Book Title: Meghmala Vichar Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, Publisher: Shravak Bhimsinh Manek View full book textPage 6
________________ मेघमा पुष्पबंधप्रवक्ष्यामि,शृणु तत्वेन मानिनि।कार्तिक्यां पूर्णमास्यां तु,नक्षत्रं कृत्तिका यदि१२ ॥ विचार. पुष्पबंधःसमादिष्ट,श्चतुर्मासेषु वर्षणम्।सुनिदः देममारोग्यं,शस्यनिष्पत्तिरेव च॥युग्मम् | अर्थ हे मानिनि ! हुँ तने तत्वश्री पुष्पबंधनुं स्वरूप कढुंवं, ते तुं सांजल ? कार्तिक सुदी पुनेमने दिवसें| जो कृत्तिका नत्र होय, तो “पुष्पबंध" कहेलो , अने तेथी चतुर्मासमां सारो वरसाद थाय, तेम सुकाल, देम, आरोग्यपणुं, अने धान्यनी निपज सारी श्रायः ॥ १५॥ १३ ॥ अथवा तहिने देवि, नरणी चेत्संजायते।रोगदीर्घ मनावृष्टिः, षखंडे च प्रजायते ॥१४॥ ___ अर्थ-वली हे देवी ! ते दिवसे जो जरणी नक्षत्र होय, तो बखममा रोगनी घणी उत्पत्ति, तथा ||N|| अनावृष्टि श्राय . ॥१४॥ संतापाविविधाकारा, उत्पाताविविधास्तथा।मध्यमं जायते शस्य,मेघा वर्षतिमध्यमाः १५ अर्थ वली तेथी विविध प्रकारना संतापो, तथा उत्पातो पाय, अने धान्य अने वरसाद मध्यमसर थाय. श्रथवा रोहिणी चेच, तदिने वर्तते प्रिये। द्विपादाश्चतुःपादाश्च, विकलीनूतमानसाः॥१६॥ अर्थ-वली हे प्रिये !ते दिवसे जो रोहिणी नत्र होय,तो मनुष्य, अनेचोपगां जानवोरोने मनमा पीडा थाय. कार्तिके चैत्रमासेतु, यदीऽग्रहणं नवेत्।तारकापतनं चैव, उक्कापातो यदा नवेत् ॥१७॥ Jain Educational nal For Personal and Private Use Only SW ainelibrary.orgPage Navigation
1 ... 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 ... 68