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________________ - जैनहितैषी [भाग १४ अनेक अंशोंमें कर भी रही हैं, परन्तु जबतक उसने एककी भी न मानी और उपर्युक्त नाना --समाजमें बच्चोंसे लगाकर वृद्ध अवस्थातकके प्रकारकी शंकाओंसे परिपूर्ण एक पत्र न्यूयार्कसभी स्त्रीपुरुष शिक्षित न होंगे तब तक उन्नति पुस्तकालयविभागको लिखा और पूछा होना एक बड़ा ही विकट कार्य है । अभी हमारे कि पुस्तकालयको दान करना कहाँतक समाजमें ऐसे बहुसंख्यक स्त्रीपुरुष विद्यमान हैं आवश्यक और उपयुक्त है ? उसके पत्रका जिन्हें एक अक्षर भी पढ़ना लिखना नहीं आता। समाधानकारक उत्तर 'न्यूयार्क लायब्रेरीज' अब बतलाइये, ऐसी अवस्थामें, वे कहाँतक नामके मासिकपत्रके संपादकने पुस्तकालयअपनी संतानोंको शिक्षित बनानेके विचार विभागकी तरफसे निम्न प्रकार दिया है। इसी रखते होंगे । हमारे हुल्लड़ मचानेसे भले ही कुछ प्रकारके संदेह अनेक लोगोंके मनमें बारबार - बालक स्कूलोंकी प्रवेश कक्षाओंतक पढ़ा लिये उठा करते हैं । यह जानकर संपादक महोदयने जायँ, पर इतनेसे ही विद्यार्थी शिक्षित नहीं हो इस उत्तरको सर्वसाधारणरूप दिया है और • सकते । शिक्षाके लिये योग्य आचरण और यह संपूर्ण उत्तर पाठकोंके लिये 'लायब्रेरी बुद्धिके विकासकी आवश्यकता है और इसकी मिसेलेनी' से यहाँ उद्धृत किया जाता है,पति विना मातापिताके सुशिक्षित हुए कदापि संपादक महोदय लिखते हैं, कि किस प्रकाहो नहीं सकती । इन सब त्रुटियोंको दूर , र रके सार्वजनिक कार्यको सहायता करना चाहिए; करने और समाजके प्रत्येक स्त्रीपुरुषको शिक्षित इसका दृढ निश्चय करनेके लिये प्रत्येक कार्यके बनानेके लिये ग्राम ग्राम तथा नगर नगरमें भले बुरे स्वरूपका भलीभाँति अवलोकन करनेका । नूतन ढंगके सार्वजनिक जैन पुस्तकालयों हक्क दातारोंको है । उसमें अन्य लोगोंको अपने की और प्रान्तप्रान्तमें एक बृहत् ऐति स्वयं स्थिर किये मत बिलकुल सत्य हैं ऐसा हासिक ग्रंथसंग्रहालयकी बहुत बड़ी आवश्यकता है। कहनेका यद्यपि अधिकार नहीं है, तथापि “पुस्तकालयकी ही सहायता करें" यह जो अमेरिकाके एक श्रीमानकी इच्छा कोई भारी " हम आग्रह करते हैं, उसमें जितनी उपयुक्तता है - रकम अपने निवासस्थानके पुस्तकालयको दान वही दिखानेका हमारा विचार है । वह युक्ति• करनेकी हुई । उसके सलाहकारोंने उसके दिलमें अनेक संशय पैदा कर दिये। उन्होंने अनेक संस्थाएँ वाद इस प्रकार हैबतलाई । किसीने कहा अस्पतालमें दान करो- १--प्रथम यह ध्यानमें रखना चाहिए कि अर्थात् औषधदान दो, किसीने कहा देवालय पुस्तकोंके द्वारा मनके भीतर जो विचार, जितनी : बनवा दो; कोई कहने लगा अनाथालयको क्यों जितनी भावनाएँ और जिस जिस प्रकारके ध्येय • नहीं देते जिसमें आहार और अभयदानादि होते हैं, उनके योगसे मनुष्यजीवनमें परिवर्तन अनेक लोकोपकारी कार्य शामिल हैं, कुछ होते हुए, एक प्रकारकी जीवनशक्तिका संचार और लोगोंने पूछा कि यंगमेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन मानव-जीवनका जो विकास होता है वैसा प्रत्यक्ष आदि अनेक दानपात्र संस्थाओंके होने पर भी और स्थिर रहनेवाला परिणाम अन्य किसी कार्यके केवल पुस्तकालयको आप क्यों दान देते द्वारा नहीं होता । प्रत्यक्ष धर्मोका अस्तित्व हो ! इसप्रकारके अनेक प्रश्न उसके मित्र और भी वायबल, कुराण, वेद आदि धार्मिक ग्रंथों सलाहकार करते थे और उसे समझाते थे। परन्तु द्वारा ही है । मनुष्य जीवनका जितना भला या Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522883
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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