Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

View full book text
Previous | Next

Page 20
________________ मेघमा० ॥ ए॥ Jain Educationa पछी ते टुकडाने नीचोव्याविना बायामां सूकाववो. सूकायाबाद ते वस्त्रना टुकडामां जो श्यामरंगना डाघा - + मालुम 'पडे तो जाएवं के, चतुर्मासमां वरसाद सारो थशे अने जो लाल रंगना डाघार्ज देखाय, तो | जाणवुं के चतुर्मासमां वरसाद बिलकुल नहीं थाय. तथा जो कई पण डाघा न देखाय तो जाणवुं के, अ त्यंत वरसाद थइ धान्यनो पाक निष्फल जशे. (उपरना प्रयोगमाटेनुं केटलुंक गुरुगम मेलववानुं बे, एम मोने अनुमान थाय बे.) | माघशुक्लस्य सप्तम्यां घटित्रय दिने गते । धूलिवृष्टिरीशाने चे, राकंपस्तदा निशि ॥ १८ ॥ अर्थ- माहासुद| सातेमने दिवसे त्रण धमी दिवस गयाबाद ईशान दिशामां जो घुडनी वृष्टि थाय तो रात्रिए धरतीकंप थाय. ॥ १० ॥ | माघशुक्लस्य सप्तम्यां रविवारो यदा जवेत् । मध्यान्हे धूलिवृष्टिश्च प्रतीच्याम निलैर्युता १० तदा विद्युत्समुत्पातो, जवति जनघातकः । तम्यांहि तद्दिने तत्र, जूरिजयसमन्वितः ॥२०॥ अर्थ-माहासुदी सातमने दिवसे जो रविवार होय, तथा मध्यान्हकाले पश्चिम दिशामां पवनसहित जो धूलिनी वृष्टि थाय, तो त्यां तेजदिवसे रात्रिये खरेखर लोकोनो नाश करनारो, तथा घणा जयवालो विजलीनो उपद्रव थाय. माघशुक्लस्य सप्तयां, संध्याकाले जलैर्युतो । मेघयूयो यदा प्राच्यां तदा दुष्कालसंभवः For Personal and Private Use Only विचार. ॥ ॥ jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68