Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 35
________________ Jain Educationa अर्थ-चैत्रमासनी संक्रांते जो वरसाद वरसे, तो विचित्र प्रकारनं धान्य पाके, तथा वैशाख अने ज्येष्ठ | मासनी संक्रांतिए पण जो वरसाद वरसे, तो पण तेज प्रमाणे विचित्र प्रकारनं धान्य नीपजे. ॥ १ ॥ चैत्रे वा श्रावणे वापि, पंचार्का यदि चागताः । दुर्निदं हि तदा ज्ञेयं कथितं पूर्वसूरिभिः २ अर्थ–चैत्र अथवा श्रावण मासमां पण जो पांच रविवारो आवे, तो खरेखर मुकाल जावो, एम पूर्वा - चार्योए कहेलुं बे ॥ २ ॥ चैत्रस्य शुक्लसप्तम्यां मेघछन्नं यदा नजः । निर्मला वा दिशः सर्वा दृश्यंते वायुना सह ॥ ३ ॥ गोधूमांस्तत्र गृह्णीयान्, महर्ध्यान पिबुद्धिमान् । संप्राप्ते श्रावणे मासि, लाजो हि त्रिगुणोभवेत्। अर्थ-चैत्र मासनी शुक्ल सातमने दिवसे जो आकाश वादलांउंथी बवाएलुं होय, अथवा सर्व दिशा वायुसहित निर्मल देखाय, तो बुद्धिमान माणसे मोंघा एवा पण घटं ग्रहण करवा, केमके श्रावण मास आवते ते तेथी गणो लाज थाय. ॥ ३ ॥ ४॥ द्वितीया दिवसे प्राप्ते, चैत्रे वायुश्च सर्वतः । नवेयुर्यदि मेघा न, वृष्टिर्जाद्रपदे ध्रुवम् ॥ ५ ॥ - चैत्रमासनी बीजने दिवसे जो सर्व बाजुथी वायु होय, अने वादलांर्ज न होय, तो खरेखर जादरवा मासमां वृष्टि श्राय ॥ ५ ॥ तृतीया असंयुक्ता, निर्जला गर्जते यदा । गोधूमांस्तत्र गृह्णीयात्, यवांश्चैव विशेषतः ॥६॥ For Personal and Private Use Only jainelibrary.org

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