Book Title: Jayodaya Mahakavya Purvardha
Author(s): Bhuramal Shastri
Publisher: Digambar Jain Samiti evam Sakal Digambar Jain Samaj

View full book text
Previous | Next

Page 614
________________ ८०-८२] द्वादशः सर्गः सूत्रतन्तुभिश्च तान्तो व्याप्तोऽस्ति, किन्तु स एवान्तरभ्यन्तरे विरिक्तिकोऽस्तीति पुनः स चङ्गो झझरोऽपि नाम वाद्यभेदः स्फुटमाह खलु ॥ ७९ ॥ निवहन्तमदाद्वरीयसे तु दशनौ जम्पतिकीर्तिपूर्तिहेतुः । मदबिन्दुपदेन कारणानि द्विषतां दुर्यशसे करेणुजानिम् ॥ ८० ॥ निवहन्तमिति । सोऽकम्पनो नाम महाराजो वरीयसे जयाय जम्पत्योर्वधू-वरयोः कोतः पूर्तये हेतू कारणस्वरूपौ स्वच्छरूपौ दशनौ दन्तौ मदबिन्दूनां पदेनच्छलेन तु पुनद्विषतां वैरिणां दुर्यशसेऽपनाम्ने कारणानि निवहन्तं दधतं करेणुजानि हस्तिनं अदाइत्तवान् ।।८०॥ सुहृदां भुवि शर्मलेखिनी वा द्विषदने पुनरन्तकस्य जिह्वा कबरीव जयश्रियोऽर्पितासि-लतिका पाणिपरिग्रहोचितासीत् ।। ८१ ।। सुहृदामिति । तथा तस्मै जयायासिलतिका खङ्गयष्टिरपिता दत्तासीद् या खलु सुहृदां सज्जनानां भुवि स्थाने शर्मण आनन्दस्य लेखिनी समुल्लेखकी, वाऽथवा द्विषतां वैरिणामने पुनरन्तकस्य जिह्वव जयश्रियो विजयलक्ष्म्याः कबरीव वेणीवासीत् । या खलु पाणिग्रहोचिता विवहनयोग्याऽभवत् ॥ ८१ ॥ हयमाह यमात्मवानरं यान्विषमानुत्तरदक्षिणाध्वगम्यान । गमिताङ्गमिताखिलप्रदेशोऽरुणदम्याजितवान् धरातलेऽसौ ॥ ८२ ।। अर्थ : तभी अच्छी जो झाँझ थी वह बोली कि जो मृदंग बाहरमें गुणोंसे युक्त दीखता है इसीलिये वह अनुरागपूर्वक दुलारा जा रहा है, पर भीतरमें बिलकुल रीता है ।। ७९ ॥ अन्वय : तु दशनौ जम्पति-कीर्तिपूर्तिहेतू मदबिन्दुपदेन द्विषतां दुर्यशसे कारणानि निवहन्तम् करेणुजानिम् वरीयसे अदात् । ___ अर्थ : अब अकम्पन महाराजने वरराज जयकुमारको हाथी दिया जो कि दम्पत्तिकी कीत्तिके हेतुभृत, दोंनों दाँतोंको धारण करनेवाला था और मदकी बूंदोंके बहानेसे दुष्टोंके लिये अपयशका भी कारण था । ८० ॥ अन्वय : पाणिपरिग्रहे असि-लतिका अर्पिता आसोत् (या) भुवि सुहृदां शर्मलेखिनी वा द्विषदने अन्तकस्य जिह्वा पुनः जयश्रियः कबरी इव मिता। अर्थ : अब इसके बाद अकम्पनने जयकुमारको तलवार दी जो कि सज्जनोंके लिए तो कल्याण करनेवाली थी, किन्तु वैरियोंके लिए यमकी जिह्वा सरीखी थी और विजयश्रीकी वेणी सरीखी थी।। ८१ ॥ अन्वय : आत्मवान् यम् हयम् आह असौ धरातले गमिताङ्गमिताखिलप्रदेशः अरं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 612 613 614 615 616 617 618 619 620 621 622 623 624 625 626 627 628 629 630 631 632 633 634 635 636 637 638 639 640 641 642 643 644 645 646 647 648 649 650 651 652 653 654 655 656 657 658 659 660 661 662 663 664 665 666 667 668 669 670 671 672 673 674 675 676 677 678 679 680 681 682 683 684 685 686 687 688 689 690