Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 70
________________ गतिविधियाँ ब्र. कमलाबाई जी को 1998 का रोटरी इंडिया साक्षरता पुरस्कार शिक्षा प्रसार में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1998 का रोटरी इंडिया साक्षरता पुरस्कार आदर्श महिला महाविद्यालय - श्रीमहावीरजी (राजस्थान) की संस्थापिका ब्रह्मचारिणी कमलाबाई जी को प्रदान किया जाएगा। यह पुरस्कार 9 दिसम्बर को कलकत्ता में साईंस सिटी में आयोजित भव्य समारोह में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल महामहिम श्री ए.आर. किदवई ने प्रदान किया जिसमें संस्था के वर्ल्ड प्रेसीडेन्ट श्री इलेक्ट केरियो रेविज्जा भी विशेष रूप से सम्मिलित थे। पुरस्कार में प्रशस्ति पत्र के साथ दो लाख रुपये की राशि भी प्रदान की गई। कि पुरस्कार का निर्णय विख्यात विधिवेत्ता, सांसद श्री एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में गठित एक निर्णायक मंडल की बैठक में लिया गया जिसमें अन्य सदस्य श्री टी.एन. चतुर्वेदी-सांसद, डा. एल. मिश्रा-आई.ए.एस., सचिव- श्रम मंत्रालय, श्री एच.के. दुआ-पत्रकार एवं श्रीमती देविका सिंह सम्मिलित थे। दिवाकर ग्रन्थालय का शुभारम्भ नवगठित शैक्षणिक सामाजिक संगठन वर्धमान सेवा केन्द्र, इन्दौर ने अपने एक प्रकल्प के रूप में इन्दौर नगर के कंचनबाग क्षेत्र में सुविकसित रतलाम कोठी परिसर में ज्ञान पंचमी (25.10.98) के शुभ दिवस पर दिवाकर ग्रन्थालय की स्थापना की। इस अवसर पर आयोजित एक सभा की अध्यक्षता स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष प्रसिद्ध उद्योगपति श्री नेमीनाथ जैन, अध्यक्ष-प्रेस्टिज उद्योग समूह ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं नईदुनिया के प्रमुख श्री अभय छजलानी थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में उद्योगपति श्री जयंती भाई संघवी तथा श्री शांतिलालजी धाकड़ उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन श्री हस्तीमल झेलावत ने किया। की कार्यक्रम के शुभारम्भ में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए पार्श्वनाथ विद्यापीठ के निदेशक एवं बहुश्रुत विद्वान डॉ. सागरमल जैन ने कहा कि 60 वर्ष पूर्व एक छोटे से कक्ष में प्रारम्भ किया गया पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान निरन्तर विकसित होते हुए आज पार्श्वनाथ विद्यापीठ के रूप में उच्च स्तरीय शोध एवं अनुसंधान केन्द्र के रूप में ख्याति प्राप्त कर रहा है। इस संस्थान की एक शाखा के रूप में ही यहाँ पार्श्वनाथ विद्यापीठ की स्थापना की जा रही है। निकट भविष्य में यह भी संभव है कि यह शाखा ही प्रमुख केन्द्र बन जाये। कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुस्तकालय का प्रसन्नतापूर्वक अवलोकन करते हुए आचार्य श्री पुष्पदंतसागरजी महाराज अर्हत् वचन, जनवरी 99 68

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