Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 90
________________ की बात कर सकता है। नर की सेवा ही नारायण की सेवा है एवं अहिंसा धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है। विक्रम वि.वि. उज्जैन के पूर्वकुलपति प्रो. आर.आर. नांदगांवकर ने भगवान ऋषभदेव एवं पर्यावरण संरक्षण विषय पर विचार व्यक्त करते हुए भगवान ऋषभदेव को विश्व का पहला पर्यावरणविद् बताया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के अपरिमित दोहन तथा जीवन की आवश्यकताओं को अधिक बढ़ाना ही वर्तमान पर्यावरण असंतुलन का प्रमुख कारण है। यह हमारी विकृत मानसिकता है कि हम बाहर से आई वस्तु को महत्वपूर्ण मानते हैं एवं अपने पास स्थित वस्तु को महत्वहीन। उन्होंने कहा कि पर्यावरण शब्द को अमेरिका की देन मानकर सर आखों पर बिठाया गया जबकि पर्यावरण विज्ञान के जन्मदाता भारत के आदि सपूत प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ही हैं। जो कार्य उन्होंने किया है उसके लिए उनको ही मान्यता देनी चाहिये। पर्यावरण विज्ञान का जनक यदि कोई है तो वे भगवान ऋषभदेव ही हैं। मगध वि.वि. बोधगया के प्रतिकुलपति मेजर बलबीरसिंह भसीन ने कहा कि जैन धर्म साधना का मार्ग है। सभी धार्मिक ग्रंथों के भाव एक है। उन्होंने कहा कि गुरुवाणी में भी भगवान ऋषभदेव के नाम का उल्लेख है। हजारों साल पहले जो बातें जैन ग्रंथों या वेदों में कही गयी हैं वे बातें सभी धर्मों के पुराने ग्रंथों में हैं। गुरुवाणी में भी अहिंसा की व्याख्या की गयी है। झूठ नहीं बोलना, दूसरे के हक को नहीं मारना, बल्कि उसकी रक्षा करना, मोहमाया व लोभ में नहीं पड़ना चाहिए। इन सब बातों का उल्लेख गुरुवाणी में है जो भगवान ऋषभदेव की वाणी से लिया गया है। उन्होंने कहा कि लोगों को कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। गुरुवाणी कहती है कि जो मोहमाया से दूर है वही असली मानव है, यह सन्देश भगवान ऋषभदेव की वाणी से ही लिया गया है। शादी न करना ही ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता। उन्होंने इस देश में फैले झगडों के पीछे सियासी व धर्म गुरूओं का हाथ बताया। मैसूर वि.वि. के कुलपति प्रो. एस.एन. हेगडे ने भगवान ऋषभदेव के बताये सिद्धांतों पर चलने का आह्वान किया उन्होंने कहा कि श्री ज्ञानमती माताजी के उपदेश पूरी मानवता के लिये है। माताजी के आग्रह पर श्री हेगडे ने अपना कुछ भाषण कन्नड़ में दिया। इसी सत्र में मूर्धन्य जैन विद्वान पं. नाथूरामजी डोंगरीय, इन्दौर द्वारा लिखित एवं कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'जैनधर्म-विश्वधर्म का प्रो. हेगड़े द्वारा विमोचन किया गया। दिनांक 5.10.98, दोपहर 3.30-5.30, जन्म जयन्ती समारोह अध्यक्षता - श्री कैलाशचन्द्र मिश्रा, पूर्व सचिव - मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश मुख्य अतिथि- श्री धनराज यादव, सिंचाई राज्यमंत्री- उत्तरप्रदेश जन्म जयन्ती समारोह त्याग दिवस के रूप में समागत विद्वत्जनों, कुलपतियों एवं भक्तों के मध्य मनाया गया। पिच्छिका परिवर्तन आदि पारम्परिक आयोजनों के अतिरिक्त सभा को संबोधित करते हुए पूज्य आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने कहा कि जब हम भगवान ऋषभदेव को भूलने लगे तो पू. ज्ञानमती माताजी ने उन्हें याद दिलाने का बीड़ा उठाया। शिक्षण संस्थाओं में ऋषभदेव के नाम की गूंज होने की संभावना हो गयी है। आपने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को ज्ञानमती माताजी के जन्म दिवस पर शाकाहारी रहने का संकल्प लेने का आहवान किया। उन्होंने वहां उपस्थित कुलपतियों से अपेक्षा की कि वे अपने विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों को प्रेरित करें कि वे भगवान ऋषभदेव और ज्ञानमती माताजी पर शोध करें। शोधपीठ से उन्हें सहयोग किया जायेगा। इस कार्य के लिये हमें कुलपतियों के सहयोग की आवश्यकता है। आपने प्रवचन में कहा कि जैसे इक्षुरस से मिश्रित आटा मधुर हो जाता है उसी प्रकार से पूज्य पुरुषों की चरण रज से स्पर्शित स्थल भी पूज्य हो जाते हैं। उन सभी स्थलों को तीर्थ संज्ञा प्राप्त है। ऐसे तीर्थ एवं पुरुषों का नमन करने से मनोवांछित कार्यों की सिद्ध होती है। मुख्य अतिथि श्री यादव ने अपने संबोधन 88 अर्हत् वचन, जनवरी 99

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