Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek,
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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मेघमा
॥१३॥
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तदा चैत्रेमधौ चैव, महामारी प्रजायते । वमनारेचसंयुक्ता, तूर्णमृत्युप्रदा जुवि॥६॥विचार. | अर्थ- ते महासुदि बारसने दिवसे जो रविवार होय, अने आकाश निर्मल होय, तथा सूर्य आकरो | होय, अने लंको वायु न वातो होय, तो चैत्र अने वैसाक मासमां वमन अने जुलाबवाली तथा तुरत मृत्यु यापनारी महामारी (कोलेरा) पृथ्वीमां थाय. ॥६१॥६॥ माघशुक्लत्रयोदश्या, मीशाने यदि विद्युतां।दर्शनंजायते तम्यां,तदा वृष्टिर्न वार्षिका॥६३॥ | अर्थ-महासुदि तेरसने दिवसे शानदिशामांजो विजलीउनु रात्रिए दर्शन याय, तो वार्षिक वृष्टियती नश्री.]
तदिने निशिथे चंडो, यदा रक्त प्रजान्वितः।तदाषाढे रुधिरस्य वृष्टिनवति निश्चितम् ॥६॥ | अर्थ- वली ते महासुदि तेरसने दिवसे मध्यरात्रिए जो चंज लाल कांतिवालो होय, तो असाड मासमां खरेखर रुधिरनी वृष्टि श्राय. ॥ ६ ॥ तदिने चंगरश्मिश्चे,द्यदा मेघैः परिवृतः। नीलवर्णैः प्रजातेच, घटिकाद्वितीयावधि ॥६५॥ तदानूनमनावृष्टि, र्जायते कार्तिकावधि।ज्योतिश्चक्र इति प्रोक्तं, श्रीहरिजमसूरिणा६६ __ अर्थ- वली ते महासुदि तेरसने दिवसे जो प्रत्नातमां बे घमी सुधि सूर्य लीला रंगनां वादलाउथी| विंटाएलो होय, तो खरेखर बेक कार्तिक माससुधि वृष्टि अती नश्री, एवी रीते श्रीहरिजप्रसूरिजी महा-IN राजे ( पोताना ) ज्योतिष्चक्रमां कहेलुं . ॥६५॥६६॥
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