Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek,
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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तदिने गुरुवारश्चेत्, प्रनाते मेघवर्षणम् । तदा वृष्टिर्न जायेत, वर्षावधि हि निश्चितम् ॥३३॥ __ अर्थ-ते दिवसे जो गुरुवार होय,तथा प्रजातमां वरसाद श्राय, तो खरेखर एक वर्षसुधि वृष्टि अती नश्री. IN माघशुक्लनवम्यां च, रविवारो यदा नवेत्। करकाणां समुत्पातो, प्रनाते च यदानवेत् ३४ ।। तदा स्वर्णादिधातूनां, मूख्यं हि द्विगुणं मतम्। त्रिगुणं शनिवारश्चे,नौमवारे चतुर्गुणम् ॥३५
अर्थ- वली महासुदी नोमने दिवसे जो रविवार होय, अने प्रजातमां जो कराउँनो उपञ्च थाय, तो खरेखर सुवर्णादिक धातुनुं मूट्य बेवडुं श्राय, ते दिवसे शनिवार होय तो त्रणगणुं श्राय, अने ते दिवसे जो जोमवार होय, तो चारगणुं थाय. ॥ ३४॥ ३५॥ मध्यान्हे तदिने चैव, पूर्व दिग्यदि मंडिता।पंचवर्णेमहामेधै,स्तदा मारी न संशयः॥३६॥ __ अर्थ-वली ते दिवसे एटले माहासुदी आठमने दिवसे मध्यान्हकाले पूर्व दिशा जो पचरंगी मोटां वादलांथी मंडित थएली होय तो मरकीनो उपजव श्राय, तेमां संशय नथी.॥३६॥ माघशुक्लनवम्यां च, यदा हि विद्युद्दर्शनम्।जायते संध्यासमये, तदा धान्यं न जायते ३७ __ अर्थ- वली माहासुदी नवमीने दिवसे जो संध्याकाले विजली देखाय, तो धान्य निपजतुं नथी. ॥३॥ तदिने रविवारश्चे,दाकाशं च जलप्लुतम्। सूर्यस्य दर्शनं चैव, नो जायेत दिनावधि ॥३॥ तदा हि पशु विध्वंसः, फाल्गुने नवति ध्रुवम् । स्फोटकादिमहारोगै, रेवं जिनविनाषितम्॥
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