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________________ अङ्क १०-११] नयचक्र और श्रीदेवसेनसूरि । ३०७ विशेषण लगाया गया है वह इसके दूसरे ग्रन्थको नाम दिये हैं उनमें प्राकृत नयचक्र भी है। बड़ा देखकर लगा दिया गया है। परंतु वास्त- अर्थात् उनके मतसे भी यह देवसेनकी ही वमें उसका नाम ' द्रव्यस्वभावप्रकाश' है और कृति है । उसके कर्ता 'माइल्ल धवल' हैं जैसा कि आगे सिद्ध किया गया है । इसलिये इसका नयचक्रके. ___ यह नयचक्र ( लघु ) बृहत् नयचक्र ( द्रव्यस्वभावप्रकाश ) मेंसे छाँटकर जुदा ही नामसे उल्लेख किया जाना चाहिए। निकाला हुआ नहीं है। यह बात इस ग्रंथको ___ श्वेतांबराचार्य यशोविजयजी उपाध्यायने आदिसे अंततक अच्छी तरह बाँच लेनेसे ही अपने 'द्रव्यगुणपर्यय रासा' (गुजराती) में ध्यानमें आ जाती है । यह संपूर्ण ग्रन्थ है और देवसेनके नयचक्रका कई जगह उल्लेख किया है स्वतंत्र है । यह इसकी रचना-पद्धतिसे ही और उक्त रासके आधारसे ही लिखे हुए 'द्रव्या- मालम हो जाता है। नयोंको छोडकर इसमें नुयोगतर्कणा' नामक संस्कृत ग्रन्थमें भी उक्त अन्य विषयोंका विचार भी नहीं किया गया है। उल्लेखोंका अनुवाद किया है । एक उल्लेख इसके अंतकी नं० ८६ और ८७ की गाथाओंसे इस प्रकार है: (पृष्ठ १९-२०) यह भी स्पष्ट हो जाता है " नयश्चोपनयाश्चैते तथा मूलनयावपि। कि इसका नाम नयचक्र ही है-उसके साथ इत्यमेव समादिष्टा नयचक्रेऽपि तत्कृता ॥ ८॥ कोई ‘लघ' आदि विशेषण नहीं है। एते नया उक्तलक्षणाश्च पुनरुपनयास्तथैव द्वौ मलनयावपि निश्चयेनेत्थममुना प्रकारेणैव नय- ३ बृहत् नयचक्र । इसका वास्तविक नाम चक्रेऽपि दिगम्बरदेवसेनकृते शास्त्रे नयचक्रेपि 'दव्वसहावपयास' ( द्रव्यस्वभाव-प्रकाश ). तत्कृता तस्य नयचक्रस्य कृता उत्पादकेन समा- यह 'द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र ' है । .. दिष्टं कथितं । एतावता दिगम्बरमतानगतनयचक्र ग्रंथकतोने स्वयं इस नामको ग्रंथके प्रारंभमें और ग्रन्थपाठपठितनयोपनयमलनयादिकं सर्वमपि अंतमें कई जगह व्यक्त किया है । नयचक्र तो सर्वज्ञप्रणीतसदागमोक्तयक्तियोजनासमानतंत्रत्वमे- इसका नाम हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वास्ते न किमपि विसंवादितयास्तीति ।" . नयोंके अतिरिक्त द्रव्य, गुण, पर्याय, दर्शन, ज्ञान, उक्त तर्कणा' में जो नयोंका स्वरूप दिया .... चारित्र आदि अन्य अनेक विषयोंका इसमें वर्णन , है, वह बिलकुल. नयचक्र' का अनुवाद है किया गया है । यह एक संग्रहग्रन्थ है ।। और इसे स्वयं ग्रन्थकर्ता भोजसागरने स्वीकार जिस तरह इसमें भगवत्कुंदकंदाचार्यकृत पंचाकिया है । इससे निश्चय हो जाता है कि उपा स्तिकाय प्रवचनसार आदिकी गाथाओंको और ध्याय यशोविजयजी और तर्कणाके कर्ता भोज उनके अभिप्रायोंको संग्रह किया गया है, उसी-. सागर इसी नयचक्रको देवसेनका रचा हुआ . तरह लग भग पूरे नयचक्रको भी इसमें शामिल कर लिया गया है। यहाँतक कि मंगलाचरणकी समझते थे। और अंतकी नयचक्रकी प्रशंसासूचक गाथायें दर्शनसारकी वचनिकाके कर्ता पं० शिवजी भी नहीं छोड़ी हैं। जान . पड़ता है कि नयचलालजीने देवसेनसूरिके बनाये जिन सब ग्रन्थोंके । क्रकी उक्त प्रशंसासुचक गाथाओंके कारण ही * देखो रायचंद्रशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित 'द्रव्या- लोगोंको भ्रम हो गया है और वे इसे 'बृहत् नुयोगतर्कणा' अध्याय ८ श्लोक ८ पृष्ठ ११५। न यचक्र' कहने लगे हैं। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522883
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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