Book Title: Dharm vidhi Prakaranam
Author(s): Udaysinhsuri, Shreeprabhsuri
Publisher: Hansvijayji Library
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प्रकरणम्
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धर्मविधि
वस्स । पयडंती सा सणियं, उत्तारइ कंचुयं तत्य ॥ ८०५॥ कंचुयगमत्तरीयं च, अप्पिउं सा सहीइ हत्थम्मि । हंसि व्व मंद३२॥
मंद, तीराओ नीरमाविसइ ॥ ८८६॥ दुराओ वि पसारिय-तरंगहत्था तरंगिणी अहयं । आलिंगइ सवंग, चिराउ मिलिये ४ वयस्सि व ॥ ८०७ ॥ सा पउमपत्तनयणा, कीलंती तज्जलंमि सिच्छाए । पाणीहि जलं दारइ, अरित्तदंडेहि बेडिव्व ॥
८०८॥ तं तह नइप्पवाहे, कीलंतिं जलनिहिमि देवि व । पिक्खड़ को वि दुसीलो, नागरतरुणो परिभमंतो ॥ ८०९॥ तं सलिलभिन्नसुहमे-गवत्थपच्छाइयंपि सव्वत्तो । सुपयडसव्यावयव, दठं खोभाउ सा पढइ ॥ ८१० ।। सुन्हार्य ते पुच्छइ, एस नईमत्तकरिवरकरोरु ? । एए नईइ रुक्खा, अहं पि पाएमु ते पडिओ ॥ ८११ ॥ सा पभणइ सुभगाओ, हुतु नईओ दुमा य । | वडढंत । मुन्हायपुच्छगाणं. समोहियं पुण करिस्सामि ॥ ८१२ ॥ अह तीसे सो वयणं, अमयसमं नियमणोरहलयाए । सोउं ? तहेव रहिओ, रन्नो आणाइ रुध्धु व्व ॥ ८१३ ॥ सो चितंतो का नणु, म ति एगस्स साहिणो हिट्ठा । पिक्खइ उच्चमुहाई, बालाई कलाभिकंखीणि ॥ ८१४ ॥ तो गंतूग स कामी, तरुसाई पहणिऊण लेटहिं । पाडेइ बहुफलाई, अप्पेइ य तेसि. बालाणं ।। ८१५ ॥ तप्फलसंपत्तीए, सो पुच्छइ हरिसियाइ बालाई। मज्जइ नईइ केयं, महिला कत्थ व गिह मिमीए ॥ ८१६ । अक्खंति बालया ते. सुबन्नकारस देवदत्तम्स । बहुया भन्नइ एसा, गिह पि भो अस्थि अमुगथ ॥ ८१७ ॥ अह दु
ग्गिला जुवाण, तं सुमरंती नवीणपढियं व । मुत्तुं मज्जणकीलं, तहेव पत्ता नियगिहम्मि ॥ ८१८॥ कम्मि दिणम्मि खणम्मि लय, रत्तीइ तिहीइ कत्थ ठाणे वा । पमिलिस्सामो अम्हे, इय ताइ सरंति रतिदिणं ॥ ८१९ ॥ विरहत्ताई ताई, परुप्परं संगमाभि
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॥१३२॥

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