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________________ जैनहितैषी [भाग १४ करते हैं। यदि कभी किसीके कहनेसे उन्हें माननवालाक मुँहसे यही उपदेश सुननेको संस्थामें किसी प्रकारकी त्रुटि स्वीकार मिलते हैं कि “भाई मिथ्यात्विंयोकी बातोंमें करनी पड़ती है तो उसका कारण वे धनामाव क्या धरा है, अपनेसे जो बने सो करो, इस पंचम बतलाकर दोषमुक्त हो जाते हैं। इन संस्था- कालमें उन्नतिकी आशा करना व्यर्थ है।" आदि ओंमें पारस्परिक सम्बन्ध न होनेसे एक बड़ी हानि अपने गरुओंके ऐसे वचनामृतोंसे हमारी हार्दिक यह हो रही है कि इनमें काम करनेके लिये योग्य संकीर्णता सदैव बलवती बनी रहती है । अभी बहुत व्यक्ति व पढ़ने के लिये योग्य छात्र नहीं मिलते। जिन । दिन नहीं हुए कि एक पाठशालामें व्यापारिक कहीं कहीं तो साल भरमें तीन तीन चार AST चार शिक्षा दिलाने के पक्षपाती अजैन पंचकी सम्मति चार पाठकोंका परिवर्तन हो जाता है । पाठ्य मानकर कार्य करनेकी तैयारी देख हमारे एक ग्रन्थोंका यह हाल है कि शालाके प्रारम्भसे जारी बाबाजीको यह चिंता हो गई थी कि कहीं हुए ग्रंथ हानिलाभ पर ध्यान दिये बिना अबतक ऐसा न हो कि ऐसी सलाह देनेवाले महाशयके पढ़ाये जा रहे हैं और कहीं कहीं सालमें एक ही फेरमें पड़कर गरीबिनी पाठशालाके माथे जैनविषयके तीन तीन ग्रंथोंका परिवर्तन हो जाता है। पाठशालाके बदले महाजनी पाठशालाके कुनाप्रबंधका विचित्र ही हाल है । शुद्धाम्नायियोंकी मका धब्बा लग जावे । इसी आशंकासे विशुद्ध संस्थाओंकी.प्रबंधकारिणी सभाओं में अजै- शंकित हो आपने खूब उछल कूद मचाई, जिससे नौका चुनाव ही नहीं होता; यदि भलसे किसी फल वही हुआ जो हाना चाहिये था, अर्थात् अभागिनी संस्था में हो भी जावे तो लोग उसकी अजैन पंचोंने उस पाठशालाके काममें योग सम्मतिमात्र सुनते हैं, उसके अनकल कार्य करने- देना बंद कर दिया और पाठशाला उनकी में उन्हें सदैव संस्थाके मिथ्यत्विनी बननेका संगतिसे बढ़नेवाले परिग्रहके पापसे बच गई ! डर लगा रहता है। अजैन पंचने पाठ्य ग्रंथ, हमारी रायमें समाजको अब अपने इन कुप्रबंध, पाठककी नियुक्ति, पृथक्त्व आदिके विष- संस्कारोंको दूर कर देना चाहिये। यमें कितनी ही अच्छी सलाह क्यों न दी हो, उसे अपने धनिक भाईयोंकी सम्पत्तिक वह अपनी सम्मतिके अनुकूल नि.स्वार्थ भावसे रक्षणार्थ और निर्धनोंकी सुखसाध्य जीविका काम करनेको कितना ही तैयार क्यों न हो जावे, बनानेके लिये व्यापारिक विद्यालय खोलने में परंतु अजैनोंको मिथ्यात्वकी ही मूर्ति समझने- बिलम्ब न करना चाहिये । देशमें निर्धनताकी वाले हमारे जैनीभाई अपने इस पंचकी बात बाढ़ जोरों पर है, महँगाई मुँह फाड़े गरीबोंकी पर चलनेका साहस नहीं कर सकते। “समय ओर बढ़ रही है, जैनसमाजमें गरीबोंकी संख्या क्या बतला रहा है, हमारे पड़ोसी अपनी अपनी भी कम नहीं है, इससे अब शिक्षाकार्यको उन्नतिके लिये क्या क्या कर रहे हैं, उन्नतिपथमें बड़ी सावधानताके साथ चलानेका समय है। दूसरी जातियों तथा धर्मोंवाले हमसे कितने दुःखकी बात है कि अपने धनिक भाईयोंके आगे बढ़ रहे हैं" इन बातोंको अब्बल तो, सबे- यहाँ मुनीम मुख्तारगारीके सैकड़ों स्थान रेसे आधी राततक व्यापार धंधों में फंस रहनेके खाली होने पर भी इन पदों पर काम काम करनेकी कारण, हमें जाननेकी फुरसत ही नहीं मिलती, योग्यता न रखनेसे तथा नाना प्रकारके व्यापारोंदूसरे हमें सदैव अपनेको साधुओंके स्थानापन्न को देखते हुए भी उद्योगधंधोंके ज्ञानसे शून्य Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522883
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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