Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 99
________________ अहत वचन मत-अभिमत मेरे लिये "अर्हत् वचन' का जुलाई 98 का अंक इसलिये संग्रहणीय व महत्वपूर्ण धरोहर बन गया है क्योंकि उसके मुखपृष्ठ पर बद्रीनाथ स्थित नवनिर्मित भवन में स्थापित 24 वेदिकाओं का आकर्षक चित्र है। जैन धर्म धार्मिक उदारता व आध्यात्मिक विशाल हृदयता के लिये प्राचीन काल से ही समभाव की अद्भुत सामंजस्यता आत्मसात किये हुए है। बद्रीनाथ जी चतुर्धाम में विख्यात धार्मिक तीर्थ है। 780 ई. के बाद जगदगुरु शंकराचार्य ने बद्रीनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ व रामेश्वरम् में (चारों कोनों पर) चार तीर्थ स्थापित किये। नम्बूतरी पाद सुदूर केरल का पंडित आज भी वहां का प्रमुख पुरोहित होता है। ऐसे सर्वधर्म तीर्थ पर आध्यात्मिक अहिंसा फाउन्डेशन, इन्दौर द्वारा चौबीस चरण स्थापना का फाउन्डेशन के अध्यक्ष श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल जी द्वारा किया गया कालजयी ऐसा निर्णय है जो भारत के आधुनिक जैन धर्म के स्मारकों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। हिमालय की उपत्यका में जैन संस्कृति सनातन काल से रही है। काश्मीर की वादियों में तीर्थंकरों की वाणी गंजी है। आज इस नये परिप्रेक्ष्य में वहां (बद्रीनाथ में) जैन धर्म के आगमन पर पूरा देश उत्सुक है। धार्मिक समन्वय का यह अद्भुत स्मारक बन पड़ा है। बौद्ध, वैष्णव, शैव परंपरा के साथ अब जैन धर्म का इतने बड़े पैमाने में पहुंचना सुखद व संतोष जनक लगा। टिप्पणी "कब तक अपमानित होगी जैन प्रतिमाएँ' में लेखक खरे की वेदना महसूस की। पुरातत्व की अभूतपूर्व पुरासंपदा कोलारस के समीप खतौरा में नष्ट हो रही है। उनका दर्द जानकर उन्हें सुरक्षित करने का प्रयास व संकल्प भी लेना चाहिये। पचास के दशक में पण्डित सत्यंधर कुमार जी सेठी, संस्थापक - दिगम्बर जैन मूर्ति संग्रहालय, जयसिंहपुरा, उज्जैन इन्दार ग्राम से 3 जैन प्रतिमाएँ अपने संग्रहालय के लिये लेकर आये थे। आज भी वे उक्त संग्रहालय में प्रदर्शित है व उनकी कलात्मक समीक्षा "जैन संग्रहालय एक परिचय" ग्रन्थ में रखी गई है। ऐसी विचारोत्तेजक व सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देने वाली टिप्पणी के प्रकाशित करने वाले संपादक डा. अनुपम जैन अभिनंदनीय है। पुरातत्व प्रेमियों के लिए ऐसी कृतियाँ ज्ञानवर्द्धन के साथ उनसे लगाव व तद् विषयक कार्यवाई के लिए प्रेरणा भी देती है। "अर्हत् वचन" अब शोधादर्श के नये कीर्तिमान स्थापित करता जा रहा है। जैन शिल्प व स्थापत्य की इस प्रकार से यह अद्भुत सेवा इसी प्रकार टिप्पणी 5 में महेन्द्रराजा जैन ने जो माइक्रो फिल्म व सी.डी. डिस्क की जानकारी देकर उन्हें इंटरनेट पर सुलभ कराने की बात लिखी है उससे हस्तलिखित ग्रन्थों की सुरक्षा व उनका अधिक से अधिक उपयोग हो सकेगा। कुंदकुंद ज्ञानपीठ ने मालवा के जैन हस्तलिखित भंडारों की जो "जीरोक्स" करवा रखी है उनको तो इंटरनेट पर दिया ही जा सकता है। इससे प्रबुद्ध शोधार्थी कुंदकुंद ज्ञानपीठ के बहुआयामी शोधकार्य से अवगत हो सकेंगे। .डा. सुरेन्द्र कुमार आर्य संग्रहालयाध्यक्ष - डा. वाकणकर भारतीय संस्कृति अन्वेषण न्यास, वराहमिहिर मार्ग, माधव नगर, उज्जैन 'अर्हत् वचन' में कुछ समय पूर्व आदरणीय देवकुमारजी ने लिखा था कि आपके पास अभी इतनी अधिक रचनाएं स्वीकृत पड़ी हैं कि दो-तीन वर्ष तक के लिये काफी होंगी। इस सम्बंध में मैं आपको पहले ही कुछ लिखने वाला था, पर लिखते- लिखते रह गया। अभी आप जिस साइज के टाइप का प्रयोग कर रहे हैं, वह किसी अकादमिक पत्रिका के उपयुक्त तो नहीं है, अत: मेरा सुझाव है कि आप अभी जिस साइज के टाइप में सम्पादक मंडल के सदस्यों के नाम देते हैं (देखिये अक्टूबर अंक, पृष्ठ 2) यदि उसी टाइप में लिख दें तो मेरा ख्याल है कि आप प्रत्येक अंक में कम से कम एक चौथाई अतिरिक्त मैटर दे सकेंगे। आशा है इस सुझाव पर विचार करेंगे। वैसे आपने अक्टूबर अंक के संपादकीय में संकेत दिया है कि जनवरी अंक से 'अर्हत् वचन' नई साज-सज्जा एवं परिष्कृत रूप में देखने को मिलेगा। विश्वास है कि इस नये परिष्कृत रूप में आप मेरे सुझाव को भी शामिल करना चाहेंगे। .डा. महेन्द्रराजा जैन संदर्भ - 8- ए, बन्दरोड, एलेन गंज, इलाहाबाद 211002 अर्हत् वचन, जनवरी 99 97

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