Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 76
________________ व्यक्ति परिचय क्षुल्लक श्री जिनेन्द्र वर्णी व्यक्तित्व जन्म : मई 1922 में पानीपत (हरियाणा) में। पिता बाबू जयभगवानजी एक ख्यातिप्राप्त एडवोकेट, जैन सिद्धान्त के मर्मज्ञ विद्वान और उच्च कोटि के विचारक। गृहस्थ जीवन : 1938 में दुर्भाग्य से क्षय रोग के कारण वर्णीजी का एक फेफड़ा सदा के लिये बन्द कर दिया गया। डाक्टरों ने मांसाहार की सलाह दी, किन्तु जीवन के मूल्य पर मांसाहार स्वीकार नहीं किया। इस संकल्प शक्ति ने जीने की एक अपराजेय शक्ति प्रदान की। अपनी दुर्बल काया के बावजूद प्रयत्नपूर्वक इलेक्ट्रिक एवं वायरलेस प्रोद्योगिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1952 में वे कलकत्ता में एम.ई.एस.कान्ट्रेक्टर हो गये। वैराग्य साधनों की सुलभता तथा अच्छे व्यापार के बावजूद सांसारिक माया में मन न रमा तो दोनों छोटे भाइयों को कामकाज हस्तांतरित कर 1957 में आत्म कल्याण हेतु घर से निकल पड़े। अध्यात्म सिद्धान्त शास्त्रों के अनवरत स्वाध्याय, मनन और चिन्तन के कारण एक ही वर्ष में शास्त्र सभा में प्रवचन करने की कुशलता प्राप्त कर ली। प्रवचन हेतु अनेक नगरों का भ्रमण। पश्चात् ईसरी में आध्यात्मिक संत क्षुल्लक गणेप्रसादजी वर्णी का सान्निध्य। सरस्वती की आराधना : सन् 1961 में क्षुल्लक दीक्षा। कालान्तर में अस्वस्थता के कारण क्षुल्लक अवस्था को सरस्वती की आराधना में अनुकूल न देख, सत्यनिष्ठा पूर्वक पुन: ब्रह्मचर्य अवस्था धारण, लेकिन जीवन पूर्ववत पूर्ण रूप से विरक्त और नि:स्पृह। ज्ञानपिपासु वृत्ति। सर्वथा अनाग्रही और वैज्ञानिक दृष्टि। समाधिमरण : 12 अप्रैल 1983 को ईसरी में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के निर्देशन में सल्लेखना व्रत धारण और क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण कर 24 मई 1983 को समाधिमरण। कृतित्व जैनेन्द्र सिद्धान्त कोष : जैन शास्त्रों के प्रमुख पारिभाषिक शब्दों, व्यक्तिवाचक, स्थानवाचक आदि संज्ञाओं का अकारादि क्रम में संग्रह (पाँच भाग)। शान्ति पथ प्रदर्शक : जैनधर्म का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विवेचन, जो आबाल - गोपाल की समझ में आ सके। दर्पण : जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धान्त अनेकान्तवाद को स्पष्ट करने वाले अनेक नयों का प्रांजल स्पष्टीकरण। समणसुत्तं : समस्त जैन समाज द्वारा मान्य एक संकलित ग्रंथ। वर्णी दर्शन : क्षुल्लक गणेशप्रसादजी वर्णी की जीवनी 'मेरी जीवन गाथा' का संक्षिप्त किन्तु परिपूर्ण संकलन। कर्म सिद्धान्त : कर्मबन्ध के सम्बन्ध में एक प्रामाणिक दस्तावेज कर्म रहस्य : कर्म की नाना अवस्थाओं एवं उनसे मुक्ति के सूत्र। : आचार्य कुन्दकुन्द का संक्षिप्त जीवन दर्शन। सर्व धर्म समभाव : सभी धर्मों पर एक जिज्ञासु का दृष्टिकोण। सत्य दर्शन . : वेदान्त दर्शन मान्य सृष्टि की महत्वपूर्ण व्याख्या। पदार्थ विज्ञान : जैन दर्शन मान्य छह द्रव्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण। ' 74 अर्हत् वचन, जनवरी 99

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