Book Title: Jain Tattva Sar Sangraha Satik
Author(s): Ratnashekharsuri
Publisher: Ranjanvijayji Jain Pustakalay

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Page 368
________________ ( ३५७ ) विवेचन:-जो तमोने आत्म ज्ञान थी मुक्ति थाय छे, ए मारू कथन बराबर न लागतुं होय अने प्रात्म ज्ञान विना विष्णु आदि नी उपासना थी मुक्ति थाय छे एम मानता हो तो वैष्णव प्रमुख जनो, तेना साधुप्रो अने गृहस्थो पण तेमनी सेवा-भक्ति करो, ध्यान करो परन्तु तपश्चर्यादि, संयम मां तत्परता, क्षमा, निःसंगता, राग-द्वेष नुं निवारण, पांचे इन्द्रियो ना विषय थी निवृत्ति, ध्यान अने आत्मज्ञानादि तेप्रो केम करे छे ? मूलम:एषद सेवा ननु विष्णुब्रह्मा-दीनां तदेयं कुत प्राश्रिताऽस्ति? . भोस्तेभ्यएवेतितदानतेषाम्,बागस्तिहस्तोऽपियतोऽन्यबोधः।।। गाथार्थ:-- विष्णु आदि नी आज सेवा छे तो आ सेवा कोनाथी प्रवृत्ति मां. प्रावी ? विष्णु आदि थीज आ प्रवृत्ति मां आवी. तेप्रोने वाणी नथी, हाय नथी जेथी बीजाने बोध थाय ? विवेचन:- तपश्चर्यादि ए विष्णु नी सेवा छे एम जो तं कहे तो प्रश्न ए थाय के 'तपश्चर्यादि सेवा कोनाथी प्रवृत्ति मां प्रावी'? 'तपश्चर्यादि सेवा विष्णु आदि थी प्रवृत्ति मां आवी' एम जो तुं कहे तो होय तो अमारो आ पण एक प्रश्न छे के प्रवृत्ति जे थाय छे ते मुख अने हाथ विगेरे थी

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