Book Title: Meghmala Vichar Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, Publisher: Shravak Bhimsinh Manek View full book textPage 8
________________ मेघमा० ॥३॥ Jain Educationa थोडोथा, ने प्रचंड वायु वाय; अने दशमने दिवसे उत्तर दिशामां जो प्रचंड वायु वाय बिलकुल न थाय ॥ २ ॥ ३ ॥ तो वरसाद | मासस्य मार्गशीर्षस्य, मघानक्षत्रमेव चेत् । कृष्णपदे चतुर्थ्यां तु, सविद्युन्मेघदर्शनम् ॥४॥ तस्मिनृदे तदाषाढे, जलपूर्णा मही नवेत् । संपूर्णा शस्य निष्पत्तिः, सुनि च समादिशेत् ५ अर्थ - मागसर महिनाना कृष्णपनी चोथने दिवसे जो मघा नक्षत्र होय, तथा वीजली सहित जो मेघनुं दर्शन थाय, तो असार महिनाना ते नक्षत्रमां ( एटले मघा नक्षत्रमां ) पृथ्वी जलथी संपूर्ण थाय, धान्यनी उपज घणी याय, तथा सुकाल पण श्राय ॥ ४ ॥ ५ ॥ | रात्रौ दृष्ट्वा दिने वृष्टि, दिने दृष्ट्वा नवेन्निशि । पुरुषस्त्री संयोगोव, विद्युन्मेघस्तथैव च ॥ ६ ॥ - रात्रि जो वीजली दिवामां आवे तो दिवसें वृष्टि थाय, तथा जो दिवसे देखवामां श्रावे, तो रात्रि वृष्टि थाय, एवी रीते पुरुष ने स्त्रीना संयोगनी पेठे वीजली छाने मेघनो संयोग जाणवो. ॥ ६ ॥ कृष्णे पदे तथाष्टम्यां नवम्यां हस्त किल । सर्वतो दिशि दृश्येच्च, विद्युदज्रेण संयुता ॥ ७॥ | तहदे चैव माषाढे, जलपूर्णा मही जवेत् । सुनिकं शस्य निष्पत्ति, वसुधा नंदते तथान्युग्मम् अर्थ- वली मागसर मासनी कृष्ण पनी श्रग्म तथा नोमने दिवसे जो हस्त नक्षत्र होय, अने वादलां For Personal and Private Use Only विचार. ॥३॥ jainelibrary.orgPage Navigation
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