Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 25
________________ तदिने चैव नजसि, प्रजाते यदि जायते। चंडवातस्तदा झेया, वृष्टिर्धान्यप्रदाजुवि ॥४४॥ अर्थ-वली ते दिवसे आकाशमांप्रनाते जो महावायु, थाय तो पृथ्वी मांधान्यने आपनारी वृष्टि जाणवी. दशम्यां माघशुक्लस्य, शक्रचापो विदृश्यते।संध्याकाले सदा झेया,वृष्टिर्मारीप्रदा तदा अर्थ-महासुदि दशमने दिवसे संध्याकाले जो इंजधनुष्य देखाय, तो मरकीने आपनारी वृष्टि जाणवी.४५ दशमी माघशुक्लस्य, नौमवारान्विता यदि। तदा बालविनाशोहि,विडेयो फाल्गुने ध्रुवम् अर्थ-वली माहासुदि दशम जो लोमवारी होय, तो खरेखर फागण मासमां बालकोनो नाश जाणवो. विद्युत्पातो यदा जात,स्त दिने वृषनोपरि। तदा प्राणिसमूहस्य, नाशो नवेजलं विना ४७ अर्थ-वली ते महासुदि दशमने दिवसे बलदपर जो वीजली पडे, तो पाणीविना प्राणीजना समूहनो || |विनाश थाय. ॥४७॥ तदिने सूर्यमध्ये चेद्,दृश्यते रक्तनान्वितम्। तदस्तसमये नून,मत्स्यचिन्हं सकंपनम्॥॥ तदाष्टदिनमध्ये हि, जायते वार्धिसंजवः। जलप्लवो महाघोरो, ध्रुवं जगतीनाशकः ॥४ अर्थ-वली ते महासुदि दशमने दिवसे सूर्यास्त समये जो सूर्यना मध्य लागमा लालकांतिवालुं तथा कंपसहित जो मत्स्य, चिन्ह देखाय, तो आठ दिवसोनी अंदर खरेखर अत्यंत जयंकर, तथा जगतने नाश करनारी समुपनी रेल आवे.॥10॥पए॥ Jain Educational Gallonal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org

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