Book Title: Nalayanam
Author(s): Yashovijay
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust

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Page 372
________________ ससमे स्कन्धे सर्गः४ दमयन्त्योविवादः॥ // 165 // RISHI TELHI-II NISITIES जजल्प सा चिरात् वाचं साचीकृतविलोचना / मनोहरपदन्यासस्पष्टप्रणयपूर्वकम् अद्यापि मम भाग्यानि मन्ये सन्ति कियन्त्यपि / यदेतावदपि प्रेम त्वदीयं मयि वर्त्तते // 10 // इत्थं गुप्तशरीरोऽपि दूरस्थोऽपि नरेश्वरः / परिक्षातो मयासि त्वं समाकृष्टश्च वर्तसे न संप्रत्यपि सुप्तास्मि न चात्रापि हि तद् वनम् / कुरुम्ब गमनोपायं कथं यास्यसि नैषध ! // 12 // अकुलीनां विरूपां वा विप्रियां वापि चेतसि | स्वामिन् ! दासीत्वमात्रेण मामङ्गीकर्तुमर्हसि // 13 // कुरुष्व नाथ ! कारुण्यं त्यज काठिन्यमीदृशम् / स्फुटीकुरु निजं रूपं मुश्च कुब्जत्वमात्मनः // 14 // क ते मन्मथजिगुपंक च कुब्जत्वमीदृशम् / क चान्यगृहभृत्यत्वं ? क सम्राट शतसेव्यता ? त्वयि प्रकटरूपेऽद्य सनाथो भूभृतां वरः / स्वयमेवेन्द्रसेनोऽपि कर्त्ता दिग्विजयश्रमम् इयं चरणयोर्देव ! प्रणतास्मि त्वदीययोः / प्रसीद पालय स्वामिन् ! विषीदन्तमिमं जनम् इति निर्भत्सना पूर्व प्रेमकारुण्यनिभरम् / तां समाकर्ण्य जल्पन्ती कुन्जः पूनरभाषत // 18 // देवि ! कोऽयं महामोहः कोऽहमित्यवधारय / मयि कुब्जे निजे भृत्ये युक्तमुक्तं न हि त्वया कसूर्यः क्व च खद्योतः? क मेरुः क्व च मपपः ? / क्व भृगालः कशालः क्व पोधिः क गोष्पदम् // 20 // क कल्पद्रुः क्व किंपाकः ? क लोष्ठः क च काञ्चनम् ? / क गरुत्मान् व मशकः 1 व दुकूलंक कम्बलः // 21 // क मे दृष्टिविषं रूपं क च मूर्तः स्मरो नलः ? / मम तस्य च राजर्षवैदर्भि! महदन्तरम् // 22 // त्रिभिर्विशेषकम् SIFIEITE ISSIFIELHI ISIT ISFIE // 165 //

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