Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

View full book text
Previous | Next

Page 36
________________ मेघमा० ॥ १७ ॥ Jain Educationa अर्थ- चैत्र मासनी त्रीज जो जलरहित वादलांवाली होय, अने जो गर्जना थाय, तो घटनो श्र यवोनो विशेष प्रकारे संग्रह करवो. ॥ ६ ॥ तृतीये दिवसे प्राप्ते, उत्तरो यदि मारुतः । न च मेघाः प्रदृश्यते, कार्तिके वृष्टिमादिशेत् ॥ ॥ - चैत्र सुदीजने दिवसे जो उत्तर दिशामां वायु होय, अने वादलां जो न देखाय, तो कार्तिक मासमा वृष्टि थाय ॥ ७ ॥ | चतुर्थे दिवसे प्राप्ते, मेघजालं प्रदृश्यते । दुर्भिक्षं जायते घोर, मनावृष्ट्या न संशयः ॥ ८ ॥ - चैत्र सुद चोथने दिवसे जो वादलांनो समूह देखाय, तो वरसाद विना जयंकर दुकाल थाय, तेमां संशय नथी. ॥ ८ ॥ दिनद्वयं यदा वाति, वायुर्द क्षिणपश्चिमः । तदा न जायते धान्यं, दुर्भिक्षं चात्र जायते ॥ ॥ - ज्या चैत्र सुद ( चोथथी ) मांडीने बे दिवससुधी दक्षिण पश्चिम दिशामां वायु वाय, त्यारे धान्य न थाय, अने काल पडे. ॥ ए ॥ तृतीया पंचनवम्यां वायुः पूर्वोत्तरो यदि । सर्वशस्यानि जायंते, प्रजाश्च सुखिनो ध्रुवम् ॥ १० अर्थ - चैत्र सुदीज, पांचम ने नोमने दिवसे जो पूर्व ने उत्तर दिशानी वच्चे वायु होय, तो सर्व प्रकारनां धान्यो थाय ने प्रजा पण खरेखर सुखी थाय. ॥ १० ॥ For Personal and Private Use Only विचार. ॥ १७ ॥ Vainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68