Book Title: Anusandhan 2003 01 SrNo 22
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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॥१८॥
।।२२।।
अनुसंधान-२२ दक्षु बोधिय काज चटुलसु तेगसें नबि मयेत । धरम निति अरिगट्टयौं राज साज संकेत तुं अखंड न्याईय चलसु । पर तमोघहर साव । भजो स्यांमनामा तुम सुधामप्यति वेक नाव (?) ॥१९॥ परमड विद सुनाथ तसु । गुरुनीम कीधा रक्त । तिमिरेध शठ निर्गुना । धन्य धीतमति भक्त (?) ॥२०|| भटथटातिवुचित जना । नत जसु सोभा भास्व । बिंब तपन जिम गगनमि, समक्ष नीको भास्व ॥२१॥ ससि प्रभा भालेधिका तिव्र तरनि तव तेज । तिव्र तेज हिमोजभर इच्छत सुरंगयह हेज सुगुन धाम इसु निति सुत नमुं । केवल अमृत बेंन । ज्यांहितो सोमा सिअल. पुनौ दारसुं सेन ॥२३॥ कविगुनको हर्षे तुल्य तूंग कवी विसराम । ऋजु भाव कील यस जलद, सांप्रत गुनी आराम ॥२४।। मम इच्छित माधव मनु तु, रामाचल स्तवराज । कुजन याति नंदोपमा, इच्छित तव साधाज ॥२५॥ सकलमाज सुतर मर्द । दुरित नासो विघनीत । भागूर्वेतव सब बिहासु ! वांछित हो नवण(णी)त ॥२६।। तो दान वरकिर्ति संचु । धनंद पती द्युति भाय ।। तुं प्रजन जन सुपालनो । रिपु नित सेव्वे पाय ॥२७।। तों राज सुनि दुर्जन गलत । गुन चटुल नासके संग । वो आभा तिक्ष्ण मती । यों नही तेग उमंग ॥२८|| जग जसु राज सोहा धरसु । तो गुन गाते धीतः ।। यांति पुअनिति कर्म मतिसु । सच गुन भाती नीत ।।२९।।
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