Book Title: Tulsi Prajna 1991 07 Author(s): Parmeshwar Solanki Publisher: Jain Vishva Bharati View full book textPage 5
________________ - तुलल्या पहा - खण्ड १७ अंक २ ...... जुलाई-सितम्बर, १९६१ अनुक्रमणिका पृष्ठ ५६ १. शत शत अभिवन्दन २. सम्पादकीय (हाथीगुंफा लेख की दो ओळियां) ३. ज्ञानप्रामाण्यविवेचन ४. आत्मा का वजन ५. आदमी बूढ़ा क्यों होता है ? ६. सप्तमी एकवचन की प्राचीन विभक्तियां ७. स्व० डॉ० काशीप्रसाद जायसवाल ८. शाश्वत यायावरी जैन श्रमणों की ६. क्या सामान्य केवली के लिए अर्हन्त पद उपयुक्त है ? १०. मधुकणिकाएं-"दृष्टांत-शतक री जोड़" ११. पुस्तक-समीक्षा mmu English Section 1. A Creative Genius : Shrimad Jayacharya 2. Equivalent views about Ultimate Reality 3. Rainy-seasons passed by Mahavira & Buddha 4. Angavijjā-A Prakrit text of antiquity 5. Jainism & Buddhism 6. Prosodial Practice of six Jaina Poets 7. Book-Review नोट-इस अंक में प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार लेखकों के हैं । यह आवश्यक नहीं है कि सम्पादक-मंडल अथवा संस्था को वे मान्य हों। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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