीं है तो क्या उक्त परामर्श दिया है और जो दूरकी बात सझाई पंचायतके सदस्योंको अजैन समझा जाय जो है बह सभीके ध्यान देने और मनन करनेके वे सेठीजीकी उक्त कार्रवाईका अभिनंदन न योग्य है । हम बम्बईकी दि० जैन खंडेलवाल करके-उसे प्रामाणिक न मानकर-उलटा उसका पंचायतसे खास तौर पर आचार्य महाराजके तिरस्कार करते हैं ? अथवा यही समझा जाय। इन वाक्यों पर विचार करनेका अनुरोध करते “यथाःहैं, जिसने हालमें पं० अर्जुनलालजी सेठी सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिकोविधिः । जैसे विद्वानोंको अपनी जातिसे पृथक् करनेका यत्र सम्यक्त्वहानिर्न यत्र न व्रतदूषणम् ॥ असमीक्षित कार्य ही नहीं बल्कि दुःसाहस -यशस्तिलके सोमदेवः ।. For Personal & Private Use Only Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४० जैनहितैषी [भाग १४ कि वे शास्त्रोंकी उक्त आज्ञाओंको नहीं मानते ? भी परिवर्तन नहीं हुआ-बल्कि पिछले वर्षोंकी दोनोंमेंसे एक बात जरूर स्वीकार करनी होगी। नीतिसे भी उसकी इस वर्षकी नीतिमें कोई खास बम्बई पंचायतकी इस अनुचित कर्रवाई पर फर्क नहीं पड़ा-हाँ, इतना जरूर है कि पिछले यद्यपि बहुत कुछ युक्तिपूर्वक लिखा जा सकता वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष जैनाचार्योंके शासनहै, परंतु यहाँ हमें उसकी कोई विशेष आलोचना भेदको दिखलानेवाले कुछ नये ढंगके लेख जरूर करना इष्ट नहीं है, सिर्फ सूचनाके तौरपर ये निकाले गये हैं । यदि संभा वास्तवमें इन कुछ पंक्तियाँ लिखी गई हैं । आशा है बम्बईकी लेखोंसे ही भयभीत होती है, इन्हें हा जैनधर्मके उक्त पंचायत अपनी कार्रवाई पर फिरसे विचार विरुद्ध और जैनधर्मकी इमारतको धराशायी करेगी और जिस प्रकार एक निष्पक्ष विचार- करनेवाले समझती है तो कहना होगा वान् जज तजवीज सानी ( Review) में-पुन- सभाका सत्यस बिलकुल प्रेम नहीं हैं, सत्यक र्विचार प्रसंगमें-अपने ही पूर्व फैसलेको लौट- सामने उसकी आँखें चौधियाती हैं, वह सत्यकी कर यशका भागी बनता है उसी प्रकार पंचा- दुश्मन है और इस लिये उसने अपनी इस यत भी प्रकृत विषय पर गहरा विचार करके कार्रवाईके द्वारा सर्वसाधारणको यह बतलानेकी अपने पूर्व प्रस्तावको रद्द करेगी, और इस तरह चेष्टा की है कि, सच्ची बात मत कहो-सच्ची अपनी विचारपटुता तथा निष्पक्षपातताका सर्व बातोंके कहनेसे जैनधर्म स्थिर नहीं रहेगा !" साधारणको परिचय देगी। __ क्यों कि इन लेखोंमें दिगम्बर जैनशास्त्रोंसे जो कुछ भी प्रमाण वाक्य उद्धृत किये गये हैं, २-दृष्टि-विकार। और जिनसे बहुत स्पष्टताके साथ आचार्योंका मालूम होता है कलकत्तेकी दिगम्बर जैन परस्पर शासनभेद पाया जाता है, उन्हें कोई सभाका दृष्टि-विकार दिन पर दिन बढ़ता जाता गलत साबित नहीं कर सकता-यह सिद्ध है । पहले उसे 'सत्योदय' और 'जातिप्रबो- नहीं कर सकता कि वे वाक्य स्वयं लेखकद्वारा घक' ये दो पत्र ही भयंकर तथा उसकी श्रद्धा- कल्पित किये गये हैं और उक्त ग्रंथोंमें देवीके मंदिरको गिरा देनेवाले दिखलाई देते मौजूद नहीं हैं । परंतु ये लेख तो इस थे, परंतु अब कुछ ही दिन बाद, जैनहितैषी . र वर्षके प्रथम अंकसे