Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 29
________________ Jain Educationa माघशुक्ल चतुर्दश्यां, संध्याकाले नवेद्यदि । उल्कापातः प्रतीच्यां चे, तदा नाशोऽवनिनुजां अर्थ- माहासुदि चौदसने दिवसे संध्याकाले पश्चिम दिशामां जो उस्कापात थाय, तो राजार्जुनो नाश थाय. न माघे पतितं सीतं, ज्येष्ठे मूलं न वृष्टिकृत् । नार्द्रायां पतिता वृष्टि, ईष्टकालस्तदाजवेत् ६८ अर्थ- जो माहा मासमां टाढ न पके, तथा जेठ सुदि पडवाने दिवसे जो मूल नक्षत्र वृष्टि न करे, तथा | नक्षत्रमां जो वृष्टि न थाय, तो काल पडे. ॥ ६८ ॥ पंचार्काः पंचजौमाश्च, पंचसूर्यसुतास्तथा । एकमासे यदायाता, स्तदा पुर्जि संजवः॥६९॥ अर्थ- वली एक मासमां जो पांच रविवार, पांच मंगलवार, तथा पांच शनिवार यावे तो काल पडे. | सर्वेषु चैव मासेषु, रुक्षवृद्धिः सुनिकृत् । माघस्य प्रतिपच्चैव, सवाता मेघवर्जिता ॥॥॥७०॥ अर्थ- सघला मासोमां जो नक्षत्रोनी वृद्धि थाय, तो सुकाल याय, अने माहा मासनो पडवो जो वायुसहित होय, तो वरसाद वरसे नहीं. ॥ ७० ॥ द्वितीया मेघसंपूर्णा, माघकृष्णे यदा भवेत् । सविद्युायते तत्र, धान्यमूल्यं चतुर्गुणं ॥ ७१ ॥ - जो महावदि बीज मेघवाली, ने वीजलीवासी होय, तो त्यां धान्यनुं मूल्य चारगणुं थाय बे. तृतीया अत्रसंयुक्ता, निर्जला गर्जते यदा । गोधूमांस्तत्र गृह्णीया, यवांश्चैव विशेषतः॥ ७२॥ For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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