Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 73
________________ ज्ञानपीठ के प्रांगण से क्षुल्लक जिनेन्द्रवर्णी स्मृति व्याख्यानमाला' 98 सभी धर्मों का सार - श्रेष्ठ आचरण -मेजर बलवीरसिंह भसीन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा आयोजित क्षुल्लक जिनेन्द्र वर्णी स्मृति व्याख्यानमाला - 98 के अन्तर्गत वर्ष 1998 का व्याख्यान दिनांक 19.12.98 को मेजर बलवीरसिंह भसीन, कुलपति- मगध वि.वि., बोधगया ने 'वर्तमान युग में जैन धर्म के सिद्धान्तों की उपयोगिता' विषय पर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता चौ. चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के कुलपति प्रो. दुर्गाप्रसाद तिवारी ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में वीर कुँवरसिंह वि.वि., आरा के कुलपति प्रो. सुरेशप्रसाद सिंह, तिलकामांझी वि.वि., भागलपुर के कुलपति प्रो. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव, काशी दरभंगा वि.वि. के कुलपति प्रो. एस. एन. प्रसाद, मैसूर वि.वि. के प्रो. एस. एन. हेगड़े, होल्कर विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. राम श्रीवास्तव, पद्मश्री बाबूलाल पाटोदी, सर्वश्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल, माणिकचन्द पाटनी, अशोक बड़जात्या आदि विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। hinari मेजर बलवीरसिंह भसीन, कुलपति - मगध विश्वविद्यालय, बोधगया उद्बोधन देते हुए कार्यक्रम के अन्तर्गत अपने उद्बोधन में प्रो. भसीन ने कहा कि हिन्दू, मुसलमान, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि सभी धर्मों में सत्य-अहिंसा की बात कही गई है। गुरुवाणी के उपदेश जैनधर्म से भिन्न नहीं है। श्रेष्ठ आचरण एवं दुखियों की सेवा ही सभी धर्मों का सार है। प्रो. भसीन ने भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन का स्मरण करते हुए कहा कि हस्तिनापुर में मुझे जैनधर्म को जानने एवं पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिला। उनके आशीर्वाद से मुझे यह दायित्व मिला है क्योंकि हस्तिनापुर में उन्होंने ही मुझे सर्वप्रथम कुलपति के रूप में सम्बोधित किया था। मैं इस पद पर रहते हए जैनधर्म के बारे में पाठ्य पुस्तकों में प्रचलित भ्रांतियों के निरसन का प्रयास करूंगा। प्रो. एस. पी. सिंह, कुलपति-आरा ने अपने वक्तव्य में जैनधर्म की प्राचीनता का प्रतिपादन करते हुए भगवान ऋषभदेव को जैनधर्म का प्रणेता एवं प्रथम तीर्थंकर बताया। अर्हत् वचन, जनवरी 99

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