Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 22
________________ मेघमा विचार. ॥१०॥ R अर्थ-वली ते महासुदी आतुमने दिवसे जो आकाशमां मध्यान्हकाले नैशत दिशामां धूलिनी वृष्टि थाय, तो उकाल पडे. ॥ २७॥ माघशुक्लाष्टमी चैव, पुर्दिना यदि जायते। तदा पशुविनाशः स्या,विविधव्याधिजिवम् _ अर्थ-वली माहासुदी श्रामि जो वादलांवाली होय, तो खरेखर विविधप्रकारना रोगोथी पशुजनो विनाश थाय. ॥२७॥ | निशानाथो निशि जातो, माघशुक्लाष्टमी दिने। रक्तवर्णेन संवृत्तो, यदा नामंडलेन च श्ए तदाऽतिवृष्टिविज्ञेया,चतुर्मासावधि जनैः। महामारी समुत्पातो,धान्योत्पत्तेरसंचवः ॥३॥ __ अर्थ-वली महासुदी आवमने दिवसे रात्रिए जो चंज लाल रंगना नामंडलथी घेराएलो देखाय, तो चतुर्माससुधि अत्यंत वृष्टि थाय, एम लोकोए जाणवू, वली तेथी मोहोटी मरकीनो उपज्व थाय, तथा धान्यनी उत्पत्ति न पाय. ॥ २५ ॥ ३० ॥ . माघशुक्लस्य चाष्टम्यां, यदाहि विद्युदर्शनम्।जायतेऽग्नौ दिशि चैव, तदा वृष्टिर्न जायते अर्थ-वली महासुदी आवमने दिवसे जो अग्निखुणामां विजली देखाय, तो वरसाद श्रतो नश्री. ॥३१॥ धूम्रयुक्तं यदाकाशं, माघशुक्लाष्टमीदिने। दृश्यते हि तदा मह्यां, नूमिकंपो जवेधूवम् ३२ अर्थ-वली महासुदी आठमने दिवसे श्राकाश वाडाउँवालुं देखाय,तो पृथ्वीपर खरेखर धरतीकंप थाय.. ॥१०॥ Jain Educational nal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org

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