Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 92
________________ संचालन - डॉ. अनुपम जैन, होल्कर स्वशासी विज्ञान महाविद्यालय, इन्दौर मंगलाचरण __- ब्रह्मचारिणी बहनें, संघस्थ - गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी वक्ता पूज्य आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी, पूज्य क्षु. श्री मोतीसागरजी, पूज्य आर्यिका श्री अभयमती माताजी प्रो. ए.के. मैत्रा, निदेशक |.I.P.A. (दिल्ली ), प्रो. आर.आर. नांदगांवकर (उज्जैन), प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' (नागपुर), प्रो. धर्मचन्द जैन (कुरुक्षेत्र), प्रो. शेखरचन्द जैन (अहमदाबाद), प्रो. शुभचन्द्रा (मैसूर), प्रो. टीकमचन्द जैन (दिल्ली), डॉ. फूलचन्द जैन "प्रेमी' (वाराणसी),श्री संजीव सराफ (सागर) सम्मेलन के तीसरे एवं अंतिम दिन समापन सत्र में यह तथ्य उभरकर आया है कि 'भगवान ऋषभदेव वास्तव में भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी सूत्र है जो समस्त मानव जाति के लिये आदर्श है। उन्होंने ही सर्वप्रथम लिपि एवं अंक विद्या चलाई एवं नारी शिक्षा का सूत्रपात कराया। वे जैन धर्म के प्रवर्तक, प्रथम शिक्षक एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रथम उपदेष्टा है।' पीठाधीशक्षु. श्री मोतीसागरजी ने कहा कि जैनधर्म के विषय में प्राय: यह भ्रम रहता है कि यह हिन्दू धर्म की एक शाखा है, इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है तथा षट्दर्शनों के प्रतिपादन में जैन धर्म को नास्तिक धर्म के रूप में माना जाता है। जबकि यह दोनों बातें नितांत भ्रांति फैलाने वाली हैं क्योंकि इसमें एक प्रतिशत भी सत्यता नहीं है। जहाँ तक मेरा अनुमान है कि जैनधर्म के गूढ़ रहस्यों तक न पहुँच पाने के कारण ही उसका वास्तविक प्रतिपादन नहीं हो पाया। इसीलिये शिक्षा जगत में मिथ्या धारणाएँ व्याप्त हो गई हैं। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने कहा कि लोगों के कथनानुसार 1/2 प्रतिशत जैन की बात से जहाँ जैन अल्पसंख्यक सिद्ध होते हैं, किन्तु जैनधर्म की विस्तृत व्याख्या के अनुसार तो यह बहुसंख्यक प्रसिद्ध हो जाता है क्योंकि जब पशु-पक्षी तक को भी उसे धारण करने की स्वतंत्रता दी गई है तो वह हमारा व्यक्तिगत धर्म कहाँ रह जाता है। प्राकृतिक धर्म को मात्र 2500 वर्ष पूर्व का मानना एक विडम्बना है। यदि आपकी उम्र काफी कम करके कोई कहे तो आपको बुरा नहीं लगेगा। वैसे ही अनादि निधन धर्म को 2500 वर्ष पुराना कह देना नितान्त अज्ञानता का प्रतीक है। पूज्य आर्यिकारत्न श्री अभयमती माताजी ने सभी को अपना मंगल आशीर्वाद दिया। कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्रकुमार जैन ने आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में आयोजन से जुड़े सभी बन्धुओं के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि पूज्य माताजी ने इस ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर में आकर अद्वितीय तीर्थ जम्बूद्वीप का निर्माण कराया, यह समाज के लिये अनुकरणीय है। पाठ्य पुस्तकों में जो त्रुटियाँ वर्तमान में दिखाई दे रही हैं वह केवल भूलवश है, उनके पीछे कोई दुर्भाव नहीं है। हमनें उन त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाया है तथा शीघ्र ही उनका परिष्कार हो जायेगा। आपने सभी शिक्षाविदों से अपेक्षा की कि1. भगवान ऋषभदेव के जन्मदिन अथवा निर्वाण दिवस में से सुविधानुसार कोई भी एक दिन निश्चित करके उस दिन विश्वविद्यालयों में ऋषभदेव समारोह आयोजित करें। 2. विश्वविद्यालय जैन साहित्य प्राप्ति के लिये दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर (मेरठ) को अधिकृत कर दें तो यहीं से हम उन्हें सभी साहित्य उपलब्ध करायेंगे। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वादात्मक संबोधन में कहा कि भगवान ऋषभदेव जैन, हिन्दू आदि किसी भी जाति अथवा सम्प्रदाय के भगवान नहीं हैं वह तो जन - जन के परमपिता आदि ब्रह्मा है। उन्होंने युग के आदि में समस्त जनता को असि, मसि, कृषि आदि षट् क्रियायें सिखाई। समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था तथा मोक्ष व्यवस्था का संचालन किया। जितेन्द्रियता का संदेश देने वाले जैन धर्म को उन्होंने पूरे आर्यावर्त में प्रकाशित किया पुन: महावीर स्वामी तक 23 तीर्थंकरों ने उसी जैन धर्म का प्रवर्तन किया किन्तु आज पाठ्यक्रमों के माध्यम से यह भ्रान्त विचार प्रचारित किया जा रहा है कि जैन धर्म की स्थापना 90 अर्हत् वचन, जनवरी 99

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