Book Title: Paniniya Ashtadhyayi Pravachanam Part 04
Author(s): Sudarshanacharya
Publisher: Bramharshi Swami Virjanand Arsh Dharmarth Nyas Zajjar

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Page 467
________________ ४५० पाणिनीय-अष्टाध्यायी-प्रवचनम् (२) मद्रराजः । यहां मद्र और राजन् शब्दों में षष्ठी (२।२।८) से षष्ठीतत्पुरुष समास है। शेष कार्य पूर्ववत् है। (३) परमाह: । परम+सु+अहन्+सु । परम+अहन्। परमाहन्+टच् । परमाह+अ। परमाह+सु। परमाहः। यहां परम और अहन् शब्दों में पूर्ववत् कर्मधारय तत्पुरुष समास है। अलष्टखोरेव (६।४।१५४) से अंग के टि-भाग (अन्) का लोप होता है। ऐसे ही-उत्तमाहः। (४) राजसखः । यहां राजन् और सखि शब्दों में षष्ठी (२।२।८) से षष्ठीतत्पुरुष समास है। राजसखि' शब्द से इस सूत्र से समासान्त टच्' प्रत्यय करने पर यस्येति च (६।४।१४८) से अंग के इकार का लोप होता है। ऐसे ही-आचार्यसखः । टच् (७) गोरतद्धितलुकि।१२। प०वि०-गो: ५।१ अतद्धितलुकि ७।१। स०-तद्धितस्य लुक्-तद्धितलुक्, न तद्धितलुक्-अतद्धितलुक, तस्मिन्-अतद्धितलुकि (षष्ठीगर्भितनञ्तत्पुरुषः)। अनु०-समासान्ताः, तत्पुरुषस्य, टच् इति चानुवर्तते । .' अन्वय:-अतद्धितलुकि गोस्तत्पुरुषात् समासान्तष्टच् । अर्थ:-अतद्धितलुकि-तद्धितलुगविषयवर्जिताद् गोशब्दान्तात् तत्पुरुषसंज्ञकात् प्रातिपदिकात् समासान्तष्टच् प्रत्ययो भवति। उदा०-परमश्चासौ गौ:-परमगवः। उत्तमगवः। पञ्चानां गवां समाहार:-पञ्चगवम्। दशगवम्। आर्यभाषा: अर्थ-(अतद्धितलुकि) तद्धित-लुक् विषय से भिन्न (गो:) गो शब्द जिसके अन्त में है उस (तत्पुरुषात्) तत्पुरुषसंज्ञक प्रातिपदिक से (समासान्तः) समास का अवयव (टच्) टच् प्रत्यय होता है। उदा०-परम बड़ा गौ: बैल-परमगव । उत्तम गौ-बैल-उत्तमगव। पांच गौओं का समाहार-पञ्चगव। दश गौओं का समाहार-दशगव। सिद्धि-(१) परमगवः । परम+सु+गो+सु। परम+गो। परमगो+टच् । परमगव+सु। परमगवः। यहां परम और गो शब्दों में सन्महत्परम०' (२।१।६१) से कर्मधारय तत्पुरुष समास है। परमगो' शब्द से इस सूत्र से समासान्त 'टच' प्रत्यय है। एचोऽयवायाव:' (६।१९७८) से अव्-आदेश होता है। ऐसे ही-उत्तमगवः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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