Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 77
________________ ज्ञानपीठ के प्रांगण से कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ व्याख्यानमाला जैन साहित्य से भारतीय वाङ्गमय समृद्ध हुआ "-प्रो. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव कर "जब लेखन और मुद्रण के साधन उपलब्ध नहीं थे तब ज्ञान के विस्तार का माध्यम संभाषण और श्रवण परम्परा बनी। श्रमण परम्परा और संस्कृति बहुत प्राचीन है।" उक्त विचार तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा दिनांक 20.2.98 को आयोजित कुन्दकुन्द व्याख्यान माला के 11वें व्याख्यान में अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि - 'भारतीय वाडमय श्रमण अर्थात् जैन साहित्य से समृद्ध हुआ है। तात्कालीन प्रचलित भाषा प्राकृत, पाली और अपभ्रंश के माध्यम से जैन धर्म जनधर्म बन गया। धर्म सनातन है। भौतिकता की प्रयोगशाला विज्ञान है और आत्मा की प्रयोगशाला धर्म है। कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में व्याख्यान के माध्यम से विद्वानों को और अधिक सीखने का अवसर दिया जाता है क्योंकि कोई कुलपति सीखने के लिये किसी वि.वि. में प्रवेश तो प्राप्त कर नहीं सकता। अत: ज्ञानपीठ बधाई की पात्र है।" MARS Sw 80030500000000000 अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रो. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता डॉ. भागचन्द 'भास्कर', अध्यक्ष-पाली प्राकृत विभाग, नागपुर वि.वि., नागपुर ने वर्तमान युग में जैनधर्म विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृति को समझने के पहले परम्परा को समझना होगा। ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद आदि अन्य ग्रंथों में है। अत: सिद्ध है कि जैन उससे प्राचीन है। संख्या में वे अधिक होते हैं जो संयम का पालन नहीं कर पाते। त्याग वृत्ति कम होती है। किन्तु जैनधर्म त्याग प्रधान है, फलत: जैन संख्या में कम हैं। इस धर्म में व्यक्ति की नहीं बल्कि व्यक्तित्व की पूजा है। जैन धर्म में नारी जाति का महत्वपूर्ण स्थान है। नारी शिक्षा ब्राह्मी और सुन्दरी से प्रारम्भ हुई है। मंगलाचरण डॉ. प्रकाशचन्द जैन ने किया। संचालन एवं संयोजन डॉ. अनुपम जैन ने किया। अर्हत् वचन, जनवरी 99 75

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