Book Title: Pradyumna Charitra
Author(s): Somkirti Acharya
Publisher: Jain Sahitya Sadan

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Page 146
________________ हुआ। उन्होंने वसुदेव को आदरपूर्वक प्रणाम किया। वसुदेव भी एक नवयुवक विप्र एवं उसके मेढ़े को देख / / कर प्रसन्न हुए। उन्होंने ध्यान से उस मेढ़े को ओर देखा एवं फिर विप्रकुमार से जिज्ञासा की कि वह सन्दर मेढ़ा किसका है तथा उसे वहाँ लाने का क्या उद्देश्य है ? नवयुवक ने उत्तर दिया-'यह मेरा है। मैं ने सुना 143 था कि आप मेढ़े का युद्ध देखने में रुचि रखते हैं; इसलिये इस अजेय मेढ़े को परीक्षा के लिए आप के समक्ष लाया हूँ।' वसुदेव ने कहा- 'ऐसी बात है, तो इस मेढ़े को मेरी जङ्घा पर टक्कर लेने दो। यदि मेरी जङ्घा टूट गयो, तो मैं समझ लँगा कि ऐसा बलवान मेढ़ा इस पृथ्वी पर अन्य नहीं है।' विप्रकुमार ने निवेदन किया'मैं इस मेढ़े को आप पर नहीं उकसा सकता, कारण यदि इसने आपको आहत कर दिया, तो आपके सेवक मुझे मृत्युलोक का मार्ग दिखला देंगे। इसलिये आप किसी अन्य रूप में इसकी परीक्षा लें।' किंतु पुनः वसदेव ने कहा- 'तुम निर्भय हो कर अपने मेढ़े को मेरी जङ्घा पर प्रहार करने दो, इसमें तुम्हारा कोई भी अपराध नहीं समझा जायेगा।' सब सेवकों ने भी कहा-'अरे मूर्ख! मला यह साधारण-सा मेढ़ा महाराज वसुदेव सदृश बलवान पुरुष को कैसे आहत कर सकता है ?' तब विप्रकुमार ने (कृत्रिम) मेढ़े को बन्धन मुक्त कर इङ्गित किया। मेढ़े ने वेग से वसुदेव पर प्रहार किया, फलतः वे मूञ्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। चतुर्दिक कोलाहल मच गया। सेवकगण मलय, अगरु, चन्दनादि से अपने स्वामी का शोतलोपचार आदि करने लगे। इस प्रकार प्रद्युम्न अपने पितामह को गर्व रहित कर वहां से निकल आया। उसने पथ में एक भव्य प्रासाद देखा, जहाँ पुत्र के विवाह का आयोजन हो रहा था। प्रद्युम्न ने कर्णपिशाची विद्या से जिज्ञासा को'यह उत्तम महल किसका है ?' उस विद्या ने उत्तर दिया- 'यह लोक-प्रसिद्ध महल महारानी सत्यभामा का है।' प्रद्युम्न ने विचार किया कि अपनी विमाता के प्रासाद का दर्शन अवश्य करना चाहिये।' उसने तत्काल हो एक चतुर्दश वर्षीय किशोर का सुन्दर रूप धर लिया एवं वेद-पाठ का उच्चारण करता हुआ सत्यभामा के महल में पहुँच गया। वहाँ सत्यभामा को सिंहासन पर बैठे हुए देख कर विप्र-रूपधारी कुमार ने कहा-'हे नारायण के मानसरोवर में निवास करनेवालो राजहंसिनी! विस्तृत पुण्य को धारण करनेवाली सत्यभामा / देवी! आप का कल्याण हो। मैं कुलीन वंशोत्पत्र विप्र कुमार इस समय क्षुधा से व्याकुल हूँ। कृपया मुझे मनवांछित भोजन करवा दें।' उसका निवेदन सुन कर सत्यभामा कुछ मुस्कराने लगो। उसी समय विवाह हेत Jun Gun Aaradh .143

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