Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 32
________________ 14. इनके पूर्वज होटलों में भोजन नहीं करते थे, अगर कोई होटल में या बाहर कहीं अन्य जाति के घर पर अथवा दुकान पर भोजन कर लेता था, तो सराक पंचायत उसे दण्डित करती थीं। दण्डित हुए बिना उसे समाज के कार्य में नहीं बुलाया जाता था । प्रायश्चित होने पर उसकी शुद्धि होती थी । 15. सराक जाति के गोत्र चौबीस तीर्थंकरों के नाम पर हैं, जैसे आदिदेव, शान्तिदेव, अनन्तदेव, गौतम, धर्मदेव, सांडिल्य आदि । 16. इनके टाइटिलों में सराक, मांझी, मण्डल, आचार्य, चौधरी, अधिकारी आदि प्रमुख हैं । सराक बंधुओं के पूर्वजों के कुलदेवता, देवाधिदेव 1008 श्री पार्श्वनाथ भगवान एवं तीर्थंकर महावीर भगवान थे। भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की प्राचीन मूर्ति पुरूलिया (प. बंगाल) जिले के अनाईजामबाद ग्राम में अभी भी सुरक्षित है, जिसकी ऊँचाई 5 फीट है और जिसके आस-पास सराक बन्धुओं का अभी निवास है। इसी प्रकार बांकुडा (प. बंगाल) जिले के बाहुलाडा ग्राम में लगभग 1200 वर्ष प्राचीन भगवान् पार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा सुरक्षित है, जो कि मनोज्ञ एवं सबको आकर्षित करने वाली है। कुछ सराक बंधुओं के घरों में अभी भी जैन मूर्तियां काफी मात्रा में प्राप्त हो रही है। इन सराकों के पूर्वजों की संकटकालीन स्थिति का जीता जागता उदाहरण हमारी आँखों के सम्मुख है। पाकिस्तान में हिन्दुओं की तथा जैनों की क्या दुर्दशा हुई ? उन्हें तरह- तरह की यातनायें सहनी पड़ी। उन्होंने अस्थिर एवं चंचल व्यवस्था में वर्षों व्यतीत किये हैं जिस कारण से जिन मंदिर, धार्मिक ग्रन्थ आदि से उन्हें विमुख होना पड़ा तथा बाद में गुरुओं का समागम भी उन्हें न हो सका । सराक बन्धुओं के पूर्वजों की पंचायत शासन व्यवस्था बहुत ही सुगठित थी। उन सभी का किसी भी कोर्ट (न्यायालय) में मुकदमा नहीं जाता था। वे अपने झगड़ों को अपनी-अपनी पंचायतों में ही सुलझा लेते थे। सराक बन्धुओं के पूर्वजों का इतना गौरव था कि कोर्ट में इनकी गवाही प्रामाणिक मानी जाती थी। उपरोक्त बातों से सिद्ध होता है कि वे सत्यवादी, कर्त्तव्यनिष्ठ एवं अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। - - इनके पूर्वज श्रद्धापूर्वक जिनेन्द्र प्रभु की उपासना पूजा आदि करते थे तथा उनके बताये हुए मार्ग पर चलते थे। किन्तु समय के फेर से ये लोग धर्म से विमुख हो जाने के कारण अपने पूर्वजों के पूर्व संस्कारों को धीरे धीरे भूलते जा रहे हैं। प्रायः सभी सराक बन्धु जानते थे कि उनके पूर्वजों ने अनेक सुन्दर सुन्दर जैन मंदिरों का निर्माण कराया था। किन्तु धर्मरक्षा हेतु जब उन्हें स्थान परिवर्तन करना पड़ता था तब विरूद्ध मतावलंबी उनके मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे। धीरे- धीरे नये स्थानों पर बसने के लिये उन्हें वहाँ के राजा या जमींदारों का आश्रय लेना पड़ा। उन्हीं के कहे मुताबिक उन्हें धर्म का पालन भी करना बन्धु धर्म से क्रमशः विमुख होते गये। फिर भी, अभी पूर्वकालीन ठोस संस्कारों के कारण शुद्ध शाकाहारी एवं आदि का सेवन नहीं करते तथा वे अभी भी पानी छान कर पीते थे एवं कुछ लोग रात्रि भोजन नहीं करते । अधिकांश सराक परिवार णमोकार मंत्र जानते हैं। पड़ता था । परिणामस्वरूप सराक तक सराक जाति के लोग अपने अहिंसक बने हुए हैं। मद्य, मांस प्राप्त - 4.10.98 30 अर्हत् वचन, जनवरी 99

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