ही निकलने प्रारंभ हुए भी उसे वैसा ही नजर आने लगा है-सभाकी हैं और जिस समय 'सत्योदय' आदिकके निर्बल और विकृतदृष्टिमें अब उसका मधुर __ संबंधमें सभाने प्रस्ताव पास किया था उस समय तथा हितकर तेज भी नहीं समाता, वह भी उसे दो लेख निकल चुके थे, बादमें, हितैषीसम्बंधी कष्टकर बोध होता है-और इस लिये अब उसने दूसरे प्रस्तावके पास होने तक, और कोई लेख उसकी तरफसे भी आँखें बंद कर लेनेका उस प्रकारका नहीं निकला । ऐसी हालतमें इन विधान किया है अर्थात्, एक प्रस्तावके द्वारा उक्त लेखोंके कारण सभाके कुपित, शुभित अथवा पत्रोंके समान उसे भी अजैन पत्र करार देकर भयभीत होने आदिकी कोई बात समझमें नहीं उसके पढ़नेका निषेध किया है। जहाँतक हम आती-यदि इनके कारण ऐसा हुआ होता तो समझते हैं और दूसरे विद्वान् समझ सकते हैं, है वह सत्योदयादि संबंधी प्रथम प्रस्तावके समय ही । जैनहितैषीकी जो नीति इस वर्षके शुरूमें थी १ ता० २१ अप्रेल सन् १९२० को - वही अबतक बराबर चली आती है-उसमें जरा २ ता० २३ जुलाई १९२० तक (जैनमार्तड । For Personal & Private Use Only Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] विविध प्रसङ्ग । & ३४१ और इ होता-परंतु उस समय वैसा होना तो दूर रहा, या कि नहीं, और यदि निकल जाय तो पत्रको जैनहितैषी सभाकी दृष्टिमें एक जैनपत्र था क्या तावान (जर्माना ) देना पडेगा यह सब इसी लिये प्रस्तावानसार प्रस्तावकी एक नकल कछ मालम नहीं हआ। तीसरी शतके मताबिक उसके संपादकके पास भी भेजी गई थी। अस्तु। पत्र में विधवाविवाहके प्रतिकल लेख निकाले दूसरा भी कोई ऐसा नवीन कारण मालूम नहीं जावेंगे । अनुकूल लेखोंको, चाहे वे महात्माहोता जिसका अस्तित्व उस समय न हो । इस गाँधी जैसे विद्वानोंके विचार ही क्यों न हों, लिये यही कहना होगा कि सभाका दृष्टिविकार सूचना रूपसे भी, कोई स्थान नहीं मिलेगा। उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। उसे जो वस्तु थोड़े ही इसतरह मार्तडके पाठकोंको दूसरी तरहके विचादिन पहले अपने असली रंगरूपमें दिखलाई देती रॉकी गड़बड़में पड़ने और सोचने समझनेका थी वही वस्तु, उसी रंगरूपमें होते हुए भी, कष्ट उठानेसे सुरक्षित रक्खा जायगा । चौथी अब विकृत दशामें नजर आती है-सफेद चीज शर्तके अनुसार शास्त्रोंके श्लोक तथा गाथाओंको पीली, काली अथवा हरी नजर आने लगी है- अब इस पत्रमें छपनेका सौभाग्य प्राप्त न होगा। इसीका नाम दृष्टिविकार है। हाँ, उनका कुछ अंश जरूर छप सकेगा, चाहे ३-विक्रीत देह। वह किसी विवादके लिये पर्याप्त हो या न हो। सहयोगी · जैनमार्तड' ने अपना शरीर मालूम नहीं, इस शर्तमें लालाजीका क्या रहस्य २५० ) रुपयेमें ला० देवीसहायजी जैन है और उसके अनुसार पत्रमें शास्त्रोंका गद्य रईस व बेंकर फीरोजपुर छावनीके हाथ कुछ भाग भी उद्धृत हो सकेगा या कि नहीं। शर्तों पर बेच डाला है । अब उसके संपादक अपने शरीरके इस तरह बिक जानेपर जैन महाशय इच्छा रहने पर भी उसमें अपने मार्तडने बहुत हर्ष मनाया है और अपने खरीदास्वतंत्र विचार प्रकट नहीं कर सकेंगे और न रको ‘परम धर्मात्मा' की पदवी प्रदान की है ! शर्तों के विरुद्ध