Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 58
________________ मेघमा० ॥२॥ Jain Educationa Int - श्राषाढ मासना कृष्णपक्षमां चोथ, पांचम, बव श्रने सातमनो उत्पन्न थलो गर्न वृष्टिने | देनारो मानेलो बे ॥ ३५ ॥ | श्राषाढे कृप्तपदेच, पंचम्यां नैकते यदि । चचाणि पीतवर्णानि, जायंते हि दिनोदये ॥ ३६ ॥ तदा वृष्टिश्च विज्ञेया, श्रावणे शस्यदा जुवि । पूर्वायां यदि तानिस्यु-स्तदा वृष्टिर्नश्रावणे ३७ - वली आषाढ मासना कृष्लपक्ष्मां पांचमने दिवसे नैरुत्य दिशामां जो सूर्योदय समये पीलां रंगनां वादलां थाय, तो श्रावण मासमां पृथ्वीपर धान्यने पनारी वृष्टि जावी, अने तेवां वादलां जो पूर्वदिशामां थाय, तो श्रावण मासमां वृष्टि न थाय ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ | आषाढे दशमी कृष्मा, सुनिक्षाय सरोहिणी । एकादशी तु मध्यस्था, द्वादशी कालभंजिनी अर्थ- आषाढ मासमां कृमपनी दशम जो रोहिणी नक्षत्रवासी होय, तो ते सुकाल माटे थाय बे, अग्यारस मध्यस्थ जाणवी, छाने बारस कालनो नाश करनारी जाणवी : ३८ ॥ एव ते आषाढ मासनुं स्वरूप जाणवुं. हवे श्रावण मासनुं खरूप कहे छे. चैत्रे च श्रावणे चापि, पंचार्काश्च नवं तिचेत्। डुर्निदं तत्र जानीया - छत्रजंगं च जायते ॥ १ ॥ अर्थ- चैत्र ने श्रावण मासमां पण जो पांच रविवार होय, तो 5काल जाणवो; अने बत्रजंग थाय ॥ १ ॥ For Personal and Private Use Only विचार. ॥ २८ ॥ inelibrary.org

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