Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 13
________________ दशम्यां तस्य मासस्य, यदा विद्युछिमान्विता।तदातिवृष्टितोधान्य, निष्पत्तिर्नहि संजवेत् | अर्थ पोस मासनी ( शुक्ल ) दशमीने दिवसे जो हिम सहित वीजली थाय, तो ( ते वर्षमा ) अतिवृष्टि थवाथी धान्यनी उपज अती नश्री.॥ १३ ॥ एकादशी तथा झेया, सूर्यतापेन वर्जिता।पशुनाशकरा प्राझै, स्तृणसंहतिवर्जिता ॥१४॥ अर्थ-पोस मासनी ( शुक्ल ) अग्यारस जो सूर्यना तापश्री रहित होय, तो ते वर्षमां घासनो समूह नहीं अवाश्री, पशुऊनो नाश थाय . ॥१५॥ पौर्णमासी द्वितीयाच,तस्य मासस्य चेद्यदा।क्रमेण च शनिसूर्य,वासरान्यां समन्विता१५| आषाढे शुक्लपक्ष च,प्रजूतं जलवर्षणम् । निष्पत्तिःसर्वशस्यानां,प्रजाच निरुपजवा ॥१६॥ __ अर्थ-पोस मासनी पुनेम, तथा बीज अनुक्रमे जो शनि, अने रविवारी होय, तो असाम महिनाना || al | शुक्ल पक्षमा घणो वरसाद श्राय, सर्व धान्योनी उपज थाय, तथा प्रजा पण उपजव रहित श्रायः॥१५॥१६ पौषमासस्य संक्रांती, रविवारो यदा नवेत्। हिगुणं धान्यमूल्यं च, कथितं मुनिसत्तमैः१७ | अर्थ-पोस मासनी संक्रांतिने दिवसे जो रविवार होय, तो धान्योनुं मूटय बेवॉ श्राय, एम उत्तम मु-| निए कहेलुं जे. ॥१७॥ शनौ च त्रिगुणं प्रोक्तं, नौमे चैव चतुर्गुणं । तुल्यं च बुधशुक्राच्या, मूख्याधं गुरुसोमयोः १० JainEducationalTahal For Personal and Private Use Only linelibrary.org

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