Book Title: Meghmala Vichar
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 7
________________ नूमिकंपो विनिर्घातः, पतंति जलबिंदवः। श्राकाशे च तथा दृष्टवा,कुंडलं चेंऽसूर्ययोः॥१॥ इंसायुधस्य वज्रस्य, धूमकेतोश्च दर्शनम्।संग्रहं सर्वशस्यानां, प्रयत्नेन तु कारयेत् ॥१॥ ॥ त्रिनिर्विशेषकम् ॥ अर्थ-कार्तिक मासमां जो चंजनुं ग्रहण होय, अथवा तारा खरे, उक्कापात थाय, नूमिकंप थाय, निर्घात थाय, जलना बिंड पडे, आकाशमां चंड अने सूर्यनी आसपास कुंमालुं देखाय, तथा इंधनुष्य अने धूमकेतु (पुंगडी तारो ) जो देखाय, तो यत्न पूर्वक सर्व धान्योनो संग्रह करवो. ॥१७॥१॥१॥ एवीरीतें कार्तिक मासनो विचार जाणवो. हवे मागसर मासनो विचार कहेछे. मार्गादिपंचमासेषु, शुक्ल षष्ठी रवेर्युता।पुष्कालश्वत्रंजंग वा, जायते हिमहीजुजाम् ॥१॥ __ अर्थ-मागसर आदिक पांच मासोमा सुद ब जो रविवारी होय, तो फुकाल अथवा राजऊना उत्रनो जंग थाय. ॥१॥ मार्गशीर्षेयदामासे, सप्तमी नवमी दिने।ऐशानी दिशमाश्रित्य, दृश्यते मेघमंडलम् ॥२॥ स्तोकं वर्षतिपर्जन्यो,घनवातंसमादिशेत्। दशम्यामुत्तरोवातःप्रचंडोघनघातकः३॥युग्मम् अर्थ-जो मागसर मासमां सातेम अने नोमने दिवसे, ईशान दिशामां मेघनुं मंडल देखाय, तो वरसाद Jain Educational phal For Personal and Private Use Only l inelibrary.org

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