अपनी किसी इच्छाको चरितार्थ इससे इससे पाठक पत्रके हृदयकी गहराईको बहुत :कर सकेंगे। अतः जैनमार्तडको अबसे 'विक्रीत कुछ माप सकते हैं। देह' समझना चाहिये। पहली शर्तके अनसार ४-शुभ चिह्न। उसमें सिर्फ वहीं लेख निकला करेंगे जो दिगम्बर शुद्धाम्नायके अनुसार होंगे, दूसरे लेखोंको सहयोगी जैनमित्रसे यह मालूम करके हमें स्थान नहीं मिलेगा । मालूम नहीं 'दि० शुद्धा- बहुत प्रसन्नता हुई कि पापड जि. अमरावतीकी नाय ' के स्वरूपकी लाला साहबसे कोई राज- एक स्त्री श्रीमती राधाबाईजीने अमरावतीमें एक ष्टरी कराई गई या कि नहीं। दूसरी शर्तके अनु- 'जैन बोर्डिंग हाउस' खोलनेके लिये २० हजार सार उन मिथ्यावादियोंका प्रत्येक अंकमें खंडन रुपये मकानके वास्ते और ९ हजार रुपये निकला करेगा जो इस (शुद्धाम्नायी ) धर्मपर वार्षिक आमदनीके पाँच खेत चिरस्थायी खर्चके कलंक लगा रहे हैं । परंतु यदि किसी अंकमें लिये दान किये हैं। हमारी रायमें जैनियोंके खंडनके योग्य कोई बात न हो अथवा कोई लेखक लिये यह बड़ा ही शुभचिह्न है जो उनके स्त्री विषयक लेख लिख कर न भेजे और संपादक समाजकी परिणति ऐसे समयोपयोगी कार्योंकी महाशय स्वयं कोई वैसा लेख लिखनके लिये तरफ होने लगी है। हम श्रीमतीकी इस उदारता, तय्यार न हों तो अंक विना खंडनके निकलेगा दूरदृष्टता और परोपकार बुद्धिकी हृदयसे प्रशंसा For Personal & Private Use Only Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४२ जैनहितैषी [भाग १४. करते हैं । आशा है दूसरी स्त्रियाँ भी आपके इस विचारोंसे प्रकट है कि वे सेठीजीको कितने .. दानका अनुकरण करेंगी और समयोपयोगी गौरवकी दृष्टिसे देखते हैं और उनके जैनकार्योंमें धन व्यय करना सीखेंगी। धर्मविषयक ज्ञानको कितना ऊँचे दुर्जेका समझे ५-सेठी अर्जनलालजीके विषयमें हुए हैं। साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि वे अंतर्जातीय विवाहोंको अच्छा मानते हैं । इतने शीतलप्रसादजीके विचार ।। पर भी उनके पत्र जैनमित्रमें जो कभी कभी - श्रीमान् ब्रह्मचारी शीतलप्रसाद ने सेठी कछ विरुद्ध विचार निकला करते हैं उन्हें अर्जुनलालजीको, उनके पत्रके उत्तरमें, जो पत्र किसी दूसरी ही बाह्य पालिसी पर अवलम्बित २८ जून सन् १९२० को देहलीसे भेजा था समझना चाहिये । हो सकता है कि उनका वह सत्योदयके हालके अंक नं०७-८ में मुद्रित मल कारण लोकानुरंजन हो और उसके द्वारा हुआ है। इस पत्रमें ब्रह्मचारीजीने सेठीजीके ही अपने सम्मानकी रक्षा की जाती हो । . . . जैनधर्मविषयक ज्ञानके प्रति अपने जो विचार ६-विशेष युद्धकी तय्यारी । प्रकट किये हैं और उनकी पुत्रकि विवाहसम्बंध बम्बईमें दि० जैन तीर्थक्षेत्र कमेटीकी स्पेशल पर जिस सम्मतिका इजहार किया है उस - सबको हम अपने पाठकोंके अवलोकनार्थ नीचे " मीटिंग हो गई । इसमें दूर दूरसे समाजके बहुतसे कर्णधार पधारे थे, जिनका मिशन उद्धृत करते हैं: तीर्थोकी रक्षा पर विचार करना था। विचार आप जैनसिद्धान्तके मर्मको जाननेवाले गया और उसमें किसीको भी यडके सिवाय हैं तथा जीवन कैसे सार्थक करना इस बातसे रक्षाका कोई दूसरा उपाय सूझ नहीं पड़ा ! भी पूर्ण विज्ञ हैं । मैं आपको किसी प्रकारकी बल्कि मीटिंगका यही निष्कर्ष निकला कि शिक्षा देने का पात्र अपनेको नहीं समझता हूँ।” अभी तक धनाभावके कारखा काफी यद्ध नहीं ____“ आपने जो अपनी पुत्रीका विवाह एक हो सका और विना पूर्ण युद्धके सफल मनोरथ एमड़ व्याक्ति के साथ किया, सो भी जैनपद्धतिके होना असंभव है, अतः श्वेताम्बरोंके साथ विशेष अनुसार, (वह) किसी भी तरह जैनशास्त्रके युद्ध करने के लिये, प्रचुर धन एकत्र होना चाहिये । विरुद्ध नहीं है । जैन जाति ८४ जातियोंमें विभक्त कमेटीने फिलहाल सिर्फ २० लाख रुपयेका होकर अपनी २ जातिमें योग्य सम्बंध न फंड एकत्र करनेका प्रस्ताव पास किया है ! पाकर जो धीरे धीरे नष्ट हो रही है उसकी जब दिगम्बरोंमें २० लाख रुपया एकत्र होगा रक्षाके उपायका एक नमूना आपने पेश किया तब श्वेताम्बरोंमें चालीस लाख रुपया इकट्ठा हो है । मेरी अन्तःकरणकी भावना है कि जैसे जाना कोई बड़ी बात नहीं है । इससे ऐसे जयपुरके पं0 जयचंद, टोडरमल, दौलतराम, लक्षण पाये जाते हैं कि अब जैनसमाजमें सदासुख आदिने जैन जातिका उपकार किया युद्धकी आग और भी ज्यादह भड़केगी और है उससे कहीं अधिक उपकार आपकी आत्मा अपना वह उग्ररूप धारण करेगी, जिसमें जैनितथा मन वचन कायके द्वारा संपादन हो योंकी रही सही शांति सब नष्ट हो जायगी, तथा आपके द्वारा जैनधर्म व उसका अहिंसा और ये लोग घरू झगडामें अपनी शक्तिके तत्त्व जगतमें विस्तरै ।" दुरुपयोग द्वारा न कुछ देशके काम आ सकेंगे ब्रह्मचारीजीके इन प्राइवेट तथा अन्तरिक और न अपना ही भला कर सकेंगे । नहीं For Personal & Private Use Only Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्क १०-११] विविध प्रसङ्ग। ३४३ मालूम ऐसे लोगोंको कब सद्बुद्धिकी प्राप्ति होगी कि वह श्रीसमंतभद्रादि मुनिश्रेष्ठोंकी हँसी और कब वह दिन आयगा जब ये लोग महा- उड़ाता और उनके वचनों पर कुठाराघात वीर भगवानके शासनका रहस्य समझकर उसके करता है। जो निष्पक्ष विद्वान जैनहितैषीको अनुयायी बनेंगे और इस प्रकार व्यर्थके झगड़ोंसे पढ़ते हैं अथवा जिनमें कुछ भी विवेक अवशिष्ट मुक्ति प्राप्त करेंगे। है वे हितैषीके संपादकीय लेखोंको देखकर कह सकते हैं कि तर्कतीर्थजीने जो इलजाम लगाया ७-शूद्रमुक्ति । सहयोगी पद्मावती पुरवालके संपादक पं० __है वह बिलकुल उनका 'सफेद झूठ' है और गजाधरलालजी न्यायतीर्थ, स्त्रीमुक्ति पर विचार - उसमें कुछ भी सार नहीं है । जान पड़ता है करते हुए, अपने गतांकमें लिखते हैं कि, विदेह __पंडितजी जोशतीर्थमें कुछ ऐसे डूबे हैं कि उन्हें अच्छे बुरे तथा हेयादेयकी कुछ भी क्षेत्रके शूद्रतक मोक्षके अधिकारी हैं। इससे तमीज नहीं रही । जो हृदय स्वामी समंतभद्र ऐसा पाया जाता है कि आप शास्त्रानुसार शूद्र जैसे आचार्योंके प्रति अपनी गाढ भाक्ति पर्यायसे मुक्तिका होना मानते हैं, परंतु वह भरत रखता है, उनके नामका नित्य स्मरण क्षेत्रमें नहीं। विदेह क्षेत्रमें भरतक्षेत्रके शूद्रोंकी करता है और उनकी कृतियोंको बड़ी पूज्य पर्याय, चाहे वे चतुर्थ कालवी ही क्यों न हो, दृष्टिसे देखता है, जिसने उनकी कृतिके रूपमे उन्हें वह अधिकार