Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 88
________________ उत्पन्न होने के नाते पूज्य माताजी जैसी साध्वी को अपने बीच पाकर मैं अधिक गौरव का अनुभव करता हूँ। __ सत्र की अध्यक्षा प्रो. विद्यावती जी ने कहा कि नारी शिक्षा के क्षेत्र में यदि भगवान ऋषभदेव की देशना का हमने लाभ उठाया होता तो आज हमारे देश में शत-प्रतिशत शिक्षा होती, कोई निरक्षर न होता। मैंने अपने जीवनकाल में 200 शोध पत्र लिखे एवं मैं इसके लिये स्वयं को अत्यन्त गौरवांवित महसूस करती थी किन्तु आज यह जानकर कि पूज्य माताजी ने 200 ग्रंथों को लिखा है मैं आश्चर्य चकित हूँ और उनके आगे अपने को शून्य मानती हैं। भगवान ऋषभदेव ने प्रेम करने के लिये कहा किन्तु प्रेम करने के लिये यह जिन्दगी छोटी पड़ जाती है फिर भी घृणा में हम अपना जीवन क्यों बर्बाद कर रहे है? यह विचारणीय है। विभिन्न वक्ताओं द्वारा विद्वानों की उपेक्षा के कारण जैन धर्म के संस्थापक के रूप में भगवान महावीर को बताये जाने का उल्लेख करने पर डा. शुभचन्द्रा ने कहा कि 'मुझे मूखों की मूर्खता से भय नहीं है मुझे भय है विद्वानों की निष्क्रियता से।' उनकी इस सटीक टिप्पणी से हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। डॉ. अनुपम जैन ने सभी का आभार माना। दिनांक 5.10.98, प्रात: 8.00-11.00, चतुर्थ सत्र अध्यक्षता - प्रो. सुरेश प्रसाद सिंह, कुलपति- वीर कुँवरसिंह वि.वि., आरा (बिहार) संचालन - प्रो. पी.एन. मिश्र, निदेशक- आई.एम.एस., देवी अहिल्या वि.वि., इन्दौर मंगलाचरण - पं. लालचन्द जैन 'राकेश', गंजबासोदा वक्ता प्रो. सी. अंजनामूर्ति, कुलपति-कर्नाटक खुला वि.वि, मैसूर, 'Social Order as Profounded by Bhagavāna Rsabhadeva'. प्रो. इन्द्राणी चक्रवर्ती, कुलपति- इंदिरा कला-संगीत वि.वि., खैरागढ़ (म.प्र.), 'मानव जीवन में संगीत का योगदान एवं महत्व' प्रो. उषाकर झा, पूर्वप्रतिकुलपति - एल.एन. मिथिला वि.वि., दरभंगा, Bhagavāna Rsabhadeva's Social & Political Thinking. प्रो. सी. अंजनामूर्ति ने कहा कि भ. ऋषभदेव ने कर्म के आधार पर जो व्यवस्था कायम की वह समतावादी थी तथा प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति का समान अवसर प्रदान करती थी आज भी उनकी शिक्षायें प्रसांगिक हैं। डा. इन्द्राणी चक्रवर्ती ने कहा कि भ. ऋषभदेव ने वर्तमान में प्रचलित विभिन्न विद्याओं की सर्वप्रथम शिक्षा दी एवं इस प्रकार वह इस युग के प्रथम शिक्षक के रूप में मान्य है। भ. ऋषभदेव द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं में संगीत भी सम्मिलित है और यही कारण है कि जैन परम्परा में संगीत का विषय अत्यन्त व्यापक रूप में पाया जाता है। प्रो. उषाकर झा ने भ. ऋषभदेव के राजनैतिक एवं सामाजिक चिन्तन पर विस्तार से प्रकाश डाला। आपने कहा कि हम अभी तक भगवान महावीर के जीवन से परिचित थे, किन्तु ऋषभदेव के बारे में नहीं जानते थे। यह पूज्य माताजी का उपकार है कि उन्होंने इस ओर हम लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। प्रो. सुरेश प्रसाद सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में भ. ऋषभदेव की शिक्षाओं पर विस्तार ने प्रकाश डालते हुए वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता की चर्चा की। पू. क्ष. श्री मोतीसागरजी महाराज ने तीर्थकर ऋषभदेव राष्ट्रीय विद्वत् महासंघ की स्थापना की घोषणा की। पूज्य माताजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि इन्द्र ने जब भगवान के जन्मकल्याणक में तांडव नृत्य किया था तब वह संगीत कला का उदाहरण था। आदिपुराण में उस तांडव नृत्य का सुन्दर वर्णन है। भगवान ने युगादि में सबसे पहले कुरुजांगल देश का राजा 86 अर्हत् वचन, जनवरी 99

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