Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

View full book text
Previous | Next

Page 72
________________ ज्ञानपीठ के प्रांगण से प्रो. ठुकराल ज्ञानपीठ में पानी कटुलेन विश्वविद्यालय अमेरिका के प्राध्यापक प्रो. विनोद ठुकराल गत 2 दिसम्बर 98 को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में पधारे। ज्ञानपीठ के अध्यक्ष श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल एवं निदेशक प्रो. नवीन सी. जैन ने प्रो. ठुकराल का स्वागत किया। सचिव डॉ. अनुपम जैन ने कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की गत 11 वर्षों की उपलब्धियों एवं योजनाओं की जानकारी देते हुए उन्हें ज्ञानपीठ की शोध पत्रिका अर्हत् वचन के नवीन अंक एवं ज्ञानपीठ के प्रकाशनों की 1-1 प्रति सादर भेंट की। बायें से क्रमश: डॉ. अनुपम जैन, प्रो. ठुकराल, श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल, प्रो. पी. एन. मिश्र, प्रो. नवीन सी. जैन, डॉ. प्रकाशचन्द जैन एवं श्री सूरजमल बोबरा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के प्रबन्ध अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. प्रभुनारायण मिश्र ने प्रो. ठकराल को बताया कि ज्ञानपीठ की अकादमिक गतिविधियों एवं शोध के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए विश्वविद्यालय ने इसे कला एवं विज्ञान संकाय के 5 विषयों में पी.एच.डी. कराने हेतु शोध की मान्यता प्रदान की है। अध्यक्ष श्री कासलीवाल ने जैन समाज द्वारा संचालित अन्य संस्थाओं तथा भारत में जीव दया के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं की गतिविधियों एवं अहिंसा की व्यावहारिकता पर प्रकाश डाला जिससे प्रो. ठकराल को विशेष प्रसन्नता हुई। इस अवसर पर प्रसिद्ध जैन विद्वान डॉ. प्रकाशचन्द जैन एवं श्री सूरजमल बोबरा भी उपस्थित थे। प्रो. ठकराल ने निकट भविष्य में संभावित पुनः भारत आगमन के समय ज्ञानपीठ में पधारने की इच्छा व्यक्त की। आज से 2500 वर्ष पूर्व सराक जाति जैन धर्म से विमुख हो गई थी, लेकिन उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने उन्हें पुन: स्थापित करने एवं जैन धर्म की मुख्य धारा में लाने का बीड़ा उठाया है। मेरठ - 12.2.95 साहू अशोककुमार जैन अर्हत् वचन, जनवरी 99 70

Loading...

Page Navigation
1 ... 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112