Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

View full book text
Previous | Next

Page 12
________________ मेघमा० ॥५॥ Jain Educationa बवाई गयो होय, तो जादरवा मासमां ते देशमां जयंकर, तथा धान्योनुं नक्षण करनारी दुपदिनी (ती डोनी) श्रेणि खरेखर आवे छे. ॥ ७ ॥ ८ ॥ पौषे तु सप्तमी शुक्ला, अष्टमी नवमी तथा । रेवती रुक्षसंयुक्ता, तदा धान्यं न संग्रहेत्॥९॥ अर्थ - पौष मासनी शुक्ल पनी आग्म तथा नोम जो रेवती नक्षत्र सहित होय, तो धान्यनो संग्रह करवो नहीं; अर्थात् ते वर्षमां धान्यनी उपज सारी थाय. ॥ ए ॥ तस्य मासस्य सप्तम्यां प्रजाते सूर्य मंगलम् । जयदेवाभ्रवन्नं चेत्, तदान्नं जायते शुभम् १० अर्थ - पौष मासनी सातेमे प्रजातमां सूर्यनुं मंडल उगतांज जो वादलांउंथी ब्वाएलुं होय, तो धान्य घणुं श्राय ॥ १० ॥ श्रष्टमी तस्य मासस्य, चंद्रवासरसंयुता । मारीप्रभृतिरोगाणां, कारिणी विबुधैर्मता ॥ ११ ॥ अर्थ - पोषमासनी सोमवारे करीने संयुक्त एवी जो ( सुद) आम होय, तो ते मरकी आदिक रोगोनी करनारी बे, एम विधानोए मानेतुं बे ॥ ११ ॥ नवमी जरणी युक्ता, वातविद्युत्समन्विता । ज्योतिषिकैः समन्यस्ता, दुद्रोपद्रवकारिणी १२ अर्थ - पोसमासनी नोम जरणी नक्षत्र वाली तथा वायु ने वीजली सहित जो होय, तो ते लुप्र उपप्रवोने करनारी बे. ॥ १२ ॥ For Personal and Private Use Only विचार. ॥ ५ ॥ ainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68