प्रदान नहीं करती। अच्छा ‘देवागम' नामके मंगलाचरणविशिष्ट गंधहस्तिहोता यदि संपादक महाशय उन शास्त्रीय प्रमा महाभाष्य' का नाम सुनकर एक बार यह णोंको भी साथमें उद्धृत कर देते जिनके आधार प्रतिज्ञा की थी कि यदि वह महान् ग्रंथ उसे पर उन्होंने ऐसा लिखा है । इससे पाठकोंको बहुत उपलब्ध हो जाय तो वह उसके अध्ययन, मनन कुछ संतोष होता और विद्वानोंको उस पर और प्रचारमें अपना जीवन व्यतीत करेगा, उस विचार करनेका अवसर मिलता। पर ऐसे इलजामका लगाया जाना निःसन्देह ८-सफेद झूठ। असहनीय है । हमें तर्कतीर्थजीके सारे लेखको हालके पद्मावती पुरवाल अंक नं. ३ में पढ़कर उतना दुःख और खेद नहीं हुआ जितना 'विचित्र समाचारकी विरसता' नामका एक लेख कि उनके इस मिथ्या दोषारोपणसे हुआ। हमारे पंडित झम्मनलालजी तर्कतीर्थकी ओरसे प्रका- चित्तको इससे बहुत आघात पहुँचा है। हमारा शित हुआ है । यह लेख कषायसे कितना लबा- दृढविश्वास है कि स्वामी समन्तभद्रके प्रति हम लब भरा हुआ है, कितना पक्षापातपूर्ण है, अभीतक जितना पूज्यभाव रखते हैं उसकी सभ्यताका इसमें कितना खून किया गया है, कल्पना भी तर्कतीर्थजी नहीं कर सकते । सबको एक लाठीसे हाँक कर कितना 'वाहीतवाही' और इस लिये हम, बातको अधिक न बढ़ाकर बका गया है और कितनी झूठी, ऊटपटाँग तथा तीथजीसे इस समय सिर्फ इतना ही निवेदन बेसिर पैरकी बातें लिखी गई हैं उन सबको करते हैं कि वे हमारे उन वाक्योंको प्रकट करें यहाँ पर बतलानेकी जरूरत नहीं है । यहाँ हम जिनमें समंतभद्रस्वामीकी हँसी उड़ाई गई है और अपने पाठकों पर सिर्फ इतना ही प्रकट करना उनके वचनों पर कुठाराघात किया गया है। चाहते हैं कि इस लेखमें जैनहितैषीके संपादक यदि वे ऐसा प्रकट करनेमें असमर्थ हैं तो उन्हें पर यह बिलकुल झूठा कलंक लगाया गया है अपनी इस महती भूल पर पश्चात्ताप करना For Personal & Private Use Only Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४४ ... जैनहितैषी [भाग १४ wwwnwar चाहिये और बन सके तो कुछ प्रायाश्चत्त लेना रायमें विद्वानों, खासकर स्वप्नशास्त्रियोंको संपादकचाहिये, तभी उनके आत्माकी इस गुरुतर पापसे जीकी इस पुकार पर अवश्य ध्यान देना चाहिये शुद्धि हो सकेगी। ___ और दया करके उनके स्वमका फल बतलाते हुए ' अन्तमें हम पद्मावती पुरवालके संपादक तथा उनके चित्तका समाधान करना चाहिये। प्रकाशक दोनों महाशयोंसे निवेदन करते हैं कि वे ऐसे लेखोंको जरा सोच समझकर निकाला १०-विरुद्धप्रतीति। । करें, उनपर भी कुछ जिम्मेदारी है; केवल जैसे जैनहितैषीके गतांकमें : जगतकी रचना तैसे लेखोंको अँधाधुंध प्रकाशित कर देना कोई और उसका प्रबंध ' नामका जो लेख बाबू बरादुरीका काम नहीं है, बल्कि यह बात सूरजभानजी वकीलका लिखा हुआ छपा है संपादकीय धर्मके विरुद्ध है । ऐसे मिथ्या और जिसमें ईश्वरके जगतकर्तृत्वका निषेध असभ्य और ऊटपटाँग लेखोंसे उनके पत्रका किया गया है उसे हिन्दी जैनगजटके वयोवृद्ध कुछ भी गौरव नहीं रह सकता, और न समाजमें संपादक पं० रघुनाथदासजी 'विरुद्ध ' लिखते अशांति फैलनेके सिवाय दूसरा कोई नतीजा निकल सकता है । आप लोग जैसे विद्वान हैं । हैं ! जान पड़ता है उन्हें ऐसा ही प्रतीत हुआ है। न्यायतीर्थ और काव्यतीर्थ हैं-अपना पत्र भी परंतु मालूम नहीं उनकी इस विरुद्धप्रतीतिका आपको वैसे ही ऊँचे आदर्शपर रखना चाहिये। कारण क्या है । कहीं बाबूसूरजभानजीका विपक्षियों की बातोंका उत्तर आपके पत्र में बडी नाम ही तो उसका कारण नहीं ? अथवा ऐसा ही अँचीतुली और संयत भाषामें निकलना ता नहीं कि साधारण PL तो नहीं कि साधारण जैनजनताकी परणति • चाहिये । इससे आपके पत्रका गौरव बढ़ेगा . कर्तृत्ववादकी ओर झुकी हुई देखकर तथा क और समाजको भी उससे विशेष लाभ पहुँचेगा। लोगोंके व्यवहारोंको उसके अनुकूल पाकर पंडितजी भी कर्तृत्ववादको पसंद करते हों ~ ९ संपादक जैनगजटका स्वप्न। और इस लिये ऐसा लिखकर उसका विधान हालमें हिन्दी जैनगजटके संपादक पं . करनेके लिये तय्यार हुए हों। कुछ भी हो, विना नाथदासजीको, अमावस्याकी मध्यरात्रिके समय किसी विशेष बातका उल्लेख किये, साधारण जब कि उनकी प्रकृति अस्वस्थ थी, एक स्वप्न तौर पर संपूर्ण लेखके विषयमें ऐसा लिख देना हुआ है जिसमें उन्होंने देखा है कि जैनहितैषी समाजमें बहुत कुछ भ्रम पैदा करेगा, और दिगम्बर मतसे श्वेताम्बर मतको अधिक महत्त्व लोगोंको संपादकजीकी नीतिके समझनेमें बहुत दे रहा है और साथ ही जैनधर्मके विरुद्ध लेख कठिनाई होगी। आपने प्रेमीजीके लेखोंको भी लिखकर जैनसमाजका अहित कर रहा है ! इस विरुद्ध लिखा है, जिनमें हरिषेणकृत कथाकोश, आश्चर्यजनक और अभतपूर्व घटनाको देखकर श्रीअमृतचंद्रसूरि, लायब्रेरी, और प्राचीनग्रंथोंका सम्पादकमहाशय सहसा चकित हो उठे हैं और संग्रह नामके लेख शामिल हैं ! परंतु कुशल आपने विद्वन्मंडलीसे इस बातकी पुकार की है हो गई कि इस संयुक्तांकके संपादकीय लेखोंके कि वह सूक्ष्मदृष्टिसे उनके इस स्वप्न की जाँच मस्तक पर आपने विरुद्धताका कलंक नहीं करे; क्योंकि स्थल दृष्टि से हितैषीके सम्बंधमें लगाया। उन्हें ऐसा कुछ भी मालूम नहीं होता। हमारी For Personal & Private Use Only Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हिन्दीके नये और अपूर्व ग्रन्थ । जीवन निर्वाह । पुष्प-लता। लेखक, श्रीयुत बाबू सूरजभानुजी वकील । बड़ी हिन्दीमें एक नये लेखककी लिखी हुई अपूर्व खोज और चिरकालके अनुभवसे लिखा हुआ अपूर्व गल्यें। प्रत्येक गल्ल मनोरंजक शिक्षाप्रद और भाव. ग्रन्थ । प्रत्येक धर्मात्मा. प्रत्येक विचारक, प्रत्येक पूर्ण है। सभी गये स्वतंत्र हैं और हिन्दीसाहित्यके सुधारक और प्रत्येक सुख-शान्तिके चाहनेवालेके पढ़- लिए गौरवकी चीजें हैं। जो लोग अनुवाद ग्रन्थोंसे नेकी चीज । घरघरमें इसका पाठ होना चाहिए। अरुचि रखते हैं उन्हें यह मौलिक गल्पग्रन्थ अवश्य तमाम बच्चों और स्त्रियोंको इसका स्वाध्याय करा देना पढना चाहिए । ७-८ चित्रोंसे पुस्तक और भी सुन्दर चाहिए। भाषा ऐसी सरल है और समझानेका ढंग हो गई है। हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीजका यह ऐसा अच्छा है कि साधारण पढ़े लिखे लोग भी इसे ४१ वाँ ग्रन्थ है। मूल्य १) सजिल्दका १॥) समझ सकेंगे। जैनी और अजैनी सभी इससे लाभ आनन्दकी पगडंडियाँ । उठा सकते हैं । इसके