Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 50
________________ प्रारम्भ, यह सब दिगम्बर जैनाचार्यों की रचनाओं के महत्व को प्रतिपादित करता है। नौ वर्ष से प्राकृत भवन शोध संस्थान, दिल्ली से 'प्राकृत विद्या' 14 शोध पत्रिका भी प्रकाशित हो रही है। 15 विशेष यह है कि मागधी अपभ्रंश आदि प्राकृत भाषाओं की प्रकृति शौरसेनी ही है। यह सब आचार्य हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण से ज्ञात होता है। भरत नाट्य शास्त्र में शौरसेनी को सभी उत्तम पुरुषों के द्वारा काव्य आदि साहित्यिक रचना में प्रयोग किया जाना चाहिये, यह प्रेरणा दी गई है। सन्दर्भ : 1. दर्शन प्राभृत, आचार्य कुन्दकुन्द, माणिकचन्द दि. जैन ग्रंथमाला, प्रथमावृत्ति, हीराबाग, मुम्बई, गाथा - 35, पृ. 28, 2. सरस्वती पूजा, पूजनपाठ प्रदीप, सब्जीमंडी जैन मन्दिर, दिल्ली, पृ. 406 3. आदिपुराण, आचार्य जिनसेन, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 23 / 70 4. तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, प्रथम भाग, द्वितीय संस्करण, आ. शांतिसागर क्षाणी ग्रंथमाला, बुढ़ाना (मुज्जफरनगर), उ.प्र., पृ. 238, 1992, 5. अर्हत् वचन, कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर, 10 (3), जुलाई 98. 6. काव्यानुशासन, वाग्भट, 1915, निर्णयसागर यंत्रालय 23 कोलमट लेन, मुम्बई, द्वितीयवृत्ति, पृ. 2 7. पूजनपाठ प्रदीप, पार्श्वनाथ दि. जैन मन्दिर, सब्जीमंडी, दिल्ली- 7, 11वाँ संस्करण (देव शास्त्र गुरु पूजन), पृ. 51 धवला, षटखखंडागम सहित, पुस्तक 1, जैन साहित्योद्धारक फंड कार्यालय, अमरावती, 1939, q. 284 9. भारतीय संस्कृति को जैनधर्म का अवदान, डॉ. हीरालाल जैन, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, 8. भोपाल, पृ. 51 10. सर्वार्थ सिद्धि, आचार्य पूज्यपाद, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, सूत्र 20, पृ. 55 11. देखें, सन्दर्भ 9, पृ. 71 12. Harnale, Comparative Grammer, Introduction, p. 17, (संदर्भ - 4, पृ. 239 ) 13. देखें, संदर्भ 4, पृ. 240 14. प्राकृत विद्या, कुन्दकुन्द भारती- दिल्ली की शोध त्रैमासिकी, सम्पादक - डॉ. सुदीप जैन, 10- बी, स्पेशल इन्स्टीट्यूशनल एरिया, महरौली रोड़, दिल्ली- 110067 भरत नाट्य शास्त्र, 17/34, पृ. 273, द्वारा प्राकृत विद्या 1998 15. प्राप्त 8.10.98 48 जनवरी 99 अर्हत् वचन,

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