Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 43
________________ Jain Educationa In तदाषाढे नवेन्नूनं, वह्निजोऽत्र द्युपद्रवः । धनधान्यहरो मह्यां तृणानां चैव नाशकः ॥ २४ ॥ अर्थ- वैशाख मासना शुक्लपक्षनी बारसने दिवसे संध्याकाले पूर्व दिशामां लालकांतिवालुं जो विजलीनुं दर्शन थाय, तो असाड मासमां खरेखर या पृथ्वी पर धनधान्यनो ध्वंस करनारो, तथा घासने नाश करना अनि उत्पन्न थएलो उपव थाय. ॥ २३ ॥ २४ ॥ त्रयोदशी तन्मासस्य, निर्मला च जवेद्यदि । गुरुवासरसंयुक्ता, ज्येष्ठे वृष्टिस्तदा ध्रुवम् १५ अर्थ - ते वैशाख मासनी शुक्लपक्षनी तेरस जो निर्मल तथा गुरुवारे करीने संयुक्त होय, तो ज्येष्ठ मासमां खरेखर वृष्टि थाय. ॥ २५ ॥ चतुर्दशी च संयुक्ता, रविवारेण वृष्टिदा । चतुर्मास्यां हि धान्यानां तृणानां च मता प्रदा ॥ अर्थ- ते वैशाख मासना शुक्लपक्षनी चौदस जो रविवारी होय, तो चतुर्मासमां ते वृष्टिनी देनारी, अने धान्य तथा घासनी देनारी ( पंडितोए) मानेली बे. ॥ २६ ॥ पूर्णमासी सदा ज्ञाता, वैशाखस्य शनैर्युता। पशुनाशकरी ज्योति - विद्यासार विशारदैः 29 अर्थ- वैशाख मासनी पुनम जो शनिवारी होय, तो ते पशुर्जनो नाश करनारी बे, एम ज्योतिषवि - द्याना तत्वमां पंडित एवा लोकोए हमेशां जाएयुं बे. ॥ २७ ॥ वैशाखकृलपक्षस्य, पंचमी मेघसंयुता । राज्यजंगकरा ज्ञाता, सोमवासरसंयुता ॥ २८ ॥ For Personal and Private Use Only ainelibrary.org

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