पढ़नेसे लोग असली धर्मका, • सच्चे सदाचारका और सच्ची देशोन्नतिका स्वरूप जेम्स एलेन अंगरेजीके बड़े ही प्रसिद्ध आध्यात्मिक समझ सकेंगे । देवमूढता, लोकमूढता और गुरुमूढ़- लखक है। उनक ग्रन्थ बड़ हा म लेखक हैं। उनके ग्रन्थ बड़े ही मार्मिक और शान्तिताका स्वरूप दर्पणके समान स्पष्ट हो जायगा । धार्मिक प्रद गिने जाते हैं। अगरेजीमें उनका बड़ा मान है । और साम्प्रदायिक झगड़ोंसे. अन्धश्रद्धासे. झठे तंत्र- यह ग्रन्थ उन्हीं के Byways of Blessedness' मंत्रों और भूतप्रेतोंके विश्वासोंसे तबीयत हट जायगी। नामक ग्रन्थका अनुवाद है। पिछले अंकमें इस ग्रन्थका -सचे धर्म, सच्ची दानशीलता, सच्चे सदाचार. और 'सहानुभूति' शीर्षक अध्याय उद्धृत किया गया था, • सच्चे ज्ञानसे हार्दिक प्रीति उत्पन्न हो जायगी । जो उससे पाठक इस ग्रन्थके महत्त्वको समझ सकेंगे। धर्म लड़ाई झगड़ोंकी, पापोंकी और देशको डुबानेकी प्रत्येक विवेकी और विचारशील पुरुषको यह ग्रन्थ जड़ बन रहे हैं, उनका असली स्वरूप खूब अच्छी पढ़ना चाहिए । मूल्य १J सजिल्दका १॥] तरह समझमें आ जायगा । एक धर्मात्मा सज्जनने सुखदास । इसकी ५०० प्रतियाँ खरीदकर अपने भानजेके विवा जार्ज इलियटके सुप्रसिद्ध उपन्यास 'साइलस्.. होत्सवमें मुफ्त वितरण की हैं। अन्य धर्मात्माओंको माइनर' का हिन्दी रूपान्तर । इस पुस्तकको हिन्दीके भी इसका प्रचार करना चाहिए । बाँटनेके लिए कमसे लब्धपतित उपन्यासलखक श्रीयुत प्रेमचन्दजीने कम १०० प्रतियाँ एक साथ लेनेसे बहुत किफायतसे दी जायँगी । मूल्य एक प्रतिका एक रुपया । पृष्ठ-_ लिखा है। बढ़िया एण्टिक पेपर पर बड़ी ही सुन्दरतासे -संख्या २०० से ऊपर । छपाया गया है । उपन्यास बहुत ही अच्छा और है भावपूर्ण है । मूल्य ॥ महादजी ( माधवराव ) सिन्धिया। हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीजका ४२ वाँ ग्रन्थ । नकली और असली धर्मात्मा। इतिहासका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ । यदि आप यह जानना श्रीयुत बाबू सूरजभानुजी वकीलका लिखा हुआ चाहते हों कि मुगलसाम्राज्यका अस्त कैसे हुआ - सर्वसाधारणोपयोगी सरल उपन्यास । और उनके हाथसे मराठोंके हाथमें राज्यसत्ता आकर ढोंगियोंकी बड़ी पोल खोली गई है। अन्तमें अँगरेजोंके हाथमें कैसे चली गई तो यह ग्रन्थ मूल्य ॥) अवश्य पढ़िए । सिन्धियाकी गणना देशके महान् पुरुषों में है। यदि महादजी सिन्धिया थोड़े ही दिन नया सूचीपत्र। . और जीते, अथवा उनका उत्तराधिकारी उन ही जैसा उत्तमोत्तम हिन्दी पुस्तकोंका ९२ पृष्ठोंका नया योग्य पुरुष होता तो आज हिंदुस्तानके इतिहासका सूचीपत्र छपकर तैयार है । पुस्तक-प्रेमियों को उसकी रूप कुछ और ही होता । इस मराठासाम्राज्यके एक एक कापी मँगाकर रखना चाहिए। । स्तंभस्वरूप वीरपुङ्गवका आलोचनात्मक चरित्र ___ मैनेजर, हिन्दी-ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, हिन्दीमें सबसे पहला यही है । मूल्य १) हीराबाग, पो० गिरगाँव, बम्बई । For Personal & Private Use Only Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनीहतैषी / Reg. 719. B. जैनसाहित्य-संशोधक