Book Title: Sramana 2003 01 Author(s): Shivprasad Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi View full book textPage 6
________________ २ : श्रमण, वर्ष ५४, अंक १-३/जनवरी-मार्च २००३ गैंडा, भैंसा, शूकर, सेही, वज्र, हरिण, छाग, तगरकुसुम (मत्स्य), कलश, कूर्म, उत्पल (नीलकमल), शङ्ख, सर्प और सिंहा उक्त में से चार तीर्थङ्करों- सातवें सुपार्श्वनाथ, आठवें चन्द्रप्रभ, ग्यारहवें श्रेयांसनाथ और तेइसवें पार्श्वनाथ का सम्बन्ध काशी और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों से है। सुपार्श्वनाथ- भगवान् सुपार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भद्रवनी क्षेत्र में हुआ था, जो सम्प्रति भदैनी मुहल्ले के नाम से जाना जाता है। इनके पिता का नाम महाराजा सुप्रतिष्ठ और माता का नाम पृथिवी देवी था। ये ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न हुए थे। चन्द्रप्रभ- भगवान् चन्द्रप्रभ का जन्म चन्द्रपुरी में हुआ था, जो वाराणसी से लगभग २५ किलोमीटर पूर्वोत्तर दिशा में गङ्गा नदी के किनारे सम्प्रति चन्द्रावती के नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता का नाम महासेन और माता का नाम लक्ष्मीमती (लक्ष्मणा) था। ये पौष कृष्णा एकादशी को अनुराधा नक्षत्र में पैदा हुए थे। श्रेयांसनाथ- भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म सिंहपुर या सिंहपुरी (वर्तमान सारनाथ) में हुआ था। इनके पिता का नाम विष्णु नरेन्द्र और माता का नाम वेणुदेवी . था। ये फाल्गुन शुक्ला एकादशी को श्रवण नक्षत्र में पैदा हुए थे। पार्श्वनाथ- भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर क्षेत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम महाराजा अश्वसेन और माता का नाम वर्मिला (वामादेवी) था। ये पौष कृष्णा एकादशी को विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न हुए थे। उपर्युक्त चार तीर्थङ्करों में से सपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ एवं श्रेयांसनाथ- ये तीन प्रागैतिहासिक काल के हैं, जबकि भगवान् पार्श्वनाथ ऐतिहासिक महापुरुष हैं।११ काशी जनपद में जन्मे उक्त चार तीर्थङ्करों में से ग्यारहवें भगवान् श्रेयांसनाथ का सम्बन्ध सिंहपुर अथवा सिंहपुरी से है, जो वर्तमान में सारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। विद्वानों के अनुसार सारनाथ नाम श्रेयांसनाथ से बिगड़कर बना है।१२ सम्प्रति सारनाथ विश्व पटल पर एक प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ के रूप में जाना जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि महात्मा बुद्ध बोधि-प्राप्ति के पश्चात् बोधगया से भ्रमण करते हुए अपने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं की खोज में सारनाथ स्थित ऋषिपत्तनमृगदाव में आये थे और यहीं कोण्डञ, बप्प, भद्दिय, महानाम और अस्सजि- इन पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश दिया था; किन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जैन-ग्रन्थों के अनुसार महात्मा बुद्ध का जैनधर्म से न केवल निकट का सम्बन्ध रहा है, अपितु वे वाराणसी के राजकुल में जन्मे ऐतिहासिक महापुरुष भगवान पार्श्वनाथ, जो जैनधर्म Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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