Book Title: Prakaran Sangraha
Author(s): Jaina Publishing Company
Publisher: Jaina Publishing Company
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________________ 4814014OISSES HOJP4INSI-AS-RDISIS-se-BIESenterS-CASIANE दौर्गत्यैकनिबन्धनं कृतमुगत्याश्लेषसंरोधनं, प्रोत्सर्पत्प्रधनं जिघृक्षति न तच्छीमानद धनम् // 25 // ॥हरिणीवृत्तम्.॥ परजनमनःपीमाक्रीमावनं वधनावना, नवनमवनिध्यापिव्यापबताघनमंडलम् / "कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरागलं, नियतमनुपादयं स्तेयं नृणां हितकांक्षिणाम् // 36 // ॥शार्दूलविक्रीमितम्. // . दरस्तन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मषीकूर्चक,चारित्रस्य जलाञ्जनिर्गुणगणारामस्य दावानमः / संकेतः सकलापदां शिवपुरघारे कपाटो दृढः, कामार्तस्त्यजति प्रबोधयति वा स्वस्त्रीं परस्त्रीं न यः // 37 // व्याघव्यालजलानलादिविपदस्तेषां व्रजन्ति क्य, कल्याणानि समुवसन्ति विबुधाः सानिध्यमध्यासते / कीर्तिः स्फूर्ति मियर्ति यात्युपचयं धर्मः प्रणश्यत्यचं, स्वनिर्वाणमुखानि संनिदधते ये शीलमाविञ॥रणा // मालिनोवृत्तम. // हरति कुलकलंक लुम्पते पापपंक, सुकृतमुपचिनोति श्लाघ्यतामातनोति / नमयति सुरवर्ग हन्ति उगोपसर्ग, रचयति शुचिशीलं स्वर्गमोती सलीलम् // ३ए / / eGANGJererSee ACCORDIBPCS-40-4eye ECCATE

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