Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 50
________________ मेघमा ||N|| अर्थ-ज्येष्ठ मासना कृमपदनुं मूल नत्र जो वरसे, तो साठ दिवसोसुधी वरसाद न वरसे; अने पी| विचार. खरेखर वृष्टि श्रायः ॥ २६॥ ॥२४॥ ज्येष्ठस्य पूर्णमास्यांतु, मूलं प्रस्रवते यदि। षष्टिघस्त्रा न वर्षते, पश्चाहर्षति माधवः ॥२७॥ | अर्थ- वली ज्येष्ठ मासनी पुनमने दिवसे जो मूल नक्षत्र वरसे, तो साठ दिवसोसुधी वृष्टि न पाय, अने पालथी वरसाद वरसे. ॥ २७॥ ज्येष्ठस्य कृष्लपक्ष च, शदे श्रवणादिके।न वर्षते न वर्षेते, वर्षेते वर्षते सदा ॥ २७ ॥ IN अर्थ- ज्येष्ठ मासना कृमपक्षमा श्रवण अने धनिष्ठा नक्षत्र जो वरसे, तो वरसाद श्राय, अने न वरसे तो न थाय. ॥ २० ॥ ज्येष्ठमासे त्वमावस्या, पूर्णमास्यां मघापि वा। दिवा वा यदि वा रात्रौ, मेघा गति नांबरे श्रवृष्टिस्तु नवेत्तत्र, नात्र कार्या विचारणा। चतुर्मासावधि नूनं, प्राणिनां हि जयंकरा॥३॥ | अर्थ- ज्येष्ठ मासनी अमासने दिवसे अथवा पुनमने दिवसे जो मघा नक्षत्र होय, अने दिवसे अथवा रात्रिए जो आकाशमा वादलां न आवे, तो खरेखर चार मासोसुधी प्राणीने जयंकर एवीअवृष्टि थाय; ॥२४॥ (अर्थात् वृष्टि न थाय) तेमां कई पण विचार करवो नहीं. ॥शए ॥ ३० ॥ ___एवी रीते ज्येष्ठ मास, स्वरूप जाणवू. lain Educationa a l For Personal and Private Use Only Rainelibrary.org

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