डाँकखानका नया नियम / अपूर्व त्रैमासिक पत्र / अब डांकखानेके नये नियमके अनुसार और इतिहास और जैनसाहित्यके जिज्ञासुओंके अनरजिस्टर्ड वी० पी० नहीं जा सकेंगे, सब का लिए अपूर्व साधन / यह रैमासिक पत्र सरस्वतीके / * पी० रजिस्टर्ड ही लिये जावेंगे / अर्थात् पुस्तकक साइजके सवासौ पृष्ठों पर विकलता है। अनेक ऐतिहासिक चित्रोंसे भी सुशोभित रहता है / अंगरेजी. प्रत्येक पाकेट पर अभी जो पोस्टेज और म. हिन्दी और गुजराती इन तीनों भाषाओके तेच आ० चार्ज लगता था उसके सिवाय दो आने इसमें रहते हैं / प्राचीन आचार्यों का समय-नि. , और भी अधिक लगा करेंगे / पुस्तक चाहे चार अपर्व तथा दुष्प्राप्य जैनग्रन्थों, शिलालेखों तथा त - आनेकीही हो तो भी उसपर म० आ. और पत्रोंका परिचय, विदेशी विद्वानोंकी जैनसाटिन और इतिहाससम्बन्धी आलोचनायें. जैनतत्त्वज्ञा . पोस्टेजके सिताय ये दो आने भी अवश्य लगेंगे। सम्बन्धी गंभीर विचार आदि अनेक विषय इसन इस लिए ग्राहक महाशयोंको चाहिए कि वे रहते हैं और वे बड़ी निष्पक्षतासे लिखे जात है। पस्तकोंका आर्डर भेजते समय इस खर्चका विचार जैन और जैनेतर सभी विद्वान् इसमें लिखते हैं। प्रत्येक दिगम्बर और श्वेताम्बर दुगका ग्राहे अवश्य कर लेवें / एक रुपयसे कमका वी० पी० चाहिए / दूसरा अंक शंघ्री नेकलने वाला / हम अब नहीं भेजते / कमका आर्डर हो तो वार्षिक मूल्य 5) पांच रुपया और एक अंकका टिकट आदि भेज देने चाहिए। पोस्टेज जुदा / व्यवस्थापकजैनसाहित्य-संशोधक, जैनहितैषीका मूल्य अन् म; आ० से ही C/o भारत जैनविद्यालय, फर्गुसनकालेजरोड, पुन: भेजने में लाभ हैं। वी० पी० मंगानेसे नाहक दो __ आने अधिक पड़ेंगे। युक्त्यनुशासन सटीक / माणिकचन्द्र जैनग्रन्थमालाका 15 वाँ ग्रन्थ - -मैनेजर / कर तैयार हो गया। इसके मूलका भगवान् समानभद्र और संस्कृतटीकाके कर्ता आचार्य विद्यानन्द है। यह भी देवागमकी भाँति स्तुत्यात्मक है और पुछि - बम्बईका माल / योंका भाण्डार है / अभी तक यह ग्रन्थ दुई / प्रत्येक भण्डारमें इसकी एक एक प्रति अवश्य रहब सब तरह / माल--कृपः, किराना, चाहिए / मूल्य ) स्टेशनरी, पीतल ताँबा, दाइयाँ, तेल, साबुन नयचक संग्रह। आदि-हमसे मँगाइए / माल दश जगह जाँच यह उक्त ग्रन्धमालाका 16 बौद / देवसेनसूरिकृत प्राकृत नयचक्र ( संस्कृतछायासहित / करके बहुत सावधानी और ईमानदारीके साथ और आलापपद्धति तथा माइल्ल धवलकृत द्रव्यस्वभाव भेजा जाता है / चौथाई रुपयेके लगभग पेशगी प्रकाश (छायासहित) ये तीन ग्रन्थ छपे हैं। . भूमिका पढ़ने योग्य है / लगभग एक महीने में भेजना चाहिये / एकबार व्यवहार करके देखिए / सैयार होगा / मू०॥ नन्हेलाल हेमचन्द जैन, कमीशन एजेण्ट, मैनेजर, जैनग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, बम्बई। चन्दाबाड़ी, पो. गिरगाँव, बम्बई / Printed by Chintaman Sakharam Deols. at the Bombay Vaibhay Press, Servants of India Society's Building andhurst Road, Girgaon, Bombay Published by Nathuram Premi, Proprietor, Jain-Granth-Ratnakar Karyalaya, Hir az, Bombay. 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