Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 11
________________ वर्ष - 11, अंक - 1, जनवरी 99, 9 - 15 । अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर) सराक क्षेत्र प्राचीनतम जैन धर्मावलम्बियों का निवास स्थान - अशोक कुमार जैन * उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी की प्रेरणा से सराक जाति के सम्बन्ध में कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ। फलत: मुझे सराक सम्बन्धी साहित्य उपलब्ध होने में कठिनाई नहीं हुई जो भी अब तक लिखा गया है उसी से कुछ निष्कर्ष निकालने में मेरा प्रयास है। कितना सफल है? यह मैं स्वयं नहीं जानता। इस सम्बन्ध में मेरी समस्त जानकारी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों एवं पुराणों पर ही निर्भर रही है, सराक क्षेत्र में जाने का अवसर मुझे नहीं मिला है। विद्यार्थी जीवन में इतिहास मेरा प्रिय विषय रहा है विभिन्न अंचलों के नामकरण का अर्थ ढूंढना स्वभाव है। सराक शब्द श्रावक का अपभ्रंश है इसमें सन्देह नहीं होना चाहिए। साधारण रूप में यह शब्द सरावक होना चाहिए। उड़ीसा में 'व' अक्षर 'उ' जैसी ध्वनि से उच्चारित किया जाता है जैसे वहाँ की एक जाति राउल है। सरावक शब्द का 'व' 'उ' बनकर सराउक और शब्दों के उच्चारण में व्यंजन की अपेक्षा स्वर को विलीन होते देर नहीं लगती। अत: स्वाभाविक ही सराउक का सरोक या सराक बन गया। . साधारणत: सराक क्षेत्र बिहार के राँची जिले से पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भूभाग, दक्षिण बिहार, सम्पूर्ण उड़ीसा और उत्तरी एवम् तटीय आन्ध्रप्रदेश तक माना जाता है। मानभूम प्रदेश (सन्थाल परगना के आसपास) के सम्बन्ध में सन् 1986 में कर्नल डेल्टन ने एशियाटिक सोसाइटी जनरल में लिखा है कि इस स्थान पर प्राचीन कला के अनेक चिन्ह मिलते हैं। ये चिन्ह वास्तव में उन लोगों के हैं जो स्वयं को सराक कहते हैं। ये शायद भारत के इस भूभाग में सबसे प्राचीन निवासी हैं। इन लोगों के मंदिरों के चिन्ह व खण्डहर दामोदर, कसाई व अन्य जगहों पर हैं। ये लोग जीव हिंसा से घृणा करते हैं व सूर्यास्त से पूर्व भोजन कर लेते हैं। - पं. बलभद्र जैन ने भारत वर्ष के दिगम्बर तीर्थ - भाग - 2 में लिखा है कि सिंह भूमि जिले के पूर्वी भाग में रहने वाले सराक लोग विश्वास करते है कि वे पहले अग्रवाल थे, पार्श्वनाथ की पूजा करते थे, सरयू नदी के तटवर्ती प्रदेशों में रहते थे, गाजीपुर जिले में सरयू व गंगा के संगम पर उनका सोने-चांदी (सराफा) का व्यापार था। सराक क्षेत्र में काम करने वालों में पं. बाबूलालजी 'जमादार' का नाम अत्यन्त श्रद्धेय है। उन्होंने सराक लोगों को जैन संस्कृति का विस्मृत प्रतीक कहा है लेकिन उनके संस्कार, पार्श्वनाथ भगवान के प्रति श्रद्धा, भोजन वृत्ति का जो वर्णन उनकी अन्य पुस्तकों में उपलब्ध है उनसे लगता है कि भारत वर्ष में अन्य स्थानों पर रह रहे जैन तो जैन संस्कृति के प्रतीक मात्र ही हैं जबकि सराक आज भी वास्तविक जैन जीवन शैली जी रहे हैं। प्रसंगवंश यहाँ यह कहना अनुचित नहीं है कि राजस्थान के जयपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अनेकों जैन मंदिर विद्यमान है और वहाँ जैन समाज भी है किन्तु लगभग सभी जगहों पर एक या अधिक बार जैन प्रतिमाओं व अन्य धार्मिक चिन्हों की चोरी हो चुकी है। प्राय: सभी लेखकों ने सराक लोगों को भगवान पार्श्वनाथ का अनुयायी बताते हुए लिखा है कि वे अपना कुल देवता भगवान पार्श्वनाथ को मानते हैं। इस सम्बन्ध में यह * अशोक आइल मिल्स, तिजारा जि, अलवर (राजस्थान)

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