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________________ अङ्क १०-११] विविध प्रसङ्ग। ३४३ मालूम ऐसे लोगोंको कब सद्बुद्धिकी प्राप्ति होगी कि वह श्रीसमंतभद्रादि मुनिश्रेष्ठोंकी हँसी और कब वह दिन आयगा जब ये लोग महा- उड़ाता और उनके वचनों पर कुठाराघात वीर भगवानके शासनका रहस्य समझकर उसके करता है। जो निष्पक्ष विद्वान जैनहितैषीको अनुयायी बनेंगे और इस प्रकार व्यर्थके झगड़ोंसे पढ़ते हैं अथवा जिनमें कुछ भी विवेक अवशिष्ट मुक्ति प्राप्त करेंगे। है वे हितैषीके संपादकीय लेखोंको देखकर कह सकते हैं कि तर्कतीर्थजीने जो इलजाम लगाया ७-शूद्रमुक्ति । सहयोगी पद्मावती पुरवालके संपादक पं० __है वह बिलकुल उनका 'सफेद झूठ' है और गजाधरलालजी न्यायतीर्थ, स्त्रीमुक्ति पर विचार - उसमें कुछ भी सार नहीं है । जान पड़ता है करते हुए, अपने गतांकमें लिखते हैं कि, विदेह __पंडितजी जोशतीर्थमें कुछ ऐसे डूबे हैं कि उन्हें अच्छे बुरे तथा हेयादेयकी कुछ भी क्षेत्रके शूद्रतक मोक्षके अधिकारी हैं। इससे तमीज नहीं रही । जो हृदय स्वामी समंतभद्र ऐसा पाया जाता है कि आप शास्त्रानुसार शूद्र जैसे आचार्योंके प्रति अपनी गाढ भाक्ति पर्यायसे मुक्तिका होना मानते हैं, परंतु वह भरत रखता है, उनके नामका नित्य स्मरण क्षेत्रमें नहीं। विदेह क्षेत्रमें भरतक्षेत्रके शूद्रोंकी करता है और उनकी कृतियोंको बड़ी पूज्य पर्याय, चाहे वे चतुर्थ कालवी ही क्यों न हो, दृष्टिसे देखता है, जिसने उनकी कृतिके रूपमे उन्हें वह अधिकार प्रदान नहीं करती। अच्छा ‘देवागम' नामके मंगलाचरणविशिष्ट गंधहस्तिहोता यदि संपादक महाशय उन शास्त्रीय प्रमा महाभाष्य' का नाम सुनकर एक बार यह णोंको भी साथमें उद्धृत कर देते जिनके आधार प्रतिज्ञा की थी कि यदि वह महान् ग्रंथ उसे पर उन्होंने ऐसा लिखा है । इससे पाठकोंको बहुत उपलब्ध हो जाय तो वह उसके अध्ययन, मनन कुछ संतोष होता और विद्वानोंको उस पर और प्रचारमें अपना जीवन व्यतीत करेगा, उस विचार करनेका अवसर मिलता। पर ऐसे इलजामका लगाया जाना निःसन्देह ८-सफेद झूठ। असहनीय है । हमें तर्कतीर्थजीके सारे लेखको हालके पद्मावती पुरवाल अंक नं. ३ में पढ़कर उतना दुःख और खेद नहीं हुआ जितना 'विचित्र समाचारकी विरसता' नामका एक लेख कि उनके इस मिथ्या दोषारोपणसे हुआ। हमारे पंडित झम्मनलालजी तर्कतीर्थकी ओरसे प्रका- चित्तको इससे बहुत आघात पहुँचा है। हमारा शित हुआ है । यह लेख कषायसे कितना लबा- दृढविश्वास है कि स्वामी समन्तभद्रके प्रति हम लब भरा हुआ है, कितना पक्षापातपूर्ण है, अभीतक जितना पूज्यभाव रखते हैं उसकी सभ्यताका इसमें कितना खून किया गया है, कल्पना भी तर्कतीर्थजी नहीं कर सकते । सबको एक लाठीसे हाँक कर कितना 'वाहीतवाही' और इस लिये हम, बातको अधिक न बढ़ाकर बका गया है और कितनी झूठी, ऊटपटाँग तथा तीथजीसे इस समय सिर्फ इतना ही निवेदन बेसिर पैरकी बातें लिखी गई हैं उन सबको करते हैं कि वे हमारे उन वाक्योंको प्रकट करें यहाँ पर बतलानेकी जरूरत नहीं है । यहाँ हम जिनमें समंतभद्रस्वामीकी हँसी उड़ाई गई है और अपने पाठकों पर सिर्फ इतना ही प्रकट करना उनके वचनों पर कुठाराघात किया गया है। चाहते हैं कि इस लेखमें जैनहितैषीके संपादक यदि वे ऐसा प्रकट करनेमें असमर्थ हैं तो उन्हें पर यह बिलकुल झूठा कलंक लगाया गया है अपनी इस महती भूल पर पश्चात्ताप करना Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522883
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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