Book Title: Tulsi Prajna 1997 07
Author(s): Parmeshwar Solanki
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 73
________________ का ज्ञान प्राप्त कर सके । वैदिक दृष्टि में भी आत्मा अशरीरी ही नहीं वरन् अभौतिक भी है, अणु है। मस्तिष्क गत हृदय देश पुरी वत् त्रिविष्ठ पर बैठी है। सूक्ष्म शरीर इसे आवेष्ठित किए रहता है। जिन ज्ञानेन्द्रियों के साथ मन संयुक्त होता है, उसीउसी विषय का ज्ञान क्रमवत् होता है। भौतिक जड़ पुद्गल अमूर्त अभौतिक आत्मा से आकर्षित नहीं हो सकते, यह अवैज्ञानिक है । आकर्षण तो जड़ कणों पिण्डों में होता है जिसे न्यूटन ने विज्ञान जगत् को दिया जिसे गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitional force of attraction) कहते हैं । जो अभौतिक तत्वों पर नहीं होता है। अतः कर्म पुद्गल अभौतिक आत्मा पर न चिपकते हैं, न छोड़ जाते हैं। कर्म तो क्रिया है जो अपना प्रभाव आत्मा पर डालते हैं । इसे ही संस्कार कहते हैं जो इसी जन्म वा पुनर्जन्म में आत्मा से लगा रहता है । आयुर्वेद, ऐलोपैथी, मनोविज्ञान आदि नस-नाड़ियों के जाल शरीर की चीर फाड़ कर वा चित्रों से डॉक्टरों, वैद्यों आदि को दिखाते हैं। मानव रीढ़ के ८ चेतन केन्द्रआज्ञा चक्र से सब परिचित हैं। जड़ अकर्ता अभोक्ता है । जड़ परार्थ है, वह भोग्य है। चेतन आत्मा अन्ताद् तो जड़ उसका अन्त है। जड़ पुद्गल स्वयं नहीं चिपक सकते, न छोड़ सकते हैं फिर फल प्रदाता कैसे हो सकते हैं । परमात्मा ही सृष्टि कर्ता, कर्म फल प्रदाता है, स्वयं अभोक्ता साक्षी चेतन प्रलयकर्ता है । जड़ चेतन में स्वधर्म भेद है, अवस्था भेद नहीं है। जड़ में चेतन और चेतन में जड़ के गुण नहीं होते हैं। जड़ पुद्गल को स्वयं कर्मफल भोक्ता वा कर्मफल प्रदाता मानने पर स्वधर्म परिवर्तन होगा अर्थात् जड़ से चेतन या चेतन से जड़ उत्पन्न होगा। यह विचार अवैज्ञानिक अदार्शनिक है क्योंकि जड़ से जड़ बनता है, चेतन से चेतन जन्म लेता है। चेतन जड़ का भोक्ता है, जड़ चेतन का भोग्य है । यही योग दर्शन सूत्र (२-१८) कहता है-'भोगापवर्गार्थ दृश्यम्' कि सृष्टि जीव के भोगार्थ व उन्नति के लिए है । सृष्टि परार्थ है। परमात्मा की दूसरी काव्य कृति वेद है जैसा अथर्ववेद मंत्र (१०-८-३२) कहता है-देवस्य यश्य काव्यं न ममार न जीरयति । वेद ज्ञान शाश्वत् है, न कभी पुराना होता है, न कभी मरता है । परमात्मा ने मनुष्य के ज्ञान व्यवहार के लिए उसके जन्म के साथ ही दिए हैं । जैसा यजुर्वेद मंत्र (४०-८) कहता है कि परमात्मा अपनी जीव रूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है कि मानव जन्म ही से सत् कर्म व्यवहार कर सके। ___ अथर्ववेद मंत्र (८-२-२१) सृष्टि की आयु ४३२४१०° मानव वर्ष १ कल्प१००० चतुर्युग देता है । यही अवधि प्रलय की भी है। सूर्य सिद्धान्त सूत्र (१-२०) भी वही कहता है। युगों का अनुपात भी ४:३:२:१ देता है जिसके आधार पर कलि ४३२०००, द्वापर ८६४०००, त्रेता १२९६०००, सत् १७१८००० वर्ष होता है । चारों का योग भी १० कलि, ४३२०००० वर्ष होता है। जिसे महायुग या चतुर्युग कहते हैं । १ कल्प-१००० चतुर्युग । वर्तमान सृष्टि कल्प को श्वेत वाराह कल्प कहते हैं। इससे २३० तुलसी प्रशा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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