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________________ ३२८ 'जैनहितैषी [भाग १४ अनंतकाय हो दूसरे देशमें वह अनंतकाय न हमारी शिक्षा-संस्थाएँ। हो, अथवा उसका एक भेद अनंतकाय हो और दूसरा अनंतकाय न हो। इन सब बातोंकी विद्वानोंको अच्छी तरह जाँच करनी चाहिये और जाँचके द्वारा जैनागमका स्पष्ट व्यवहार (लेखक, श्रीयुक्त बाबूलालजी मास्टर।) लोगोंको बतलाना चाहिये। इस बातके बतलानेकी जरूरत नहीं कि जैन... ___ ऊपरकी कसौटीसे दो एक कंदमूलोंकी जो समाजने शिक्षाको अपनी उन्नतिका साधन समझ सरसरी जाँच की गई है उसे भी हम आज अपने उसके प्रचारकी ओर ध्यान दिया है, जिसके पाठकोंके सामने रखते हैं और आशा करते फलस्वरूप अकेले दिगम्बर सम्प्रदायकी ही हैं कि विद्वान् लोग उन पर विचार करके २०-२५ वर्षमें अनेक शिक्षासंस्थाएँ नजर आने : अपनी सम्मति प्रकट करेंगेः१-हमारे इधर अदरक बहुत तंतुविशिष्ट लगी हैं । इन संस्थाओंसे प्रतिवर्ष अनेक शास्त्री, होता है। तोड़ने पर वह समभंग रूपसे नहीं टूटता, तीर्थ, विशारद तैयार हो रहे हैं, संस्कृत न्याय ऊँचा नीचा रहता है और बीचमें तंतु खड़े रहते व्याकरण साहित्य और धर्मशास्त्रोंके विद्वानोंकी हैं । छाल भी उसकी मोटी नहीं होती। ऐसी संख्या सैकड़ोंपर पहुंच चुकी है और अब वह हालतम वह अनंतकाय नहीं ठहरता । बम्बईकी समय दूर नहीं है कि जब, हमारे कतिपय तरफका अदरक हमने नहीं देखा, परंत उसकी विद्वान् नेताओंकी इच्छापूर्तिस्वरूप, जैनसं-- जो सोंठ इधर आती है वह 'मैदा सोंठ' कहलाती स्थाओंमें संस्कृत व्याकरणादि पढ़ानेके लिये . है और उसके मध्यमें प्रायः वैसे तंतु नहीं होते, अजैन विद्वानोंको न ढूँढ़ना पड़ेगा । परंतु यह इस लिये संभव है कि वह अनंतकाय हो। सब होते हुए भी समाजको शिक्षाविषयक वास्त___२-गाजर भी अक्सर तोड़ने पर समभंग रूपसे विक संतोष नहीं हुआ, और यदि इन संस्थानहीं टूटती और न उसकी छाल मोटी होती है। इस लिये वह भी अनंतकाय मालम नहीं होती। ऑकी कार्यप्रणाली ऐसी ही बनी रही तो भविष्य____३-मूलीकी छाल मोटी होती है और इस में भी उक्त संतोषकी आशा करना व्यर्थ है। लिये उसे अनंतकाय कहना चाहिये । परंतु थोडा भी समय विचार करनेमें लगानेसे छालको उतार डालने पर मूलीका जो भीतरका विदित हो जायगा कि समाजने शिक्षाकी साधनभाग प्रकट होता है उसकी शिराएँ, रग रेशे रश स्वरूप संस्थाओंको स्थापित कर उनमें लक्षावधि अच्छी तरहसे दिखाई देने लगते हैं, तोड़ने पर । रुपया खर्च करके जो शिक्षाप्रचारका कार्य वह समभंग रूपसे भी नहीं टूटता। ऐसी हालतमें। संभव है कि मूलीका भीतरी भाग अनंतकाय न हो । । । किया है वह औरोंकी अपेक्षा बहुत ही कम है, . ४-आलूका ऊपरका छिलका बहुत पतला इतना ही नहीं, किंतु इन संस्थाओंद्वारा जो पंडित होता है। अतः वह अनंतकाय न होना चाहिये। तय्यार हुए हैं वे प्रायः वर्तमान समयसे हजार विद्वानोंको चाहिये कि वे भी इसी तरह आठौ वर्ष पहलेके युगमें विचरण करनेवाले कंद-मूलादिककी जाच करें और फिर उसके व्यक्ति हैं । इन विचारोंको, अन्य देशोंकी कौन नतीजेसे हमें सचित करनेकी कृपा करें। हम कहे, स्वदेशके ही हुए और होनेवाले परिवर्तनोंका भी इनकी विशेष जाँच करेंगे और साथ ही ज्ञान नहीं, उनके हृदयकमलमें इतिहास, गणित, दूसरे कंदमूलोंकी भी जाँचका यत्न करेंगे। विज्ञान, समाजनीति, अर्थनीति, स्वास्थ्य आदि आवश्यकीय विषयोंकी वायु भी नहीं लगी। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522883
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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