Book Title: Aagam 40 Aavashyak Malaygiri Vrutti Mool Sootra 1 Part 02
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Deepratnasagar

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Page 270
________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [-] दीप अनुक्रम [-] “आवश्यक”- मूलसूत्र-१ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) भाग-२ अध्ययनं [-] निर्युक्तिः [ ४६६ ], वि० भा० गाथा [-] भाष्यं [११४... ]. मूल [- / गाथा-] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[४०], मूलसूत्र -[१] "आवश्यक" निर्युक्तिः एवं मलयगिरिसूरि-रचिता वृत्तिः उपोद्घातनिर्युकौ श्रीवीर चरिते ॥२७३॥ कुचलती जातो, सो तत्थ वणसंडे मुच्छितो, तेर्सि तावसाणं ताणि फलाणि न देइ, ते अलभेता गया दिसोदिसिं, जेऽवि तत्थ गोवालाई एइ तंपि हंतूण धाडेइ, तस्स य अदूरे सेयविया नाम नगरी, ततो रायपुत्तेहिं आगंतूण विरहिए सो वणसंडो पडिनिवेसेण भग्गो विणासिओ य, तस्स गोवालएहिं कहिये, सो तथा कंटियाणं गतो आसि, ततो कंटियातो हड्डित्ता परसुहत्थो रोसेण धमधमं तो गतो, कुमारेहिं दिट्ठो आगच्छंतो, तं दद्रूण पठाया, सो परसुहत्थो पघावंतो + खड्डे आवडिऊण पडितो, सो कुहाडो उद्घो ठितो, तत्थ से सिर दोभागे कथं, तत्थ मतो तम्मि वणसंडे दिट्ठीविसो सप्पो ॐ जातो, तेण रोसेण लोमेण य तं घणसंडं रक्खइ, ते ताबसा सधे दहा, जे अद्दडगा ते नहा, सो विसंझं वणसंडं परिभं चिऊण जं सउणगमचि पासइ तं दद्दइ, ताहे सामी तेण दिट्ठो, ततो आसुरुतो ममं न जाणसि ?, सूरं निश्झाएत्ता पच्छा * सामि पढोएइ, सो न उज्झइ जहा अन्नो, एवं दो तिन्नि बारे, ताहे गंतूण डसर, अवकमइ मा मे उवरिं पडिहिइ, तहवि न मरइ, एवं तिनि वारे, ताहे पलोयंतो अमरिसेणं अच्छइ, तस्स भगवतो रूवं पेच्छतस्स ताणि विसभरियाणि | अच्छीणि विज्झाइयाणि सामिणो कंतिसोम्मयाए, ताहे सामिणा भणियं उबसम ! भो चंडकोसिया !, ताहे तस्स ईहापोहमभ्गणगवेसणं करेंतस्स जाईसरणं समुप्पण्णं, ताहे तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेंतों मणसा भक्षं पश्चक्खाइ, तिरथगरो जाण, ताहे सो बिले तुंडं छोडून ठितो, माऽहं रुहो संतो लोग मारेहं, सामी तत्थ अणुकंपणट्टाए अच्छइ, सामिं दहूण गोवालवच्छवाला अलियंति, रुक्खेहिं आवरित्ता पाहाणे खिवंति, न चलइत्ति अल्लीणा, कट्ठेहिं घट्टितो, तहवि न फंदइ, ताहे लोगो आगंतुं सामिं वंदित्ता तंपि सप्पं वंदति महति अ, अन्नाओ य घयविकणियातो तं सप्पं घण Jan Education International For Peace & Personal Use Only ~ 270~ चण्डकीशिकाधि कारः ॥ २७३॥ www.sanlibrary.org


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