Book Title: Nandanvan Kalpataru 2007 00 SrNo 18
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 18
________________ Jain Education International संस्कृतानुवादः गुरवो रे जिन ! ते गुणाः, श्रीवर्धमानजिनराज ! रे श्रवणं श्रवणसुधाझरं, विमलीस्यान्मम कायः रे त्वद् गुणगणगङ्गाजले, स्यामहममलः खात्वा रे त्वद् गुणगानेऽनिशं रमे, कृत्यं सकलं हित्वा रे प्रातः शुचिगङ्गाजले, निविशति कः पल्वलके रे सक्तो यो मालतीसुमे, स नोपविशेद् बब्बुलके रे तव गुणगोष्ठ्यां हे प्रभो ! संलीनोऽस्म्यहमेवं रे कथमिव परनारीरतं, वन्दै सोऽहं देवं रे त्वं गतिरथ मतिराश्रय - स्त्वं हृदयालम्बनमेव रे जीवस्त्वं जीवनेशिता, वाचकयशसो देव ! रे For Private & Personal Use Only Asans विजयशीलचन्द्रसूरिः _...१ २ ३ ४ ५ www.jainelibrary.org

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