Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 32
________________ मेघमाग विचार. ॥१५॥ विद्युन्मालाकुलं वा तदपि हि च नवेन्नष्टचंडार्कतारं । विझेया प्रावृडेषा मुदितजनपदैः सर्वशस्यैरुपेता ॥१॥ अर्थ- माघ मासना कृष्लपक्षनी दशमीए जो स्वाति नक्षत्रनो योग होय, तथा हिम पडे, अंधकार थाय, अत्यंत वेगवालो वायु होय, जलसहित वरसाद हमेशां गर्जना करे, विजली श्राय, तथा सूर्य, चंड अने तारा न देखाय, तो हर्षित भएला लोकोए सर्व प्रकारना धान्योने उत्पन्न करनारो वरसाद जाणवो.॥१॥ माघस्य नवमी कृष्णा, दशम्येकादशी तथा।सवाता विद्युता युक्ता, शस्यनाशप्रदा मता॥ अर्थ- माघ मासनी कृतपदनी नोम, दशम, तथा अगीयारस जो वायु अने विजलीसहित होय, तो ! तेने धान्यनो नाश करनारी जाणवी. ॥ ५॥ माघस्य छादशी कृष्ला, शनिवारेण संयुता।समेघा ज्वरदा ज्ञेया, प्राणीसंहारकारिणी ३ अर्थ- माघ मासनी कृप्तपदनी बारस जो शनिवारी तथा वादलांवाली होय, तो तेने ताव आपनारी तथा प्राणीजनो संहार करनारी जाणवी. ॥ ३ ॥ कृष्लपक्ष्या सदा झेया, माघमासत्रयोदशी।सेंजचापा सुवृष्टिदा, ज्येष्टमासे च निश्चितम् ॥ अर्थ- वली माघ मासनी कृलपदनी धनुष्यवाली तेरसने खरेखर ज्येष्ठ मासमां उत्तम वृष्टि देनारी जाणवी.॥४॥ N Jain Educationallalla For Personal and Private Use Only jainelibrary.org

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